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आज हमारे मुल्क में जो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। चारों तरफ भ्रष्टाचार व आतंक का माहौल बना हुआ है। कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से चरमरा गई है। असुरक्षा का माहौल चारों तरफ बना हुआ है। गरीबी व लाचारी में लोग जीवन-यापन करने को विवश हैं, यह एक प्रगतिशील देश की प्रतिष्ठा पर आघात है। सारी सरकारी मशीनरी चौपट सी नजर आती है, कोई भी अपने कार्य को सही दिशा नहीं दे पा रहा है। प्रशासन अपने आपको बेबस और लाचार महसूस करने पर मजबूर है, परंतु इसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है, क्योंकि आज हर कोई अपने आपको पाक-साफ दिखाने की कोशिश में निरन्तर गुनाह किये जा रहा है। अपितु आज किसी भी क्षेत्र में हालात बिगड़े हैं, तो उसके लिऐ हम स्वयं जिम्मेदार है, सुधारवाद की आवाज तो हर कोने-कोने से आती है, मगर हम अपने अन्दर के शैतान को नहीं मारते। हम बड़ी आसानी से अपना दोष दूसरे पर मढ़ देते हैं या फिर सरकार को इसका जिम्मेवार ठहराते हैं। सन् 1947 से आज तक हम एक स्वरूप भारत की कामना तो करते है। परंतु हम आज के हालात पर अगर नजर डालें तो देश की अर्थव्यवस्था, कानून- व्यवस्था तथा न्याय-व्यवस्था अपराध के समुन्दर में डूबी नजर आती है।
जहां तक आतंकवाद का सवाल है, कोई भी शख्स आतंकवादी नहीं बनना चाहता अपितु सामाजिक प्रताड़ना और सामाजिक अव्यवस्था से परेशान होकर वह इस आतंकवाद के रास्ते पर निकलता है। सरकारी मशीनरी आज कितनी काबिल है, वह हम अदालतों में, दफ्तरों आदि में देखते हैं। हर महकमा लापरवाह और आलसी हो चुका है। यदि हर कर्मचारी महीने में मात्र 10 दिन भी ईमानदारी से काम करने लगे तो हिन्दुस्तान को फिर सोने की चिड़िया बनते देर नहीं लगेगी। अतः मैं यही कहूंगा की मुझे खुद ईमानदार बनना होगा।
बुराई का बुंलद स्वर :
लगा दो और भी पहरे
ये ऐलान-ए-कातिल का दावा है
कहीं पर लूट भी होगी
कहीं पर कत्ल भी होंगे।

- Dinesh Kumar


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जलमेवममृतम्, इदम जलमौषधम्

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/24/2010 07:05:00 PM 0 comments


‘‘जलमेवममृतम्, इदम जलमौषधम्।।’’ कहकर जल की महत्ता और उसकी उपादेयता को श्रेष्‍ ठता प्रदान करने वाला देश, सभी प्रकार के जलस्त्रोतों, जल-संग्रह स्थलों तथा जलों को पूज्य मानने वाले देश में, जल के देवता श्री वरूण देव की प्रसन्नता हेतु सदैव जलस्थलों, जल के आसपास के क्षेत्र तथा जलों को पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर रखने का अभ्यासी जन समुदाय वास करता रहा है। राज्य और प्रजाजन सभी जलों का समादर करते रहे हैं। इस हेतु के राजकीय, सामाजिक, सामुदायिक, साम्प्रदायिक, धार्मिक और व्यक्तिगत आचरण तथा आचार संहिता भी प्रयोज्य थी।
किन्तु आज राज्य से लेकर व्यक्ति और व्यावसायिक समूहों तक सभी उसी अमृतमय जल को, उसी औषधिमय जल को विषमय करने के उपादानों में दिनरात लगे हैं। शहरों के मलमूत्र से लेकर कारखानों के रासायनिक विषैले पानी के नाले और चमड़े के पानी के नाले पवित्र जलों को बरबाद कर चुके हैं।
आज जब संपूर्ण विश्‍व और स्वयं भारत तथा इसके समस्त महानगर जल संकट के मुहाने पर खड़े हैं, उस समय भी दृष्टिहीन मानवजाति कितनी भयावह गति से जलों के विनाश पर डटी हुई है। आने वाले समय में निश्चित ही यह स्थिति इससे भी विकट होगी। आज गंदे नालों का पानी अपेक्षाकृत साफ और महानगरीय प्राकृतिक नदियों का पानी अधिक गंदा दिखता है। जिनका चुल्लू भर जल पीकर मानव प्राण तृप्त कर लेता था, उन सरिताओं के चुल्लू भर जल को जनगण आज तरसता है।
यह सभ्यता, यह विकास अपनी ही समूल हानि का प्रयास है, जो एक दिन अवश्‍य ही हमारे अपने लिए ही चुक जाने का कारण बनने वाला है। यह प्रदुषण जल, वायु, अग्नि, आकाश, पर्यावरण सर्वत्र ही तो फैला हुआ है। आखिर क्या होगी इसकी अन्तिम परिणति ?
ऐसा नहीं कि नदियों, जलों के संरक्षण की योजनाएं नहीं चल रही हैं। अब तक केवल भारतवर्ष में ही सैकड़ों अरब रुपये इस हेतु व्यय हो चुके हैं। किन्तु विचारणीय यह है कि इस दिशा में हमारी उपलब्धि क्या है ? क्या इतने व्यय के बाद भी हम देश की एक भी नदी को पवित्रता या शुद्धता के स्तर तक वापस ले जा सके हैं ? नहीं!!
प्रश्‍न यही है कि आखिर ये नाले, नदियों में ही क्यों गिराए जाते हैं ? इनके लिए कोई अन्य विसर्जन स्थल क्यों नहीं तैयार किया जा रहा है ? नदियों को पूर्ण प्राकृतिक अवस्था में ही क्यों नहीं बहने दिया जा रहा है।


