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जंगल से निकली थी सांप के भय से, गाँव-शहर में आई तो आदमी ने डंस लिया...

यह दशा है, व्यथा है, गौमाता, गौवंश की. उस वंश परंपरा की, जिसका सीधा सम्बन्ध भारत के स्वास्थ्य, समृद्धि, स्वावलंबन और जीवन से रहा है. सहस्त्राब्दियों से भारतीय समाज में पूज्य रहे, पालक-पोषक रहे गौवंश का संरक्षण व संवर्धन समय की दरकार है. तकनीक तथा मशीन के अंध प्रयोग, नक़ल की होड़ में जुटे समाज को गौवंश के निरादर का गंभीर परिणाम भुगतना होगा. गाँव, खेत, किसान की पहचान से गौवंश की दूरी भविष्य के लिए खतरनाक संकेत हैं.

अभी कुछ वर्ष पहले तक ग्राम्य जीवन में गाय, बैल संपन्नता के प्रतीक थे. घर के बाहर खूंटे से बंधी गायों, बैलों की जोड़ी गृहस्वामी के प्रतिष्ठा का आधार होती थी. गाँव का गरीब से गरीब आदमी गौसेवा, गौपालन के लिए लालायित होता था. सामर्थ्यवान व्यक्ति से गाय अथवा बछडा और बैल सशर्त लेकर गौवंश से अपने दरवाजे की शोभा बढाता था. समय के साथ बदलते समृद्धि, उन्नति के मापदंड ने दरवाजे पर गडे खूंटे और हौदी(नादी) को सूना कर दिया है. ट्रैक्टर और थ्रेशर सरीखे मशीन अब ग्राम्य जीवन की संपन्नता के नए प्रतीक हैं. सोयाबीन के दूध में प्रोटीन ढूँढने वाला समाज, निरोग काया के लिए अब भी गाय के दूध को अमृत मानता है. गोमूत्र के औषधीय उपयोग और गोबर के धार्मिक, खेतिहर प्रयोग आज भी भारत में निर्विकल्प हैं. बावजूद, देश में गौवंश के प्रति विमुखता अपने चरम पर है.

दो बैलों की कहानी तथा लाला दाउदयाल का गऊप्रेम अब इतिहास कथा होने को है. क्या हम नयी पीढी को दो बैलों की कहानी के स्थान पर 'दो ट्रैक्टर की कहानी' पढाना चाहते हैं? या लाला दाउदयाल के गऊप्रेम की जगह किसी सभ्य भारतीय का कुत्ता-बिल्ली प्रेम आदर्श के तौर पर पढाना चाहते हैं?

शायद इन तमाम प्रश्नों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गंभीरता से सोचा है. रचनात्मक कार्यों के प्रति अपनी सांगठनिक प्रतिबद्धता को, संघ अपने गो संरक्षण-संवर्द्धन अभियान के जरिये दुहराने को तैयार है. २९ जून २००९ को भोपाल के शारदा विहार परिसर में संघ ने देश भर से आये डेढ़ सौ से अधिक कार्यकर्ताओं के बीच इस अभियान को लेकर विमर्श किया. तीन दिन तक चले विमर्श से 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' के सम्पूर्ण स्वरुप का निर्धारण हुआ. अपने स्थापना दिवस अर्थात विजयादशमी के दिन 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' का शंखनाद कुरुक्षेत्र की भूमि से करने का संघ ने निश्चय किया है. एक सौ आठ दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में २०००० किलोमीटर की दूरी तय की जायेगी.

माना जाता है, कि अयोध्या आन्दोलन के बाद एक बार फिर 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' के जरिये संघ समाज में अपने पकड़ और प्रभाव का परिचय देगा. चार प्रमुख रथों से निकलने वाली इस यात्रा का उद्देश्य गौवंश के प्रति समाज में कर्तव्यबोध उत्पन्न करना तथा गाँव, पर्यावरण, संस्कृति के लिए चेतना जागृत करनाहै.

संघ के सारथी इस यात्रा में समाज के सभी पंथ, धर्मं, जाति को जोड़ने का प्रयास करेंगे. इस यात्रा का परिणाम क्या होगा, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. फ़िलहाल इतना तय है कि गौवंश के रक्षार्थ निकलने वाली यह यात्रा संघ की ही नहीं, अपितु समय की भी यात्रा है.

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-Amitabh Bhushan 'Anhad'

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1 Response to "विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा : एक अभियान"

  1. aarya Said,

    अमिताभ जी
    सादर वन्दे!
    आपने इस पोस्ट के माध्यम से वह बात कही है जो वर्त्तमान में ही नहीं बल्कि भविष्य के लिए भी प्रासंगिक है,
    बस अफ़सोस यही होता है कि इस प्रकार के सार्थक प्रयासों पर कोई चर्चा करना भी पसंद नहीं करता, हमारे विनाश का शायद यही कारण है .
    रत्नेश त्रिपाठी

     

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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