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"ऐसा क्या गुनाह किया कि लुट गए........"
अपराध के अनुपात में ही सजा होनी चाहिए न! हमें छल्ला चोरी में फांसी दे दी गयी....
बहरहाल इन दिनों 'हिन्दू भाइयों' ने मुझे तनखैय्या घोषित कर दिया है. राष्ट्रवादी होने की सारी संभावनाएं शून्य हो गयी हैं. क्योंकि जितना कुछ मैंने लिख दिया, उससे मैं राष्ट्रवादी बनने से रहा. बिना इन 'हिन्दू भाइयों' के प्रमाणपत्र के, मेरी राष्ट्रभक्ति कैसे प्रमाणित हो पायेगी?

मेरे लेखों ने बड़ी संख्या में विरोधियों को जन्म दिया है. कुछ मोबाइल पर धमका रहे हैं. ब्लॉग पर धमका रहे हैं. 'बचके रहना' का बिन माँगा सुझाव दे रहे हैं. कुछ लोग ऑफिस तक आकर, लफडा से बचे रहने का सुझाव दे गए. हमने हितैषी भी कम नहीं बनाए. जो लोग पीठ पीछे गाली देते हैं, हमारे हितैषी गाली को ढो-ढोकर के हमारे पास तक लाते हैं. हितैषी होने का महत्व भी दर्शाते हैं.

'निर्माण संवाद साप्ताहिक' या 'निर्माण संवाद ब्लॉग' विध्वंस का कतई पक्षधर नहीं है. सृजन में संपूर्ण विश्वास है. बंदरिया की तरह लाश को सीने से चिपकाए रखना अगर सृजनशीलता है, तो मैं उतना महान सर्जक नहीं हूँ, ना ही बनना चाहता हूँ. जहाँ तक तनखैय्या होने या धमकी का सवाल है, मैं जिन्दा भी इसीलिए हूँ. अस्तु अब जोर का झटका भी धीरे से लगता है.

मैं न तो 'जात' होना चाहता हूँ, ना ही किसी थोपे गए धर्म में विश्वास रखना चाहता हूँ. आदमी को प्यार करने के लिए, मैं स्वयं आदमी बनने के प्रयास में हूँ.
मुझे इस देश और समाज से बेइन्तहा प्यार है. इसकी मजबूती और कमजोरी की चिंता और चिंतन करने का मुझे हक है. भेदमूलक, उंच-नीच, छुआ-छूत, सवर्ण-अवर्ण आदि किसी भी तरह के कालबाह्य विचार और व्यवहार के पक्ष में मैं नहीं हूँ.

यह भी धृष्टता नहीं करना चाहता, कि ब्राहमणवाद के नाम पर भारतीय समाज की हर अच्छी एवं वैज्ञानिक बातों को खारिज करता रहूँ.
दलित, वंचित, शोषित, पीड़ित की आवाज बुलंद करने के साथ-साथ, इनके लिए लड़ी जा रही जंग में मेरी ताकत लगती रहेगी. परिणाम की कोई फ़िक्र नहीं.... हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, और पाने के लिए सारा आकाश खाली है...

मैं जानता हूँ कि मेरे लोग मुझे गाँधी भी कह दें, तो मैं गाँधी नहीं बन सकता, ना ही गोडसे कहने से गोडसे बन जाऊँगा. दो कौडी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता मुझे तो कम से कम नहीं है.
हाँ, यह सत्य है कि मैं अब टमटम का घोड़ा नहीं हूँ, जो इधर-उधर नहीं देख सकता. ज्ञानतंत्र को खुला रखा हूँ. किसी भी विचार और व्यक्ति को अंतिम सत्य मानने को तैयार नहीं हूँ. ना तो गाँधी अंतिम सत्य हैं, ना ही मार्क्स... यह सत्यांश अवश्य हैं...

मैं हिंदूवादी होने से बेहतर, दलितवादी होना पसंद करता हूँ. मेरा दलित-प्रेम सहानुभूति-पूर्वक नहीं है, बल्कि स्वानुभूति-पूर्वक है.

हमारे पास भोगा हुआ, देखा हुआ यथार्थ है. भोगे हुए यथार्थ को शब्दों से नहीं ढका जा सकता. आज भी जातीय आग्रह इतना गहरा है, कि हम मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं, कि अतीत में हमारे पूर्वजों ने अपने ही बन्धु-बांधव का शोषण किया, पतित बनाया, अछूत बनाया.

उदारवाद की शुरुआत के बाद जातिवादी ताकतों ने अपना चेहरा बदल लिया है. दलितों के श्रम पर सदियों तक हमने ऐश किया. अब हम उसके संसाधन ही नहीं उसके परंपरागत रोजगार पर भी कब्जा कर रहे हैं.
नाई के पास अपना सैलून नहीं, धोबी का अपना लौंड्री नहीं, फर्नीचर का दुकान बढ़ई का नहीं, यहाँ केवल ये श्रमिक हैं. तरकारी भी अब अम्बानी ही बेचेगा तो कुंजर और कोइरी क्या करेगा? बाटा कंपनी में चमडा का काम सवर्ण ही करेगा, तो चमार कहाँ जायेगा? शौचालय के उपयोग का पैसा विन्देश्वर पाठक ही लेगा तो म्हार और डोम कहाँ जायेगा?

श्रम के आधार पर जिन जातियों को हमने अपमानित किया, वह विचार आज कहाँ है? क्यों नहीं अम्बानी आज अछूत है? विन्देश्वर पाठक के साथ अछूत वाला व्यवहार क्यों नहीं?