- Dr. Kamlesh Pandey



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साम्राज्यवाद के प्रतिकार का स्वरूप आधुनिक विकास के रूप में उभरने आया तो सम्भावनाओं का नया सूर्य उदित होता सा लगा था। किन्तु जब वह अपने युवावय के मोड़ पर पहुंचा तो क्लास, क्लासीफिकेशन और स्टेटस सिम्बल जैसी नई साम्राज्यवादी सामाजिक संज्ञाओं के रूप में सीमांकन ही नहीं कर रहा, अपितु साम्राज्यवाद के क्रूरतम हृदयहीन मापदण्डों से भी आगे जाता हुआ दिख रहा है।
कोपेनहेगन या अन्य किसी भी प्रकार के जीवन संभावनाओं की तलाश के प्रयासों की सार्थकता की बात करने से पूर्व ही प्रश्न उठता है कि इसके लिए किस प्रकार की विचारधारा और जीवन-दर्शन को आधार बनाया गया है ? क्या समाज के सभी वर्गों और समाज के समस्त जीवन पहलुओं की वास्तविक मीमांसा के मंच पर नई संभावनाओं की खोज की जा रही है, अथवा किसी विशेष सीमा-रेखा के दायरे में ही कुछ लोग तथाकथित बुद्धिजीविता का प्रदर्शन करते हुए नवयुग के लिए कुछ नई सीमाएं तय करने वाले हैं ?
जीवन और जीवन-दर्शन की गंभीरता तथा गहनता को जाने बिना किसी भी प्रकार से विश्व को बचाने की अवधारणा पर काम करने का प्रयास अंततः एक असफल आयोजन ही सिद्ध होता है। इस दृष्टि से, निश्चय ही भारतीय चिंतन की ज्ञानधारा जीवन के लिए सदैव से सहजीवन, सह-अस्तित्व और परिणाम में शुभकारी विचारधाराओं एवं जीवन पद्धति की पोषक रही है।
ऐसे अनेकों प्रकार के जीवन-दर्शन भारतीय वाड्.मय में उपलब्ध हैं जिन्हें जीवन में अपनाकर विश्व के समस्त भूभागों में मनुष्य जीवन, अन्य जीवों का जीवन, प्रकृति, पर्यावरण, जल, वायु, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, वन तथा जीवन संभावनाओं और जीवन के संसाधनों को न केवल अधिकतम समय तक विश्व में बनाए रखा जा सकता है, अपितु पूर्व में किए गए मनुष्यकृत प्रकृति के नुकसान की भी ठीक-ठीक भरपाई की जा सकती है।
भारतीय जीवन-दर्शन इस संपूर्ण प्रकृति, धरा तथा अन्य जीवों को स्वयं अपना ही अंश मानकर उसे जीने के प्रयासों की पोषकता के सिद्धान्त देते रहे हैं। इनकी अवहेलना करती हुई मनुष्य जाति अपने, प्रकृति के, अन्य जीवों के तथा धरा के समग्र विनाश का कारण बनने की कगार पर आ खड़ी हुई है।
अभी समय है, किन्तु यह अन्तिम क्षण हैं, जहां से यदि वापस लौट लिया जाए और भारतीय जीवन पद्धति को विश्व के लिए अधिकृत जीवन पद्धति घोषित करके उसे शत प्रतिशत लागू किया जा सके, तो निश्चय ही धरा, धरातल, अन्तरिक्ष, वायु, जल, प्रकृति, मनुष्य-जाति, अन्य जीव, वनादिकों को बचाया जा सकता है; अन्यथा समीपस्थ विनाश को रोक पाने का सामथ्र्य किसी में नहीं।

- Dr. Kamlesh Pandey


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उत्तराखण्ड में महिला सशक्तिकरण और बाल विकास योजना के तहत राज्य सरकार ने नंदादेवी कन्या योजना के तहत चालू वित्त वर्ष में करीब 16 करोड़ रुपए आवंटित किए। आँकड़े के अनुसार महिला सशक्तिकरण के नाम पर 4 हजार करोड़ रूपये खर्च किए गए। मुख्यमंत्री आर पी निशंक के द्वारा राज्य सभा में लैंगिक मामलों से संबंधित एक बजट प्रस्तुत किया गया, जिसमें बजट को 2007-08 में 333 करोड़ रु. से बढ़ाकर 1 हजार 205 करोड़ रुपये कर दिया गया। पिछले वर्ष लिंग बजट के 20 विभाग थे, परंतु इस वर्ष चार और विभाग को इसमें शामिल किया गया, जिसमें महिलाओं की सुख समृद्धि और कल्याण को प्रमुखता दी जाएगी। महिलाओं के कल्याण से सम्बंधित गौरा देवी कन्याधान योजना, नंदा देवी योजना और इस प्रकार की अन्य योजनाओं की शुरूआत की गई। इस योजना को दो वर्गो में विभाजित किया गया। पहला महिलाओं के लिए और दूसरे वर्ग में 30 प्रतिशत लाभ महिला आबादी के लिए रखा गया है। नंदादेवी कन्या योजना, बालिकाओं को आर्थिक एवं शिक्षित सुरक्षा प्रदान करने के लिए की गई। इसके अन्तर्गत लैंगिक असमानता को दूर करने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने, बाल विवाह को रोकने, कन्या शिशु को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों में जन्मी लड़कियों के नाम 5 हजार रुपये का एक फिक्स डिपाजिट चैक दिया जाता है। अगर लड़की 18 साल की हो जाती है तो यह रााशि उसके द्वारा प्राप्त की जा सकेगी। यदि 18 साल से पहले किसी कारण से कन्या की मृत्यु हो जाती है तो यह राशि वापस सरकार के खजाने में जमा करा ली जाएगी।
नंदादेवी योजना का मुख्य उदेश्य राज्य में लिंग अनुपात में आई कमी को ठीक करना है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार लिंग अनुपात की दृष्टि से उत्तराखण्ड में एक हजार पुरुषों पर वर्तमान में 962 महिलाएं है। इस योजना का उद्देश्य परिवार व समाज में बालिकाओं की स्थिति को समानता पर लाना, बाल विवाह पर रोक लगाना, कन्या की गंभीर बीमारी का इलाज कराना, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, जन्म पंजीकरण को बढ़ावा देना, टीकाकरण के प्रति जागरुकता पैदा करना और गर्भवती माहिलाओं का सौ फीसदी पंजीकरण कराना शामिल है।
महिला सशक्तिकरण के ऊपर 48.73 करोड़ रूपये खर्च किए गए। सरकार महिलाओं के विकास के लिए विशेष ध्यान दे रही है। इसके अलावा राज्य में बच्चों के विकास के लिए देव भूमि मुस्कान योजना, मोनाल परियोजनाएं भी चला रही है, इतनी कल्याणकारी योजनाएं होने के बावजूद भी दूरदराज पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली गरीब महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।


