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मायावती का मूर्ती प्रेम...

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/02/2009 04:40:00 PM


बुद्ध, कबीर और अम्बेडकर मूर्ति पूजा के खिलाफ थे। मूर्ति पूजा मनुवाद को स्थापित करता है; धर्म के मूल तत्व से समाज को दूर करता है; पाखंड को पैदा करता है ;आदि- आदि बातों को स्थापित करने में जीवन पर्यंत लगे रहे। इसी विचार- रथ पर सवार होकर कालान्तर में कांशीराम ने दलितों और वंचितों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। सुश्री मायावती उन्हीं पूर्ववर्ती चिंतकों का नाम भुनाकर सत्ता प्राप्त करती रहीं।
इस बार यूपी विजय ने उसकी महत्वाकांक्षा को और ही हवा दी। माया का हाथी दिल्ली की ओर चल पड़ा। पर क्या हुआ? इस हाथी को न तो दिल्ली ने चारा दिया और न ही अन्य किसी प्रान्त ने। यहाँ तक कि राजस्थान ने भी हाथी को नकार दिया। राजस्थान विधानसभा पहुंचे बहुजन विधायक ने हाथी की सवारी छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया। पूरी की पूरी पलटन ही साफ़ हो गई। बहुजन समाज पार्टी मनहूस ही नहीं जनहूस भी हो गई।
उत्तर प्रदेश में भी जनाधार निरंतर खिसकता जा रहा है। माया का दलित प्रेम राहुल गाँधी के दलित प्रेम के सामने बौना पड़ता दिख रहा है। माया लाख चिल्लाये की "राहुल दलित के हाथ का पानी पीने के बाद रात को स्नान करता है, राहुल का दलित प्रेम छलावा है, आदि-आदि...."। पर दलितों ने माया की बात अनसुनी कर दी और कांग्रेस को मजबूती प्रदान की।
कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने दलितों को उचित सम्मान भी दिया, पर मायावती ने बगल में किसी दलित को बैठने तक नहीं दिया। माया का सारा व्यवहार किसी सामंत से कम नहीं रहा। मायावती नव-ब्राह्मणवाद की अवतार बन चुकी हैं। माया की नगरी में लूट का तांडव मचा है। मायावती अब चंदावती में तब्दील हो गई हैं। किस लिए चंदा चाहिए? स्कूल खोलने के लिए या अस्पताल खोलने के लिए? दलित कल्याण के लिए अगर चंदा बटोरती तो हर पाप क्षम्य भी था। पैसा बटोर कर या तो मूर्ति बना रहीं हैं या पार्क बना रहीं हैं।
पुराने राजे-राजवाडे जिस तरह से राजकोष का दुरुपयोग मीनार बनाने में, मीना बाज़ार सजाने में करते थे; वैसा ही काम दलितों की महारानी माया कर रही हैं। माया या अम्बेडकर की मूर्ति लेकर दलित क्या करेगा? माया की मूर्ति चाट कर दलितों का पेट भरने वाला नहीं है। मूर्ति ही बनवानी है तो अयोध्या में राम की मूर्ति बनवा दें। अभी तो सतीश मिश्रा ही खुश हैं , इसके बाद तो पूरा ब्रह्मण कुनबा ही साथ हो चलेगा। माया का यह नाटक मूलतः बुद्ध और अम्बेडकर के खिलाफ है।
इस मूर्ति के पीछे पैसा बटोरना और अपने नाकारा और निठल्लेपन को छिपाना भी है। लालू,राम विलास ने जिस तरह पिछडे और दलितों के नाम पर अपनी सुविधा का ख्याल किया, जनता ने इन्हे अपनी औकात बता दी। इस माया से मुक्ति बहुजन समाज को लेना ही पड़ेगा।
ध्यान रहे कि यह समाज मूर्ति भंजकों का भी रहा है।

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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