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ग़ज़ल: कौन हमारा कातिल है?

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/01/2009 06:00:00 PM


क्यूँ बतलायें सबको, कि
इस दिल में भी इक दिल है;
इन नजरों का ये पानी भी,
उस सागर का साहिल है.

बेशक जंजीर हजारों हैं,
पर कदम नहीं हारे हैं.
वो तस्वीर नजर में है,
कि कदमों में मंजिल है.

जब कत्ल हुआ सपनों का,
उम्मीदों की बलि चढी,
जो कभी-कभी रो पड़ते हैं,
ये जख्म वही हासिल हैं.

जो सपनों के खेतिहर थे,
सब पढ़-लिख ऊंचे बन बैठे,
क्या कर लें इस आदत का,
कि हम अब भी जाहिल हैं.

सोचा था इल्जाम धरेंगे
सपनो के कातिल पर,
देखा तो कुछ सहम गए,
सब अपने उनमें शामिल हैं.

एक अदालत ऊपर भी तो
लगती है ये सुना है,
'संघर्ष' वहीँ ये देखेंगे, कि
कौन हमारा कातिल है.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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