- Sudarshan Rawat


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देश में चीखते सवालों का अम्बार लगा है। देश की एकता-अखंडता खंडित हो रही है। देशभक्ति का मतलब पाकिस्तान और साम्राज्यवादी शक्तियों को गाली देना भर रह गया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि युवा किसी राष्ट्र की शक्ति होते हैं। किसी भी राष्ट्र की शक्ति का आंकलन वहां की युवा शक्ति से किया जा सकता है। लेकिन प्रश्न ये है कि आखिर युवा की परिभाषा क्या है? युवा कोई कायिक अभिव्यक्ति नहीं है, युवा किसी उम्रवय का नाम नहीं है, युवा एक गुणवाचक संज्ञा है। युवा वही है जिसके अन्दर युयुत्सा है, जिजीविषा है सवालों के जवाब तलाशने की। जिसके अन्दर जोश है देश के चीखते सवालों से लड़ने का। हहराती नदी के जैसा कैशोर्य ही नहीं होगा, तब फिर वह युवा कैसा? उद्दंडता ही नहीं, तब फिर यौवन कैसा? युवा का तो अर्थ ही उस हिलोर मारती नदी के जैसा है जो पहाड़ों की छाती को चीरकर आगे बढ़ जाती है। ईंट के घेरे में बंधकर बहने वाली नाली से किसी पहाड़ का सीना चीरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
स्वामी विवेकानंद ने ऐसे थके हुए और लाचार युवाओं को ‘वयस्क बालक’ कहकर संबोधित किया था। यदि युवा का अर्थ सिर्फ उम्र से ही है तब फिर चालीस करोड़ युवाओं का देश भारत आज तक भी वैश्विक परिदृश्य में अपनी छाप छोड़ने में क्यों नहीं सफल हो सका है?
कारण स्पष्ट है, यहाँ का युवा निस्तेज हो गया है।
यद्यपि युवाओं ने कई बार अपनी शक्ति का परिचय दिया है। आजादी के समय जब विवेकानंद आदर्श थे, तब भगत सिंह, राजगुरु जैसे युवाओं ने इतिहास लिखा। जब सुभाष और चन्द्रशेखर ‘आजाद’ आदर्श थे, तब युवाओं ने 1974 की क्रांति लिखी थी। अब आदर्श बदल रहे हैं, अब राहुल और वरुण आदर्श हैं। आज चारों ओर युवा नेतृत्व की बात है। लेकिन युवा का अर्थ मात्र सोनिया का पुत्र होना ही तो नहीं होता, या कि सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अखिलेश यादव और जयंत का अर्थ युवा नहीं है।
युवा का अर्थ सलमान खान और आमिर खान भी नहीं होता। इन बिम्बों के पीछे दौड़ रही यह लाचार जमात युवा कहलाने के लायक नहीं रह गयी है।
कॉलेजों के आगे सीटी बजाने वाली इस पीढ़ी से क्रांति की उम्मीद नहीं की जा सकती है। सिगरेट के धुंए के बहाने अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करने वाली युवाओं की इस भीड़ से फिर कोई 1942 और 1974 नहीं दुहराया जा सकेगा। रियलिटी शो में अपनी पहचान खोजते इन युवाओं से असल जिन्दगी के सवालों से जूझने की उम्मीद करना बेमानी है।
स्वामी जी ने कहा था, ‘‘सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।’’
इस शांत और लाचार युवा से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। स्वामी जी ने युवाओं को ललकारते हुए कहा था, ‘‘तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कूद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उद्धार करने में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर - गुल मचाओ की उसकी आवाज दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नहीं चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो। तूफान मचा दो तूफान!’’
रोटी और डिग्री के पीछे भागते युवाओं को पुकारते हुए स्वामी जी ने कहा था,‘‘मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और अन्य लोग भी आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार-बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?
और तुम लोग क्या कर रहे हो?!! जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालों, तुम लोग क्या हो? जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालों, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूड़ा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो?! किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी-गिरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी-जान से तड़प रहे हो -- यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्ड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तड़पते हुए उन्हें घेरकर ‘रोटी दो, रोटी दो’ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को जड़-मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोड़ो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ़ रहे हैं। क्या तुम्हें मनुष्य से प्रेम है? यदि ‘हाँ’ तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हजार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क - वाले युवकों का, पशुओं का नहीं।’’
आज देश के समक्ष असंख्य चीखते सवाल हैं। बेरोजगारी, भुखमरी, लाचारी, बेगारी, महंगाई।।। और भी ना जाने क्या-क्या? है कोई विकल्प किसी के पास? आज युवा, नरेन्द्र नाथ दत्त तो हैं, लेकिन ना उस नरेन्द्र में विवेकानंद बनने की युयुत्सा है और ना ही किसी परमहंस में आज देश-हित को निज-हित से ऊपर मानकर किसी नरेन्द्र को विवेकानंद बनने की दीक्षा देने का साहस ही शेष है।
लेकिन फिर भी उम्मीद है, ‘‘कोई नरेन्द्र फिर से विवेकानंद बनेगा।’’

