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कदली-कुम्भ सी छिली जंघा अनावृत हो रही है; शॉर्ट फ्रॉक में मुस्कुराती हसीना हवाई-जहाज में लगातार दर्पण को मुंह चिढा रही है, सुगन्धित पाउडर चेहरे पर लगा हुआ है...खालिस बिंदास...दुनिया से बेखबर.....
नख से नयन तक, चमक ही चमक..मुद-मुडके ना देख मुड़-मुडके...जरा भी बुरा नहीं लगता उसे...इस दमकती देह की मल्लिका कोई और नहीं बल्कि इडविना माउन्टबेटन थी. भारत के अंतिम वायसराय की बीवी.
इडविना वायसराय की बीवी के रूप में कम, और पं. जवाहर लाल नेहरु के रूप में ज्यादा चर्चित रही. विभाजन की त्रासदी का दिल टूटने वाला खेल शुरू ही हुआ कि पं. नेहरु का दिल लग गया लेडी माउन्टबेटन से.
तन्हाइयों में लिपटी नेहरु की जिंदगी को लेडी माउन्टबेटन ने सहलाया, पुचकारा... बस फिर क्या था..देखते ही देखते इडविना नेहरु की जरूरत बन गयी.
राज-काज की व्यस्तता के बाद भी नेहरु अपने प्रेम के लिए वक़्त निकाल ही लेते थे.
जैसे ही दिन ढलता और बेचैन रात आती...नेहरु, लेडी माउन्टबेटन की यादों के लिहाफ में घुस जाते और ना जाने कितने कोरे-कुंवारे पन्नों को रंग बैठते....
भारत के विभाजन के बाद जब लेडी माउन्टबेटन जाने लगीं तो नेहरु के हजारों प्रेम-पत्र साथ ले गई... भावुक क्षणों में पं. नेहरु ने ना जाने क्या-क्या लिख दिया था, वह आज भी मौजूद है. इस प्रेम ने नेहरु का ही जीवन नहीं सवांरा बल्कि लेडी माउन्टबेटन की ढलती उम्र को भी एक विराम लग गया इस प्रेम के बहाने... वह पुनः यौवन की दहलीज पर पाँव रखती नजर आ रही थीं. वह खिल उठी थी.
यह सब मैं नहीं कह रहा हूँ, बल्कि लेडी माउन्टबेटन की बेटी पामेला हिक्स की जुबानी है.
एक साक्षात्कार में पामेला हिक्स अपनी माँ के बारे में बताती हैं-"मेरी माँ पहले से ही किसी और के प्रेम में डूबी थी. पिता जी (माउन्टबेटन) परेशान भी रहते थे माँ से....पिता की बेरुखी गहरी हो गई थी. मेरी माँ उपेक्षित थी. पं. नेहरु का एक मुट्ठी प्यार, माँ के लिए सहारा बन गया था."
आगे पामेला बताती हैं,"जब पं. नेहरु,मेरी माँ के पास आते, हम बाहर निकल जाते थे. प्रेम का जो चेहरा रहा हो, पिता जी जो भी समझ रहे थे, पर वे भी नेहरु और माँ के बीच के रिश्ते को स्वीकारने लगे थे और अक्सर वे उन्हें एकांत प्रदान करते थे.."
इस सम्बन्ध का फायदा माउन्टबेटन ने बार-बार उठाया. खासकर जम्मू-कश्मीर के मामले में. देश के नेता नहीं चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर, संयुक्त राष्ट्र संघ का मुद्दा बने. पर नेहरु ने वही किया जो माउन्टबेटन चाहते थे. इस चाहत के केंद्र में लेडी माउन्टबेटन जैसी चहेती जो थी....
इडविना माउन्टबेटन बच्चों को बहुत प्यार करती थी. सेव चिल्ड्रेन के एक कार्यक्रम के दौरान उनकी मृत्यु हुई थी. नेहरु का बाल-प्रेम इडविना के कारण था. इडविना माउन्टबेटन नहीं होती तो आज यह बाल-दिवस भी न मनता.
शाहजहाँ ने बेगम की याद में ताजमहल बनवाया, तो नेहरु ने अपनी मोहब्बत की याद में बाल-दिवस की शुरुआत की.
वैसे पं. नेहरु से मैं भी बहुत प्यार करता हूँ, क्योंकि वह दूसरों से बहुत प्यार करते रहे. उनके जीवन का प्रेम-रस इतिहास में कई जगह छलकता रहा है.....शेष फिर..

