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भारत जब तन ढंकने के लिए लंगोटी की मांग करता है, तब सरकार उसे टोपी भेंट करती है. बेबस, बीमार और बेकारों को सुरक्षित भविष्य देने के बजाय हम मंदिर-मस्जिद बनवाते रहे. कुतुब-मीनार और चार-मीनार खडा करते रहे. एक तरफ भुखमरी थी तो दूसरी और मीना-बाजार सजता था.
आज भी हम सामंतवादी चरित्र से मुक्त नहीं हुए हैं. उत्तर-प्रदेश इसका ताज़ा उदहारण है. बिहार की बर्बादी को हम देख चुके हैं. किस प्रकार पिछडों के मसीहा ने बिहार को पिछडा सूबा बना दिया.
जिसके प्रान्त के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हों, रोजी-रोजगार की संभावना शून्य हो रही हो, नौकरी पाने के लिए युवाओं को जान गंवाना पद रहा हो, वहां सैकडों करोड़ रूपया हाथी बनाने, पार्क सजाने और मूर्ती बनाने पर खर्च हो, वह बेहद अफसोसजनक और शर्मनाक है.
मायावती को पांच सौ करोड़ रुपये मूर्ती के लिए और ढाई सौ करोड़ रुपये सूखे से निबटने के लिए चाहिए. वाह रे माया का बजट?
उत्तर प्रदेश में पड़ा अकाल,
मायावती हो गयी माला माल .
इको पार्क के लिए १९९ करोड़, रमाबाई अम्बेडकर पार्क के लिए ५६ करोड़, कांशीराम स्मृति उपवन के लिए ५७ करोड़, कांशीराम स्मारक स्थल से जुड़ने वाली सड़क के लिए १९ करोड़...इसी प्रकार की "मूर्ति-पार्क" योजनायें मायावती की चल रही हैं..
दलित की बेटी का मुख्यमंत्री बनना एक गौरव की बात है. लेकिन दलित के नाम पर सूबे को लूटने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती. उत्तर प्रदेश के मन-मंदिर में माया की मूर्ति खंडित हो चुकी है, अश्रद्धा और घृणा बढती ही जा रही है मायावती के प्रति.
अम्बेडकर और कांशीराम को अपनी मूर्ति बनवाने की जरुरत नहीं पड़ी. वे दलित और वंचितों के ह्रदय में विराजमान हैं, पर माया अपनी मूर्तियाँ थोप रही हैं. माया जबरन सम्मान लूटना चाहती हैं.
गरीब की गोद में पल-बढ़कर अमीरी की गोद में जा बैठने में माया की बहादुरी नहीं है. गरीबी में पलकर अगर गरीबी मिटा देती तो शायद उसका व्यक्तित्व बड़प्पन के करीब होता.
दलित, माया के भरोसे अब नहीं हैं. माया अवश्य ही दलितों के भरोसे हैं. वक़्त बदल रहा है. दलितों के पास जुबान है, संघर्ष की शक्ति है......कम से कम किसी ब्राह्मणवाद की चपेट में तो दलित नहीं आएगा. ब्राह्मणवाद से खतरा अब कम है. सबसे ज्यादा खतरा तो मायावती के नव-ब्राह्मणवाद से है. दलित की दयनीयता के लिए माया ही जिम्मेदार होगी. किसी सतीश मिश्र पर दोष नहीं आएगा.
मैं मानने लगा हूँ कि सतीश मिश्र, मायावती से ज्यादा बुद्धिमान हैं. माया को मारकर, ब्राह्मणवाद क्यों किसी अपराधबोध में फंसे? मायावती अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार हो रही हैं.
मायावती के हाथी को अब चारा नहीं मिलेगा. शायद हाथी के पेट से माया का पेट बड़ा है, जो कभी भरता ही नहीं.
माया को जो मन्त्र दिया गया उससे माया स्वयं के लिए भष्मासुर बन गयी हैं. निस्सहाय और निस्तेज विपक्ष को माया ने जीवंत बना दिया.
यथास्थितिवादी शक्तियों ने बिहार के ताकतवर नेता लालू को भी जोकर बनाया, उनकी विकृति को सहलाया, और अब अंत कितना दर्दनाक हुआ लालू का, देश देख रहा है?! लालू के भीतर की आंचलिकता, भदेसपन, सादगी और सहजता राजनीति के लिए मानक बन सकती थी; पर ब्राह्मणवाद इतनी जल्दी लालू को इतिहास-पुरुष कैसे बनने देता?
अब तो कहा जायेगा कि सत्ता संभालने का स्वाभाविक गुण ही दलित-पिछडों के पास नहीं होता. मौका मिलते ही ये भ्रष्ट हो जाते हैं. बंगारू लक्ष्मण को भी भाजपा ने अध्यक्ष बनाया था, पर लाख रूपये के चक्कर में बंगारू बर्बाद हो गए. घोषित कर दिया गया कि दलित अध्यक्ष पद के योग्य होते ही नहीं.....बस, भाजपा से दलित का पत्ता साफ़.......!
माया की सत्ता भी जल्द ही ब्रह्मलीन होगी. माया का भ्रष्ट व्यक्तित्व ही दलित आन्दोलन का 'मानक' होगा. दलित राजनीति पुनः हासिये पर होगी., जिसकी जिम्मेवारी दलित मुख्यमंत्री मायावती की ही होगी. लालू, रामविलास, मुलायम आदि किनारे हो चुके हैं.
बस बारी मायावती की ही है, देखते रहिये.....

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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