-Amit Tiwari
News Editor


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जौनपुर । महर्षि यमदग्नि की तपोस्थली व शर्की सल्तनत की राजधानी कहा जाने वाला प्राचीन काल से शैक्षिक व ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्धिशाली शिराजे हिन्द जौनपुर आज भी अपने ऐतिहासिक एवं नक्काशीदार इमारतों के कारण न केवल प्रदेश में बल्कि पूरे भारत वर्ष में अपना एक अलग वजूद रखता है। नगर में आज भी कई ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतें है जो इस बात का पुख्ता सबूत प्रस्तुत करती है कि यह नगर आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व एक पूर्ण सुसज्जित नगर रहा होगा। शासन की नजरे यदि इनायत हो और इसे पर्यटक स्थल घोषित कर दिया जाय तो स्वर्ग होने के साथ बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने का माद्दा इस शहर में आज भी है। नगर के ऐतिहासिक स्थलों में प्रमुख रूप से अटाला मस्जिद, शाही किला, शाही पुल, झंझरी मस्जिद, बड़ी मस्जिद, चार अंगुली मस्जिद, लाल दरवाजा, शीतला धाम चौकिया, महर्षि यमदग्नि तपोस्थल, जयचन्द्र के किले का भग्नावशेष आदि आज भी अपने ऐतिहासिक स्वरूप एवं सुन्दरता के साथ मौजूद है। इसके अलावा चार दर्जन से अधिक ऐतिहासिक इमारते यहां मौजूद है जिनमें से कुछ रखरखाव के अभाव में जर्जर हो गये है।

देश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रचलित काशी जनपद के निकट होने के कारण दूसरे प्रांतों के अलावा कभी-कभी विदेशी पर्यटक यहां आकर ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण कर यहां की संस्कृति की सराहना करने से नहीं चूकते लेकिन दूसरी तरफ शासन द्वारा पर्यटकों की सुविधा के मद्देनजर किसी भी प्रकार की स्तरीय व्यवस्था न किये जाने से उन्हे काफी परेशानी भी होती है।

हालांकि जनपद को पर्यटक स्थल के रूप में घोषित कराने का प्रयास कुछ राजनेताओं व जिलाधिकारियों द्वारा किया गया लेकिन वे प्रयास फिलहाल नाकाफी ही साबित हुये। एक बार फिर मुलायम सरकार के कार्यकाल में जौनपुर शहर को पर्यटक स्थल घोषित किये जाने सम्बन्धी बातें प्रकाश में आयी थी, जिसमें केन्द्रीय पर्यटन विभाग द्वारा अटाला मस्जिद, राजा साहब का पोखरा, शाही पुल व गोमती नदी के किनारे घाटों के सौ‌र्न्दीयकरण हेतु लगभग पांच करोड़ रुपया भी आया था लेकिन काम जो भी चल रहा है वो जरुरत से ज्यादा धीमा रहा और वर्तमान में बंद हो गया। राजनेताओं द्वारा किये जाने वाले आधे-अधूरे प्रयास में यदि समय रहते पूरी रुचि दिखायी जाय तो संभवत: जौनपुर शहर को पर्यटक स्थल के रूप में घोषित किये जाने का स्वप्न साकार हो सकता है।

प्राचीन काल के जो भवन इस समय उत्तर भारत में विद्यमान है उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन अटाला मस्जिद शर्की शासनकाल के सुनहले इतिहास का आईना है। इसकी शानदार मिस्र के मंदिरों जैसी अत्यधिक भव्य मेहराबें तो देखने वालों के दिल को छू लेती है। इसका निर्माण सन् 1408 ई. में इब्राहिम शाह शर्की ने कराया था। सौ फिट से अधिक ऊंची यह मस्जिद हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली द्वारा निर्मित की गयी है जो विशिष्ट जौनपुरी निर्माण शैली का आदि प्रारूप और शर्कीकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। शर्कीकाल के इस अप्रतिम उदाहरण को यदि जौनपुर में अवस्थित मस्जिदों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व खूबसूरत कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसी प्रकार जनपद की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक नगर में आदि गंगा गोमती के उत्तरावर्ती क्षेत्र में शाहगंज मार्ग पर अवस्थित बड़ी मस्जिद जो जामा मस्जिद के नाम से भी जानी जाती है, वह शर्की कालीन प्रमुख उपलब्धि के रूप में शुमार की जाती है। जिसकी ऊंचाई दो सौ फिट से भी ज्यादा बताई जाती है। इस मस्जिद की बुनियाद इब्राहिम शाह के जमाने में सन् 1438 ई. में उन्हीं के बनाये नक्शे के मुताबिक डाली गयी थी जो इस समय कतिपय कारणों से पूर्ण नहीं हो सकी। बाधाओं के बावजूद विभिन्न कालों और विभिन्न चरणों में इसका निर्माण कार्य चलता रहा तथा हुसेन शाह के शासनकाल में यह पूर्ण रूप से सन् 1478 में बनकर तैयार हो गया। इन ऐतिहासिक इमारतों के अनुरक्षण के साथ ही साथ बदलते समय के अनुसार आधुनिक सुविधा मुहैया कराकर इन्हे आकर्षक पर्यटक स्थल के रूप में तब्दील किया जा सकता है।

नगर के बीचोबीच गोमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित उत्थान-पतन का मूक गवाह 'शाही किला' आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। इस ऐतिहासिक किले का पुनर्निर्माण सन् 1362 ई. में फिरोजशाह तुगलक ने कराया। दिल्ली व बंगाल के मध्य स्थित होने के कारण यह किला प्रशासन संचालन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण था। इस शाही पड़ाव पर सैनिक आते-जाते समय रुकते थे। किले के मुख्य द्वार का निर्माण सन् 1567 ई. में सम्राट अकबर ने कराया था। राजभरों, तुगलक, शर्की, मुगलकाल व अंग्रेजों के शासनकाल के उत्थान पतन का मूक गवाह यह शाही किला वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में है। इस किले के अन्दर की सुरंग का रहस्य वर्तमान समय में बन्द होने के बावजूद बरकरार है। शाही किले को देखने प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक आते रहते है।

