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संघ का राजनीतिक ब्रह्मचर्य...??

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/29/2009 04:36:00 PM


भारत ब्रह्मचारियों का देश रहा है. ब्रह्मचर्य की एक से एक कथा यहाँ प्रचलित है. स्त्री-सम्बन्ध, भारतीय ब्रह्मचर्य के समक्ष बड़ी चुनौती के रूप में आती रही है.

ब्रह्मचर्य की आड़ में स्त्री-समागम और संततियों की अनेकों कथाएँ भी मौजूद हैं. अकेले मेनका, विश्वामित्र की वर्षों की साधना को ध्वस्त करने में सक्षम थी. कामिनी से हम लगातार भयभीत होते रहे हैं. कामिनी से बचने और अपने ब्रह्मचर्य को बचाने का उपाय खोजना जरूरी था. हनुमान सबसे बेहतर उदहारण थे. हनुमान हमारे सुरक्षा-कवच बने. अपने-अपने मकसद के अनुसार हमने भगवानों का लिस्ट छांटा. पर, ब्रह्मचारियों के रोल-मॉडल तो हनुमान ही बने.

आप जानते होंगे कि इस ब्रह्मचारी हनुमान को एक बेटा भी था, जिसको बहुत कम भक्त जानते हैं, वह है मकरध्वज....
मकरध्वज को हनुमान जैसा ब्रह्मचारी बाप मिला. हनुमान ने भी कभी इसे छिपाने का प्रयास नहीं किया. ना ही कभी संबंधों को लेकर कबड्डी खेली. मकरध्वज जायज औलाद है कि नाजायज, कभी भी इसके लिए हनुमान को स्पष्टीकरण नहीं देना पड़ा. लोगों ने कभी इसे डिबेट नहीं बनाया.

आज बजरंगबली तो चर्चा में नहीं हैं, पर, हमारे बजरंगी भाई चर्चा में अवश्य हैं.
संघ प्रमुख मोहन जी भगवत, भाजपा से रिश्ते को लेकर परेशान हैं. परेशानी समझ में नहीं आती, कि भाजपा इतनी भी बदसूरत पार्टी नहीं है, जिसे रिश्तेदार कहने में शर्म आवे. हाँ, झारखंडी पार्टी होती तो भागवत भाइयों को बैठने में ख़राब भी लगता, पर यहाँ तो सभी खाए-पिए-अघाए लोग हैं. लाल टुह-टुह गाल और धवल वस्त्र, फिर भी...
...देशभक्त भाजपा बोलती भी है जबरदस्त...?

स्थापना से लेकर आज तक सभी संगठन मंत्री तो संघ से भेजे गए. तपोनिष्ठ दीनदयाल उपाध्याय, वाजपेयी, मोदी, आडवाणी सभी के सभी तो संघ के प्रचारक ही रहे हैं. भाजपा आज वह अंगुलिमाल डाकू बन गयी है, जिसके पाप का भागी बनने के लिए कोई तैयार नहीं है. सत्ता और संसाधन-सुख जुटाए भाजपा और भोगे संघी और वक़्त आये तो इज्जत ख़राब कर दो.......ई भाई कहाँ का इंसाफ है?

पार्टी जिस घोडे पर सवार है, उसका लगाम उसके हाथ में कभी होता ही नहीं. आज जो नेता भाजपा विरोध में हैं, उन्हें पहले ही पता था, कि लगाम उनके हाथ में नहीं होगा, फिर लगाम लपकने की हसरत क्यों? हसरत दिखाओगे तो भोगोगे..

देश बेवकूफ नहीं रह गया है. देश अब राजनीति की परिभाषा जानता है. संघ संपूर्णतः एक राजनीतिक संगठन है. सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री नहीं हैं, तो क्या प्रधानमंत्री से कम रसूख है उनका?

घी दाल में कहीं भी गिरे, परिणाम में क्या अंतर आएगा? संघ की बहिन जी हैं, राष्ट्र सेविका समिति, भांजी हैं दुर्गावाहिनी, लाडला है विद्यार्थी परिषद्, कुल-पुरोहित है विहिप. कोई सदस्य किसानी में है, तो कोई मजदूरी में. जरूरत के हिसाब से एक परिवार को जितनी सुविधा चाहिए, उतनी सुविधा के लिए अलग-अलग प्रकल्प संघ ने खडा किया.

एक दम खांटी स्वदेशी......... बाहर से आउटसोर्सिंग की जरूरत ही नहीं. सारी वेरायटी घर में ही. यहाँ तक कि 'नकली विरोधी' भी इन्होने खडा कर लिया है. दूसरा कोई गाली-गलौज करे, परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगे, इससे बेहतर हैं कि अपने लोग ही गाली दें. गोविन्दाचार्य जैसा छुट्टा सांड, संघ का ही छोडा हुआ है. खूब गालियाँ रटवाई गयी इन्हें.......

हाँ, गाँव में एक नया शब्द विकसित हुआ है, वह है 'बुलौकिया'. गिरमिटिया नहीं बुलौकिया..... यह बुलौकिया 'Block' यानि प्रखंड से बना है. बड़े परिवार में एक सदस्य नेतागिरी में अवश्य ही रहता है. परिवार का यह सदस्य राजनीतिक सुविधा से फंड, राशन, खाद-बीज, सब्सिडी आदि जमा करता है. इसकी दलाली से परिवार को बहुत फायदा होता है. राजनीतिक सम्बन्ध के बिना आज परिवार जिन्दा ही नहीं रह सकता. हर कोई दबोचने का प्रयास करता है.

