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दिग्विजय सिंह ने कभी इन नेताओं को वह सम्मान नहीं दिया, जो कि लालू को रघुवंश प्रसाद सिंह, नीतीश को राजीव रंजन-प्रभुनाथ सिंह, रामविलास को सूरज सिंह-रामा सिंह, मायावती को सतीश चन्द्र मिश्र आदि देकर सत्ता सुख भोगते रहे और तथाकथित सवर्ण हितों की उपेक्षा कर, अपनी व्यक्तिगत और दलगत राजनीति को चमकाते रहे. लिहाजा सवर्ण समाजवादी जमात अब दिग्विजय के लोकमोर्चा में अपना भविष्य देखने लगे हैं.

इतिहास साक्षी है कि १९७७ में जनता पार्टी; १९८९ में जनता दल और १९९६-१९९८-१९९९ में भाजपा को तथा २००४
और २००९ में कांग्रेस को सवर्णों ने जमकर वोट दिया, लेकिन किसी भी दल को गरीब सवर्ण के हितों का ख्याल नहीं आया. सच तो यह है कि नीतीश सरकार के द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत में आरक्षण आदि से भी सवर्ण जनमानस नाराज है. भले ही हाल के लोकसभा चुनाव में जनता ने लालू-पासवान को सत्ता में आने से रोकने के लिए, तथाकथित सुशासन यानि कि 'अफसरशाही शासन' के नाम पर राजग की झोली में काफी सीटें डाल दीं. लेकिन प्रभुनाथ की हार और दिग्विजय की जीत के गहरे निहितार्थ हैं और इसी से दिग्विजय का हौसला बुलंद है.

लोकमोर्चा के बहाने वे फिर से अपनी वही औकात पाना चाहते हैं, जो राजग सरकार में रहते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के सानिध्य में थी. यह सही है कि २००४ के बाद से दोनों बार केंद्र में कांग्रेस नित सरकार बनी, इससे दिग्विजय की राह थोडी आसन हो गयी. यदि २००९ में केंद्र में राजग सरकार बनती तो नीतीश के हाथ मजबूत हो जाते. संभवतः अपने धुर विरोधी और लोकसभा चुनाव में जदयू प्रत्याशी से पराजित 'शातिर समाजवादी नेता' जॉर्ज फर्नांडिस को बतौर जदयू प्रत्याशी राज्यसभा में भेजकर नीतीश ने दिग्विजय को ही कमजोर करने का पासा फेंका था, जिसका जवाब दिग्विजय ने लोकमोर्चा का गठन करके दिया है. यही नहीं सांसद इंदर सिंह नामधारी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी, समाजसेवी विजय प्रताप, पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी, प्रख्यात चिन्तक शिवखेडा, मशहूर गायक अनूप जलोटा आदि की उपस्थिति से जाहिर होता है कि 'बांका विजय' के गहरे निहितार्थ हैं.

इन सबों की उपस्थिति में जिस लोकतान्त्रिक समाजवाद की उन्होंने वकालत की है तथा जिस तरह से जातिवादी, धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय ताकतों से समान दूरी बनाये रखने की प्रतिबद्धता जताई है, यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है. यही नहीं मौजूदा आर्थिक नीतियों और विदेश नीति में अमेरिका के पिछलग्गू बनने के रुझान के खिलाफ जो संघर्ष करने का ऐलान किया है, उससे साफ़ जाहिर है कि उनके निशाने पर 'पटना की सल्तनत' के साथ-साथ दिल्ली की सल्तनत भी है. क्योंकि प्रख्यात समाजवादी नेता, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और मंडल मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के निधन तथा भाजपा द्वारा पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत को साइड करने एवं पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह को पार्टी से हटाने तथा कांग्रेस द्वारा पूर्व मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह को साइड करने की परिस्थितियां, उससे उन्होंने केंद्रीय राजनीति में अपने लिए एक माकूल अवसर भांप लिया है. वह यह भी समझते हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की वर्तमान चलती, हमेशा नहीं रहेगी. ऐसे में सत्ता के शागिर्दों पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले दिग्विजय सिंह, जो 'राजनीतिक जुगाड़वाद' के स्रोत भी माने जाते हैं, का लोकमोर्चा क्या गुल खिलायेगा, प्रतीक्षा करना दिलचस्प होगा..........

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-Kamlesh Pande, Spl. Correspondent, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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