मैं यह जानता हूँ, कि ऐसी बातें लिख कर मैं विवाद आमंत्रित कर रहा हूँ...परन्तु फिर भी लिख रहा हूँ...क्योंकि झूठे इतिहास के साथ नयी पीढी सच के मार्ग पर नहीं चल सकती..इतिहास का हर सच सामने आना ही चाहिए..
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10 Response to "जब पं. नेहरु, मेरी माँ के पास आते, हम बाहर निकल जाते थे"

  1. Nidhi Sharma Said,

    aashchryjanak...............
    nehru ji ke sambandh mein aisi kalpana nahi thi.....
    sach mein...itihas mein bahut se sach chhupe hain..
    iss sach ko samne laane ke liye dhanyvaad...

     

  2. मैंने भी कही किसी पुस्तक में पढ़ा था की नेहरू जी का लेडी माउन्टबेटन से लव मेटर चलता था .

     

  3. Rajesh Said,

    aji...ye nehru khandan hi aisa hai...
    aur bhi kisse honge nehru ke to.......
    asha hai aap un kisson ko jag-jahir karenge..
    sach ko samne laane ke is abhiyan ke liye dhanyvad aur badhai..

     

  4. ye hai zor ka jhatkaa dheere se...........

    lagaate raho.........
    sach saamne laate raho
    ______abhinandan !

     

  5. सच तो यह है की जब एक बार नेहरूजी सरदार पाटल के यहाँ से बिना चाय पिए चले गए थे तब सरदार पटेल ने ही उनके बारे मैं ऐसे कमेन्ट किये थे की उनके पास लेडी माँउनटबटन के लिए अधिक समय है .नेहरूजी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित थे व महिला पुरुष संबंधों के मामले में उदार थे. उनकी खुद की इकलौती बेटी ने भी अपनी पसंद से प्रेम विवाह किया था . असल में पिछले कुछ दिनों से साम्प्रदायिक राजनीति वाले धर्म निरपेक्ष नेताओं के बारे में निरंतर चरित्र हनन की बातें फैला रहे हैं नेहरू और लेडी माउन्टबeटन का प्लोटोनोक प्रेम हो सकता है किन्तु उसे निंदा के लिए प्रयोग करने वालों की दृष्टि को भी समझना होगा . वही कामरेड भगत सिंह का उद्देश्य वाला bayan yad करो

     

  6. जैन जी मैं तो दल का नहीं देश का समर्थक हूँ. मेरे लिए दल नहीं देश बड़ा है. नयी पीढी को अपने आकाओं के बारे में जानने का हक है. नेहरु को सेक्स की भूख थी, इसमें क्या दिक्कत है. नेहरु नामर्द हैं यह कहना भी तो ठीक नहीं.
    हाँ बस इतना ही है कि शीर्ष पद पर रहते हुए व्यक्ति को न्यूनतम मर्यादा और आचरण का पालन करना चाहिए..
    क्योंकि देश उनका जागीर नहीं था...वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि थे..क्या नेहरु ने जनता से पूछकर लेडी से सम्बन्ध बनाया था...अगर जनता उन्हें इजाजत दी होती कि नेहरु देश चलने के बजाय दिल्लगी में लगे रहो तो ठीक था..

     

  7. This comment has been removed by the author.

     

  8. jain sahab kyu aap nehru ke charitr par platonic prem ka aavaran chadha rahe hain?
    nehru jo hain wah sach sabke samne aana hi chahiye..
    fir lekhak ne likha bhi hai...ki yah lekhak ke nahi balki khud lady montbetan ki putri ke shabd the.
    aap ki tarah nehru pariwar ki andh-astha mein pade hue logon ke karan se hi to janta aaj bhookhmari ki kagar par khadi hai..
    yah nehru ke prati apka jo platonik prem hai iske awaran se bahar nikal kar satya ko pahchaniye..aankh band karne se suraj nahi chhip jayega,,

     

  9. aur haan jain ji, ab nehru ka yah chittha bhi padh lijiye..

    http://nirmansamvad.blogspot.com/2009/08/blog-post_3323.html

    fir bataiye ki yah kaun sa __tonik prem tha...

     

  10. Amitji dhanyavaad sach ko purzor tariqe se saamne lane k liye; nehru-tezi bachchan prakaran bhi saamne laaye to achchha hoga.

    -Prakashg

     

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सुधी पाठकों की टिप्पणियां



पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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