महाभारत काल में वर्णित महर्षि यमदग्नि की तपोस्थली जमैथा ग्राम जहां परशुराम ने धर्नुविद्या का प्रशिक्षण लिया था। गोमती नदी तट पर स्थित वह स्थल आज भी क्षेत्रवासियों के आस्था का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि उक्त स्थल के समुचित विकास को कौन कहे वहां तक आने-जाने की सुगम व्यवस्था आज तक नहीं की जा सकी है। झंझरी मस्जिद, चार अंगुली मस्जिद जैसी तमाम ऐतिहासिक अद्वितीय इमारतें है जो अतीत में अपना परचम फहराने में सफल रहीं परन्तु वर्तमान में इतिहास में रुचि रखने वालों के जिज्ञासा का कारण होते हुए भी शासन द्वारा उपेक्षित है।

मार्कण्डेय पुराण में उल्लिखित 'शीतले तु जगन्माता, शीतले तु जगत्पिता, शीतले तु जगद्धात्री-शीतलाय नमो नम:' से शीतला देवी की ऐतिहासिकता का पता चलता है। जो स्थानीय व दूरदराज क्षेत्रों से प्रतिवर्ष आने वाले हजारों श्रद्घालु पर्यटकों के अटूट आस्था व विश्वास का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। नवरात्र में तो यहां की भीड़ व गिनती का अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता है।

इस पवित्र धार्मिक स्थल के सौन्दर्यीकरण हेतु समय-समय पर स्थानीय नागरिकों द्वारा न केवल मांग की गयी बल्कि शासन द्वारा भी समय-समय पर आश्वासनों का घूंट पिलाया गया। पिछले कुछ वर्ष पूर्व एक जनप्रतिनिधि की पहल पर शीतला धाम चौकियां के समग्र विकास हेतु एक प्रोजेक्ट बनाकर शासन द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत कराने का प्रयास प्रकाश में आया था लेकिन पर्यटन विभाग की फाइलों में कैद उक्त महत्वाकांक्षी योजना न जाने किन कारणों के चलते अमली जामा नहीं पहन सकी। इस स्थल के सौन्दर्यीकरण के लिए पर्यटन विभाग द्वारा यदि अपेक्षित प्रयास किया जाय तो निश्चित ही बड़ी संख्या में यहां आने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों को जहां सुविधा होगी वहीं उनकी संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी तय है।

शिराज-ए-हिन्द जौनपुर की आन-बान-शान में चार चांद लगाने वाला मध्यकालीन अभियंत्रण कला का उत्कृष्ट नमूना 'शाही पुल' पिछली कई सदियों से स्थानीय व दूरदराज क्षेत्रों के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। भारत वर्ष के ऐतिहासिक निर्माण कार्यो में अपना अलग रुतबा रखने वाला यह पुल अपने आप में अद्वितीय है। वही खुद पयर्टकों का मानना है कि दुनिया में कोई दूसरा सड़क के समानान्तर ऐसा पुल देखने को नहीं मिलेगा।

शहर को उत्तरी व दक्षिणी दो भागों में बांटने वाले इस पुल का निर्माण मध्यकाल में मुगल सम्राट अकबर के आदेशानुसार मुनइम खानखाना ने सन् 1564 ई. में आरम्भ कराया था जो 4 वर्ष बाद सन् 1568 ई. में बनकर तैयार हुआ। सम्पूर्ण शाही पुल 654 फिट लम्बा तथा 26 फिट चौड़ा है, जिसमें 15 मेहराबें है, जिनके संधिस्थल पर गुमटियां निर्मित है। बारावफात, दुर्गापूजा व दशहरा आदि अवसरों पर सजी-धजी गुमटियों वाले इस सम्पूर्ण शाही पुल की अनुपम छटा देखते ही बनती है।

इस ऐतिहासिक पुल में वैज्ञानिक कला का समावेश किया गया है। स्नानागृह से आसन्न दूसरे ताखे के वृत्त पर दो मछलियां बनी हुई है। यदि इन मछलियों को दाहिने से अवलोकन किया जाय तो बायीं ओर की मछली सेहरेदार कुछ सफेदी लिये हुए दृष्टिगोचर होती है किन्तु दाहिने तरफ की बिल्कुल सपाट और हलकी गुलाबी रंग की दिखाई पड़ती है। यदि इन मछलियों को बायीं ओर से देखा जाय तो दाहिने ओर की मछली सेहरेदार तथा बाई ओर की सपाट दिखाई पड़ती है। इस पुल की महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कला की यह विशेषता अत्यन्त दुर्लभ है।

