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मृग-तृष्णा....

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/22/2009 08:00:00 AM


मैं रिश्तों की मृग-तृष्णा में,
भटका शावक, बेचैन हिरन,
कारे-पानी सी जग-कारा,
दो बूँद नहीं आशा की किरण.

तृष्णा ने मुझको पी डाला,
मैंने हर रिश्ता जी डाला,
झूठा बन जीने से अच्छा,
मैंने होंठों को सी डाला.

हर रिश्ता मैंने भ्रम पाया,
छलते जाने का क्रम पाया.

जब भी जीवन जीना चाहा,
गम औरों का पीना चाहा,
अपनों से जो सौगात आई,
उन जख्मों को सीना चाहा.

तब नया घाव पाया मैंने,
रोता देखा साया मैंने,
मैंने हर आंसू पी डाला,
सांसों से छल पाया मैंने.

कब तक मरुथल छलता जाए,
और मैं प्यासा फिरता जाऊं,
कब तक ख्वाबों को थामे मैं,
उड़ता-उड़ता गिरता जाऊं.

कोई तो मन-मृगशावक को,
खुशियों की दो बूँद तो दे,
सरिता, आशा की ना ही दे,
आशाओं की दो बूँद तो दे.

Reactions: 

4 Response to "मृग-तृष्णा...."

  1. कोई तो मन-मृगशावक को,
    खुशियों की दो बूँद तो दे,
    सरिता, आशा की ना ही दे,
    आशाओं की दो बूँद तो दे.


    बहुत सुन्दर रचना. मन को छू गए भाव.साथ ही फोटो भी अच्छी लगाई है.मै भी इस फोटो को अपने ब्लॉग पर लगा रही हूँ.

    स्नेह सहित,

    मीनू खरे

     

  2. manisha Said,

    kya likha hai likhen wale ne bhee,,ekdum arthpurna baatein likhi hain

     

  3. कोई तो मन-मृगशावक को,
    खुशियों की दो बूँद तो दे,
    सरिता, आशा की ना ही दे,
    आशाओं की दो बूँद तो दे.


    क्या बात है ,उम्मीद की जिजीविषा ऐसी भी हो सकती है ?ईश्वर आप का विश्वास बनाये रखे .बहुत बधाई.

     

  4. Nidhi Sharma Said,

    सुन्दर भाव लिए हुए एक अच्छी कविता.....
    सराहनीय......
    मृग-तृष्णा का सच ही ऐसा है....
    अच्छी रचना के लिए बधाई...

     

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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