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नयी दिल्ली से करांची कांग्रेस के लिए रवाना होने से पहले ता.२४ को महात्मा गाँधी ने सहयोगी "हिंदुस्तान टाईम्स" में प्रकाशित होने के लिए निम्नलिखित वक्तव्य दिया है:-

"भगत सिंह और उनके साथी अमर-शहीद हो गए हैं. उनकी मृत्यु से आज लाखों व्यक्ति दुखी हैं. मैं इन नवयुवक देश-भक्तों की लगन की भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ. परन्तु मैं देश के नवयुवकों को इस बात की चेतावनी देता हूँ, कि वे उनके पथ का अवलंबन न करें. हमें भरसक उनके अभूतपूर्व त्याग, अदम्य उत्साह और विकट साहस का अनुकरण करना चाहिए, परन्तु उन गुणों का उपयोग उनकी तरह ना करना चाहिए. देश की स्वतंत्रता हिंसा और हत्याओं से प्राप्त नहीं होगी. गवर्नमेंट के सम्बन्ध में मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूँ, कि उसने विप्लववादियों की सहानुभूति प्राप्त करने का स्वर्ण अवसर खो दिया है. संधि की शर्तों के अनुसार उसका यह कर्तव्य था कि वह उनकी फांसी की सजा को कुछ समय के लिए स्थगित कर देती. अपने इस कार्य से उसने संधि पर बड़ा आघात किया है और इस बात का परिचय दिया है, कि उसमें अभी भी जनता के मनोभावों को कुचलने की शक्ति है. पशुबल के इस प्रदर्शन से यह स्पष्ट हो जाता है, कि बड़ी-बड़ी घोषणाएं और सहानुभूति-सूचक सन्देश देने के उपरांत भी वह अपनी शक्ति और शासनाधिकार से जरा भी हाथ खींचना नहीं चाहती. परन्तु गवर्नमेंट की इस दुनिती से कांग्रेस को अपने उद्देश्य और अपने निश्चय से तिल-मात्र भी नहीं डिगना चाहिए. आवेश में आकर हमें पथ-भ्रष्ट न होना चाहिए. हमें यह समझकर संतोष कर लेना चाहिए, कि फांसी की सजाएं रद्द करना संधि के प्रस्तावों में निहित न था. गवर्नमेंट पर हम गुण्डापन का दोष आरोपित कर सकते हैं, परन्तु हमें उस पर संधि भंग करने का दोष न मढ़ना चाहिए. मेरी व्यग्तिगत राय से भगतसिंह और उनके साथियों की फांसी से हमारी शक्ति बढ़ गयी है. हमें आवेश में आकर इस अवसर को व्यर्थ न खोना चाहिए. इस फांसी के विरोध में देश भर में हड़तालें होना बिलकुल स्वाभाविक है. इन देश-भक्तों की फांसी के विरोध में मौन-जुलुस निकालने से अधिक उनका सम्मान नहीं हो सकता. इस अवसर पर हमें देश पर और अधिक आहुति देने के लिए तैयार होना चाहिए.

-Swaraj T.V. Desk

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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