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डॉ. संजय पासवान एक निहायत अच्छे व्यक्ति हैं. ना कोई मुकदमा, ना कोई घोटाला. हर आरोप से मुक्त. हाँ, थोडा दाग है भी तो अच्छा है, कुछ दाग अच्छे होते हैं. मंत्री रहते पासवान जी डायन-योगिन के खेल में शामिल हो गए थे. ओझा-गुणी के चक्कर में उनकी भद्द पिटी थी.
मैं तहे दिल से उनका सम्मान करता हूँ. एक राजनेता के साथ-साथ एक शिक्षक भी हैं. सदाशयता और शराफत उनके व्यक्तित्व का आकर्षक हिस्सा हैं.
मेरी मुलाकात लगातार होती रही. भाजपा, राजद, भाजस, कांग्रेस, लोजपा जैसे हर घाट पर मौजूद रहे.
हर पार्टी का विराट अनुभव हो गया है इन्हें. इतना विराट अनुभव शायद ही किसी नेता के पास हो. हर पार्टी का तुर-कलाम इन्हें पता है. संजय पासवान पार्टी के लिए असेट्स हैं, लायबिलिटिज नहीं.
आज पुनः भाजपा ने इन्हें गोद लिया है. कब तक रिश्ता चलता है, ये तो वही जानते होंगे.
इस चुनावी राजनीती के इतर कई साइड रोल भी निभाते रहते हैं ये. बीच में राम-सेना भी बनाने लगे थे. इस 'साइड पोलिटिक्स' के कारण उनकी जीवन्तता बनी रहती है राजनीतिक गलियारों में.
संजय का यह 'राम', रामविलास का रथ रोकेगा. बिहार में दलित और महादलित की लडाई चल रही है.
संजय पासवान को टिकट नहीं मिला,. इतने बड़े विद्वान को राज्यसभा में तो जरूर भेजना चाहिए.
संजय पासवान डिजर्व करते हैं, फिर ये दलित कोटा क्यों?
इनको भी राम बनाना पड़ा पद पाने के लिए, तो दुर्भाग्य है. तब फिर भला कमजोर, अयोग्य और सदियों से वंचित और अशिक्षित दलितों का क्या होगा?
उधम सिंह की सभा में नेता कह रहे थे कि दलित भाई जैसे हैं, इन्हें भी अपना अंग मानना चाहिए...आदि-आदि. दलितों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक विचार की क्या जरूरत है? कम से कम दलित को तो कतई जरूरत नहीं है. अपनी सहानुभूति अपने पास रखें. समरसता की बात तो ये करेंगे पर समानता के नाम पर नाक-भौं सिकोडेंगे. दलित सगे हैं तो रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाने से इन्हें क्या परहेज है? सब बकवास है.
दलित ना हो तो इनका धर्म-उद्योग बंद हो जायेगा. भारत की संस्कृति को अपने कंधे पर आज भी दलित ही ढो रहे हैं. ये लोग तो सिर्फ संस्कृति बोलते हैं, जीते नहीं हैं.
इनका 'राष्ट्रवाद' 'ब्राह्मणवाद' का पर्याय है. "भारतमाता की जय" यानि "भारत सरकार की जय" नहीं होता संजय जी. अटल के प्रधानमंत्री बनते ही हमारी भारतमाता, भारत सरकार में तब्दील हो गई.
आडवानी जी सिन्धी हैं. अटल जी के ब्रह्मण जात के होते तो देश के पंडीजी इन्हें पाइप में ही नहीं सड़ने देते. इतने बड़े लौह-पुरुष को भी भाजपा के ब्राह्मणवाद के सामने हारना पड़ता है...
खैर, संजय जी आप अच्छे स्वयंसेवक बनिए. दलितों को पकड़-पकड़कर शाखा तक लाइए. दुसाध जी को तो ले ही आये. चंद्रभान, श्योराज सिंह बेचैन, जयप्रकाश कर्दम बचे हैं, सबको लाइए, 'रामरस' पिलाइए. इनकी जिंदगी भी संवर जायेगी.
माया जी बहुजन से सर्वजन पर आ गयीं. आप भी कहिये:-
"न हिन्दू पतितो भव......."

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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