ब्राह्मणवाद को जीने के लिए अन्तर्विरोध चाहिए. कुर्मी, धानुक से, यादव, अहीर से घृणा करता है. जो यथास्थितिवादी है, उसे बोलने के लिए यह उदाहरण चाहिए. सवर्णवाद एक जाति नहीं, मानसिकता भी बन गई है.
मैंने मीडिया की ही बात की है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उच्चाधिकारी और प्रवासी भारतियों की जाति तो देख लिया जाय. देश छोड़कर विदेश भागने वाले कितने दलित हैं? स्वदेशी आन्दोलन एक तरफ और बहुराष्ट्रीय कंपनी के शीर्ष पर बैठने की होड़ दूसरी तरफ. आखिर किसको प्रेम है स्वदेशी से, स्वदेश से....

मेरे रामनामी भाइयों.......सीता मैया की रक्षा भी तो समाज के दलित वंचितों ने ही किया था. अयोध्या से कौन सा इंजिनियर और डॉक्टर को राम साथ लाये थे?

जिस हनुमान ने आपको कंधे पर बिठाया, उसे आप आजतक आदमी का दर्जा नहीं दे पाए.
अभी तक उसे वानर बनाये हुए हैं.
आप कहते हैं कि 'भाईचारा' हो. हम आपको 'भाई' मानने के लिए तैयार है, आप कम से कम हमें 'चारा' तो नहीं बनाइये..

मुगलों के आक्रमण के वक़्त कितने दलितों ने इसलाम धर्म स्वीकार किया, और रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाया? आपका अपमान और जूठा खाकर भी सबसे ज्यादा रामनाम कौन जपता है?
हिन्दू समाज के एक हुए बिना यह देश नहीं बचेगा, यह सत्य है. पर एक कैसे हो?
कहाँ से इसकी शुरुआत हो?

'ना हिन्दू पतितो भव' का मन्त्र रटने के बाद भी हम जाति में ही फंसे रहते हैं. जो सोया है, उसकी चिंता छोडें. हम तो जगे हैं, पर हमारे व्यक्तित्व-कृतित्व में 'हिन्दू एक है' का भाव क्यों नहीं झलकता?

'जाति' अगर भारतीय समाज का ना भागने वाला भूत है, तो और किसी शक्तिशाली मन्त्र की तलाश करनी पड़ेगी.
इस कार्य में मैं भी लगा हूँ, आप भी लगें, तो शायद स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके.
मैं आप सबसे कहना चाहता हूँ, कि आप अतीत की यातना पर पश्चाताप भले ही न करें, कम से कम सुनने का तो धैर्य रखें ही.
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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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Reactions: 

7 Response to "ऐसा क्या गुनाह किया कि लुट गए...."

  1. Rajesh Said,

    sahi baat.......
    jawab bhi itna sajaa kar dete ho...!
    ab pata lag raha hai ki apke lekh par vivad ka kaaran kya raha hai...
    itni bebaki bhi thik nahi hai.....

     

  2. Nidhi Sharma Said,

    सच तो है कि आखिर जब हर परम्परागत पेशे को ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही करने लगेंगी, तो फिर उस पेशे से जुदा हुआ वर्ग कहाँ जायेगा?
    विचारनीय प्रश्न है......
    कोई मन्त्र मिल जाए तो बताइयेगा, इस भूत को भगाने के लिए...
    मैं भी जाप कर लूंगी, आप लोंगो के साथ.....

     

  3. This comment has been removed by the author.

     

  4. धन्यवाद निधि जी
    कम से कम आप मन्त्र का जाप करने के लिए तैयार तो हैं, इस भूत के खिलाफ....
    लेकिन इस बौद्धिक जमात का क्या हो, जो स्वीकारने को भी तैयार नहीं है इस सच को?

     

  5. 'हिन्दू एक है' का भाव क्यों नहीं झलकता?


    बिल्कुल सही कहा है आपने. हिन्दू धर्म की सबसे बडी कमी जातिगत भेदभाव है. एक ही धर्म का होते हुए भी कोई व्यक्ति अछूत कैसे हो सकता है
    ? वो तो हमारा भाई हुआ ना?

    अतीत में जो हुआ सो हुआ. अब गल्ती सुधारने का समय आ गया है. समय के साथ हर धर्म में कमियाँ आ जाती है एक रोग की तरह पर रोग का इलाज यदि हो जाए तो शरीर फिर से स्वस्थ हो सकता है. मन्दिरों में पुजारी क्यों न दलित भाइयों में से चुने जाएँ? उन्हे यदि इस तरह के आदर सम्मान मिलेंगे तो कटुता अवश्य दूर होगी. और यही समय की माँग है.

     


  6. विजयेन्द्र जी, आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ. जातिमूलक समाज घृणा और शोषण के सिवाय कुछ नहीं दे सकता परन्तु जब भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दूवाद और हिन्दुओं का विरोध, अपमान और अल्पसंख्यक (इसे मुसलमान पढें) तुष्टिकरण देखता हूँ तो अपने आप ही विचारधारा उग्र हिंदुत्व की और मुड जाती है. मैं समाज में समरसता का पक्षधर हूँ लेकिन मनमोहन की इस टिप्पणी से कतई सहमत नहीं कि "देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलामानों का है." कम्यूनिज्म दर्शन के रूप में अत्यंत आकर्षक है परन्तु हमारे देश के कम्यूनिस्ट उसका व्यवहार जिस रूप में करते हैं उससे अत्यंत घृणा है. राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में विश्वाश रखता हूँ. यदि इस देश में रहकर किसी को इस देश के कानून, संस्कृति, राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय गीत पर ऐतराज है और वह अपने धर्म को राष्ट्र से ऊपर तरजीह देता है तो मैं कहता हूँ कि उसके लिए इस देश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. वह फिर चाहे मैं हूँ, आप हों या कोई और.........

     

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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