खैर, मैं संघ परिवार की बात कर रहा था. इस परिवार ने भी भाजपा के रूप में अपना बुलौकिया बनाया.
भाई ई त अच्छी बात बा.... इनमे कौन बुराई बा..? भाजपा तोहार औलाद बा.... काहे गरियावत बानी भागवत जी ? रउरा गुड खाई तो गुलगुला से परहेज काहे...............

संघ की स्वदेशी पढ़ते-पढ़ते मैं भी कभी-कभी देसज हो जाता हूँ. राजनीति पवित्र है, मौलिक है. देश, समाज और जन-गण-मन इस राजनीति से प्रभावित होता है. जिस देश को भागवत जी खडा करना चाहते हैं, वह राजनीति के बिना कैसे संभव है? राजनीति तो गाँधी, पटेल, सुभाष ने भी किया था. क्या ये लोग गलत थे? चुनावी राजनीति हो या सांस्कृतिक राजनीति चरित्र सबका एक ही होता है. इस स्थिति में राजनीतिक ब्रह्मचर्य एक पाखण्ड ही होगा.

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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Reactions: 

4 Response to "संघ का राजनीतिक ब्रह्मचर्य...??"

  1. 1) मकरध्वज को हनुमान जैसा ब्रह्मचारी बाप मिला...
    2) भाजपा आज अंगुलिमाल डाकू बन गयी है...
    3) गोविन्दाचार्य जैसा छुट्टा सांड...
    माना कि आप हिन्दुत्व से घृणा करते हैं, लेकिन अपने "आकाओं" और "चन्दादाताओं" को खुश करने के लिये भाषा का स्तर इतना नीचे गिराना जरूरी है क्या?

    एक कहावत है, कोई बड़ा आदमी कह गया है (मैंने नहीं कहा, सिर्फ़ रिपीट कर रहा हूं) कि विचारधारा के प्रति समर्पण क्या होता है, यह बात वेश्या कभी नहीं समझ सकती… उसे सिर्फ़ पैसे और स्वार्थ से मतलब होता है… :) :)

     

  2. संघ से इतना परहेज़ क्यों? हिन्दु और हिन्दुत्व को सरेआम गरियाने वाले भइया जी , नाम लिए बिना हम कहना चाहेंगे कि हिम्मत हो तो उनके धर्म का पोस्टमार्टम करो जो देश की खाते है पर हमेशा देश द्रोही कामों में लिप्त पाए जाते हैं. कितने ही हिन्दुस्तानियों की जान चली जाए उन्हे कोई फ़र्क नही पर दुनिया के किसी भी कोने में उनकी क़ौम का एक रोंआ भी दुखे तो उनका खून फ़ड्क उठता है. विरोधाभासों से भरे धर्मों की इतनी बेबाक विवेचना की हिम्मत जिस दिन आप दिखा देगे, उस दिन आपकी पत्रकारिता के कायल होंगे हम.

     

  3. VIJAYENDRA Said,

    meenujee.
    agar mai hindu nahee hota to itna likh bhee nahee paata.mulla par likhne me koyee nahee hai mujhe.mera hindutwa ghrinaa aadharit nahee hai.bhaajapa ko vote nahee dene walaa kya hindu nahee hai?raam virodhee, desh virodhee,yahee kahana chahtee hai aap ? sadiyon se jitnaa julm jitna hinduon par hinduon ne kiya utna julm dusron ne nahee kiyaa .hindu hone ke liye kiska certificate loon bata de. saanchee ram wala hindoo hoon mai,kisee dashrath putra raam kaa nahee. is saanchee raam ko jaanane ke liye ayodhya wale raam utna hee bechain the jitna mai hoon.is raam ko hidoo chaahiye par hindoo ko utnee raam kee jaroorat nahee hai

     

  4. सम्माननीय,
    गुस्सा जायज है.......उन सब देशद्रोहियों के प्रति......
    लेकिन उस देशद्रोह या देशद्रोही को किसी आग्रह से ग्रसित होकर धर्म में मत बांधिए..
    रही बात हिंदुत्व को गरियाने की..
    निर्माण संवाद परिवार का ऐसा कोई प्रयास नहीं है..
    एक कहावत है कि उस बच्चे को ज्यादा डाँटा जाता है, जिससे सुधरने की उम्मीद होती है..
    संघ के भीतर की इन खामियों को बाहर करने का अर्थ भी उसकी आलोचना से नहीं है...

    यह सत्य है कि इससे हज़ार गुना ज्यादा गलत भी हैं..
    लेकिन जब खुद को समझदार मानने और कहने वाले संघ के ही संघी बंधु और समर्थक उसकी कमी को जाहिर करने की कोशिश करने वाले के प्रति अ-शालीन हो जाएँ......तो फिर शेष को क्या कहा जा सकता है.??
    अपना शरीर बहुत प्रिय होता है, लेकिन यदि किसी अंग में घाव हो जाए तो उसकी शल्यचिकित्सा का भी साहस होना चाहिए..
    विकृति को सहेजना,,,,,उसे संस्कृति बना देता है....
    संघ को भाजपा में फ़ैल रही विकृत संस्कृति से पल्ला झाड़ने की बजाय उसे सही करने का पुरुषार्थ दिखाना होगा....
    हम संघ विरोधी या हिंदुत्व विरोधी नहीं.......उनमे फ़ैल रही विकृति के विरोधी हैं....

    इस अंतर को समझिये....

     

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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