साभार :- जागरण

संकलन :- अविनाश कुमार

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बढ़ती महंगाई ने गरीब तबके, निम्न मध्यवर्ग और निश्चित आय वर्ग के लोगों के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। विडम्बना यह है कि इस संकट का आर्थिक समाधान तलाश करने की जगह इसको भी राजनीति के गलियारे में घसीटा जा रहा है। इससे कतिपय राजनीतिक लाभ तो अर्जित किया जा सकता है लेकिन देश के आम आदमी को राहत तो कत्तई नहीं दी जा सकती। सरकार अगर यह कहती है कि महंगाई वैश्विक कारणों से बढ़ रही है तो वह गलत नहीं कह रही है। गलत सिर्फ इतना है कि वैश्वीकरण के नशे में सिर्फ इसी सरकार ने नहीं, अपितु इसके पहले की कई सरकारों ने हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों बेंच दिया। वैश्वीकरण का विरोध नहीं किया जा सकता लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के मूल्य पर नहीं होना चाहिए। फिलहाल बढ़ती महंगाई ने आम आदमी को अपने क्रूर पंजों में दबोच लिया है। उसे मुक्त कराने के लिए राजनीति की जरूरत नहीं है, एक विशुद्ध देसी अर्थशास्त्र की जरूरत है।उज्जैन में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाषण देते समय यह आरोप लगाया कि महंगाई केन्द्र सरकार की वजह से नहीं बल्कि राज्य सरकार की नीतियों की वजह से बढ़ी है। ऐसे मे आरोप-प्रत्यारोप को दरकिनार कर एक कारगर नीति-निर्धारण के लिए आगे कौन आयेगा। इन्हीं सोनिया के एक पुराने पिट्ठू और मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्याज के महंगे होने को भाजपा की केन्द्र सरकार की करतूत बताकर यहाँ का विधानसभा चुनाव जीत लिया था और इस प्रदेश की जनता की पाँच सालों तक जमकर ऐसी की तैसी की थी। अब सोनिया हमें बता रही हैं कि बेचारगी में रहने वाली प्रदेश सरकार हमारा शोषण कर रही है और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पाक-साफ हैं, जबकि आंकड़े कुछ और ही बयान कर रहे हैं। भारत में 400 प्रकार के कर (टैक्स) हैं, जो यहाँ का बेचारा आम आदमी चुकाता रहता है। इतने विविध प्रकार के कर तो पूरे संसार में कहीं नहीं हैं। यह कर मुख्य रूप से दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में लगे। एक नरसिंहा राव और दूसरे मनमोहन सिंह के। दोनों में ही मनमोहन सिंह उभयनिष्‍ठ हैं, क्योंकि वो राव सरकार में वित्तमंत्री थे। भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की चौथे नंबर की बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन -पर कैपिटा इनकम- यानी प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह विश्व का 133 वें नंबर का देश है। वित्तमंत्री अपने मुखिया मनमोहन के साथ मिलकर भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने पर तुले हुए हैं। लेकिन भइया जब घरों में रोटी ही नहीं बचेगी तो क्या करोगे महाशक्ति बनकर। दूसरा आप लोग महंगाई बढ़ने के प्रतिशत का जो हो-हल्ला आजकल सुन रहे हैं, उसमें भी सच्चाई नहीं है।
महंगाई बढ़ने का जो प्रतिशत भारत में मापा जाता है वह होलसेल रेट का होता है। यानी कीमतें 19 फीसदी तो होल-सेलर को महंगी पड़ेंगी, हम आम उपभोक्ता को तो यह 30-40 फीसदी तक महंगी पड़ेंगी। यह पद्धति भारत में ही अपनाई जाती है, यूरोप में होल-सेल की बजाय रिटेल रेट (जिनपर हम आम उपभोक्ता निर्भर करते हैं) के आधार पर ही महंगाई मापी जाती है। भारत में ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इतनी महंगाई बता दी जाए तो यहाँ हाहाकार मच जाए, जबकि होल-सेल वाली बात आम आदमी को समझ ही नहीं आएगी और आंकड़ों के जाल में वह उलझा रहेगा।
इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता हैं कि अगर दो साल पहले किसी व्यक्ति का वेतन 10000 रुपए था और वह अपने घर की गुजर-बसर इतने में कर लेता था, तो पिछले साल में जितनी महंगाई बढ़ी है उस हिसाब से अब उसे अपने उसी प्रकार के रहन-सहन को मैंटेन करने में 14000 रुपयों की जरूरत पड़ेगी। तो दोस्तों महंगाई तो 40 फीसदी बढ़ गई और क्या आप या हममें में से किसी दोस्त का वेतन 40 फीसदी बढ़ा ? तो इसका मतलब आप-हम लोग जीवन में आगे बढ़ने के बजाए पीछे जा रहे हैं और अपने पुराने रहन-सहन को मैंटेन करने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं।
एक आम भारतीय के लिये भोजन की थाली अब 40 प्रतिशत महंगी हो गई है।पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष महंगाई का औसत दो गुने से ज्‍यादा हो गया है। पिछले वर्ष चीनी का मूल्य 18 रु. किलो था, जो इस वर्ष 48 रु. हो गया है। इसी प्रकार गत वर्ष दाल का मूल्य 40 रु किलो था जो वर्तमान में 100 रु. है ! आलू भी पिछले वर्ष 30 रु में पांच किलो मिल जाता था जो कि अब 70 रु. में मिलता है,टमाटर का मूल्य पिछले वर्ष 7 रु. किलो था जो कि वर्तमान में 5 रु में 250 ग्राम ही मिलता है ! मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि लगभग हर वस्तु के मूल्य में दो गुने से ज्‍यादा की वृद्धि हुई है ! इस बढ़ती महंगाई से तो सरकारी पदाधिकारियों को ज्यादा समस्या नहीं हो रही होगी क्योंकि सरकार द्वारा लागू किए गए छठे वेतन आयोग से सरकारी पदाधिकारियों के मासिक वेतन में वृद्धि हुई है जिससे कि वे इस महंगाई से निपटने में सक्षम हैं।
लेकिन मजदूर वर्ग और छोटे व्यापारियों का तो जीना दूभर हो गया है। वो इस महंगाई से लड़ने में असमर्थ हैं। एक मजदूर जिसकी मासिक आय महज 3000 रु. है और उसके घर के सदस्यों की संख्या 8 है, तो ऐसे में वह अपने परिवार के लिए पौष्टिक भोजन की भी व्यवस्था नहीं कर सकता तो वह अपने बच्चों को शिक्षा कैसे दिला पाएगा? मान लीजिए उसके घर में प्रतिदिन के भोजन की मात्रा डेढ़ किलो आटा , 50 ग्राम चीनी, 150 ग्राम दाल और एक किलो ग्राम दूध है , जिनकी मासिक लागत क्रमशः आटा =675 रु , दाल = 450 रु, चीनी = 80 रु , और दूध = 900 रु है ! इनका मासिक योग = 2105 रु होता है, जिसमें अभी ईंधन और तेल, मसाला आदि मूल्य नहीं जोड़ा गया है।स्थिति की भयावहता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
हम और हमारी आर्थिक नीतियां अब अमेरिका और वर्ल्‍ड बैंक की गिरफ्त में हैं। ऐसे में किसी इकोनॉमिक रिजोल्यूशन की अपेक्षा की जाए,जो हमारे घर के चूल्हे को ही बुझा दें, हमारे बच्चों को अच्छे स्कूलों से महरूम कर दें और हमें अपने लिए एक अदद मकान तक नहीं बनाने दें। सरकार ने जब पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में इजाफा किया था, तो यह सहज रूप से माना जा रहा था कि मुद्रास्फीति घटने की जगह और बढ़ेगी। लेकिन वह इस तेजी से बढ़ेगी और सारे कयासों को हैरत में डालती एकाएक दहाई का आँकड़ा पार कर जायेगी, यह किसी के अनुमान में नहीं था। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 19 प्रतिशत पर पहुँच गई। यह स्पष्ट करता है कि मौजूदा समय में महंगाई पिछले 13 वर्षों के रिकार्ड स्तर पर है। सर्वाधिक बढ़ोत्तरी ईंधन और ऊर्जा समूह में दर्ज की गई है जिसका सूचकांक पहले के मुकाबले 7.8 प्रतिशत उछला है। महंगाई दर के इस इजाफे के बारे में उद्योग चैम्बरों का कहना है कि मुद्रास्फीति संभवत सरकार के हाथ से बाहर जा चुकी है। उनका यह भी मानना है कि इसकी वजह से आर्थिक विकास दर में भी गिरावट आएगी।
मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी का यह क्रम हालाँकि मार्च महीने में सरकार के बजट पेश करने के बाद से ही लगातार जारी है, लेकिन एकाएक इतनी छलांग की उम्मीद सरकार के अर्थशास्त्रियों को कत्तई नहीं थी। अगर बढ़ोत्तरी का यह क्रम यथावत बना रहा तो वैश्विक स्तर पर छलांग लगाती देश की अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुँचेगी तथा विकास की सारी संकल्पनायें बीच रास्ते दम तोड़ देंगी। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री सहित सारे व्यवस्थापक शुरू से एक ही राग अलाप रहे हैं कि सरकार बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करने का हर स्तर पर प्रयास कर रही है। इसके अलावा रिजर्व बैंक द्वारा किए गए मौद्रिक उपाय भी कारगर परिणाम देते दिखाई नहीं देते।
अब यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि महंगाई के शिखर छूते कदमों ने देश को एक अघोषित आर्थिक आपातकाल के गर्त में झोंक दिया है। इसकी बढ़ोत्तरी ने अब तक के स्थापित अर्थशास्त्र के नियमों को भी खारिज कर दिया है। अर्थशास्त्र की मान्यता है कि वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों पर आधारित होता है। यानी कि जब बाजार में मांग के अनुपात में वस्तु की उपलब्धता अधिक होती है तो उसके मूल्य कम होते हैं। वहीं जब बाजार में उस वस्तु की आपूर्ति कम होती है तो उसके मूल्य बढ़ जाते हैं। लेकिन इस महंगाई पर यह नियम लागू नहीं होता। इसे आश्चर्यजनक ही माना जाएगा कि बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में है। कोई भी व्यक्ति जितनी मात्रा में चाहे, बहुत आसानी से उतनी मात्रा में खरीद कर सकता है, फिर भी उनके दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इससे यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि वस्तुओं की उपलब्धता कहीं से बाधित नहीं है। अतएव बढ़ती महंगाई की जिम्मेदार कुछ अन्य ताकतें हो सकती हैं, जिनकी ओर हमारे सरकारी व्यवस्थापकों का ध्यान नहीं जा रहा है। होने को तो यह भी हो सकता है कि उदारीकरण के वरदान से पैदा हुए इन भस्मासुरों की ताकत अब वर-दाताओं के मुकाबले बहुत अधिक हो चुकी हो और उस ताकत के आगे वे अपने को निरुपाय तथा असहाय महसूस कर रहे हों। सच तो यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सिंडिकेट के हाथों अब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था है और वे अंधाधुंध मुनाफा कमाने की गरज से विभिन्न उत्पादों के दामों में इजाफा करते रहते हैं।

- News Desk

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एड्स -- दूर होती जिन्‍दगी..

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/22/2010 08:05:00 AM 0 comments


‘‘एड्स का प्रभावी प्रबंध-सम्बंध जीवनसाथी के संग’’
ये पंक्तियां एक सरकारी विज्ञापन में देखकर मेरे अन्तर्मन में सहसा ये विचार आया कि एड्स नामक महामारी मनुष्य स्वच्छंदता एवं चरित्रहीनता पर लगाम लगाने का एक जरिया है। हमारे पुराणों के अनुसार सृष्टि की रचना के साथ ही भगवान ने अर्थात अदृश्य शक्ति ने मनुष्य की रचना की तथा उसे अपनी सर्वश्रेष् कृति बनायी। मनुष्यों में स्त्री तथा पुरूष को एक दूसरे का पूरक बनाया, जिनके बीच मानसिक एवं शारीरिक सम्बंधों की नींव रखी, ताकि वे आपसी सम्बंधों द्वारा अपने वंश का संचालन कर सके। इस सबके साथ ही साथ प्रदान की सोचने की शक्ति। अपनी इसी शक्ति का प्रयोग करके मानव ने आग से लेकर हवाई जहाज तक के अविष्कार किये, परन्तु इसी सोच का नकारात्मक पहलू उसकी इच्छाओं का भण्डार तथा विघ्वंशक सोच थी। इन्हीं इच्छाओं में छिपी थी वासना की भावना, जिसने प्रारंभ में मनुष्य को अपना वंश बढ़ाने का माध्यम दिया परन्तु कालान्तर में जब जनसंख्या चरम पर आने लगी, परन्तु वासना की भावना भी उत्कर्ष पर थी, तब प्रारंभ हुआ वेश्यावृत्ति एवं अवैध सम्बन्धों का दौर। मनुष्य के चरित्र-पतन की इस सीढ़ी ने कई सोपान तय किये और जब ये चारित्रिक-पतन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा तब एड्स का प्रवेश हुआ एक महामारी के रूप में। एक महामारी, जो दबे पांव आई और ना जाने कितनों को आगोश में ले लिया।
एड्स के तमाम जगरूकता अभियानों के बावजूद ना एड्स के मामले नियंत्रित हो पा रहे हैं ना ही इसके प्रति सामाजिक सोच में कोई परिवर्तन लाने में सफलता मिल सकी है।
भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान (नाको) के एक सर्वेक्षण के अनुसार आज तक भी समाज का एक बड़ा वर्ग एच.आई.वी. पोजीटिव लोगों को हेय दृष्टि से देखता है। इनमें भी पुरूषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा अपमान और कंलक के साथ जीना पड़ता है। समाज के इस रवैये का कारण लोगों में एड्स को लेकर जागरुकता का अभाव है।
अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देंखे तो एड्स एक विषाणु जनित रोग है, इसका विषाणुमानव प्रतिरक्षा अपूर्णता विषाणु’ (Human Immunodeficiency virus) है। इसका सबसे पहला मामला 1981 में कैलिफोर्निया में प्रकाश में आया था, तथा भारत में पहला मामला 1986 में चेन्नई में प्रकाश में आया था। बस अपने दो-ढाई दशकों के इतिहास में इसने पूरी दुनिया को हिला दिया। इसका विषाणु हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करके रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा देता है, जिससे रोगी क्षयरोग, कैंसर आदि बिमारियों का शिकार हो जाता है और धीरे-धीरे मौत के आगोश में चला जाता है और इसका दुखद पहलू ये है कि भगवान का रुप माना जाने वाला चिकित्सक भी असहाय सा रोगी की इस घुटन भरी खत्म होती जिन्दगी को देखता रह जाता है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले ये बिमारी कुछ समलैंगिकों में देखी गयी और समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध उठाया गया कदम है। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि प्रकृति की इस चेतावनी को भी हम मनुष्यों ने नजरअंदाज कर दिया और इसका परिणाम कई बेकसूरों को भुगतना पड़ा जो अनजाने ही, बिना किसी गलती के इसका शिकार होते चले गये। प्रकृति की इस चेतावनी को हमें सुनना ही होगा।
आंकड़े यह बात स्पष्ट करते हैं कि समलैंगिक संबंधो के कारण 5 से 10 प्रतिशत एड्स के मामले सामने आये हैं। स्वास्थ्य संबधी असुरक्षा के कारण 5 से 10 प्रतिशत जबकि लगभग 11 प्रतिशत मामले संक्रमित माता या पिता से उनकी संतानों को तथा शेष दो तिहाई के लगभग संक्रमण असुरक्षित यौन सम्बंधों के कारण से फैलता है।
UNAIDS के सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 31.3 मिलियन वयस्क और 2.1 मिलियन बच्चे 2008 के अन्त तक एड्स से पीड़ित थे। अकेले सन् 2008 में ही एड्स के 2.7 मिलियन नये मामले प्रकाश में आये। सन् 2008 में ही लगभग 2 मिलियन लोगों की मृत्यु एड्स के कारण हुई। एड्स से ग्रस्त लोगों में ज्यादातर लोग 20 से 25 साल की उम्र के हैं। "Global patterns of mortality in young people- a systematic analysis of population health" के अनुसार 20 से 25 वर्ष की उम्र में होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण एड्स ही होता है। 2007 के अन्त तक 18 वर्ष से कम उम्र के लगभग 15 मिलियन बच्चे एड्स के कारण अनाथ हो चुके थे। सन् 2008 तक 14 वर्ष या उससे कम उम्र के लगभग 4 करोंड़ बच्चे एड्स से ग्रस्त हो चुके थे।
हालांकि सरकार विभिन्न संचार के माध्यमों के इस्तेमाल करके लोगों को एच आई वी एड्स के बारे में सही जानकारी दे रही है। बावजूद भी ज्यादातर लोग इसे छुआछूत की बीमारी मानते हैं। एड्स फैलने की मुख्य वजह है असुरक्षित यौन सम्बंध। एच आई वी के ज्यादातर मामले असुरक्षित यौन संबधो के कारण ही होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से यौन संबंध के समय पुरूषों को कॉण्डोम का इस्तेमाल करना चाहिए। इसी मुद्दे पर समाज की नैतिकता आड़े जाती है। लोग इस पर बात करना बंद कर देते है। इससे उन्हें लगता है कि समाज में अश्लीलता पैदा होती है। इसलिए जब भी स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देने की बात उठती है, हंगामा खड़ा हो जाता है यही वजह है कि एड्स का शिकार बनने वालों में किशोरों की संख्या बहुत ज्यादा है।
नाको ( NACO) की रिपोर्ट के मुताबिक एड्स के मामले में करीब एक तिहाई 15 से 19 साल के किशोर हैं। यह बात बेहद खतरनाक हैं। लगभग यही हाल महिलाओं का भी है, कम उम्र में शादी, अज्ञानता और समाजिक गैर बराबरी के चलते महिलाओं एवं लड़कियों में एच आई वी के संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है। हालात यह है कि हर 5 में से एक महिला एच आई वी के रोग से पीड़ित है। इसकी वजह केवल असुरक्षित यौन संबंध ही नहीं है, बल्कि संक्रमित खून या अन्य स्वास्थ्य संबंधी लापरवाहियों से भी एच आई वी एड्स के फैलने की संभावना रहती है। अगर हम थोड़ी सी सावधानी बरतें तो इस भयानक बीमारी से बच सकते हैं यह सभी देशों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसके बचाव का एक ही तरीका है सही और सटीक जानकारी उचित सावधानियां बरतनी चाहिए एच आई वी एड्स के खिलाफ जोरदार मुहिम के साथ - साथ लोगों में भी इसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करनी होगी। संयम और सदाचरण ही वो अस्त्र है जिसके समक्ष एड्स रुपी दानव बेबस और असहाय हो जाता है। एक कवि ने सत्य ही लिखा है -
आज का दौर,
एड्स का दौर है,
एक ही शोर है
एड्स से बचने के लिये
यह करो वह करो
पर कोई नहीं कहता
चरित्र ऊंचा करो।


- Shahnaz Ansari


NIRMAN SAMVAD

(तस्‍वीर गूगल सर्च से साभार)

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मैं निर्दोष हूं.. तो दोषी कौन ?

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/21/2010 10:51:00 PM 0 comments


जिस प्रकार अफ्रीकी देशों जांम्बिया, कांगो, नाईजीरिया, सिएरा, लीयॉन, अंगोला, लाईबेरिया में प्राकृतिक खनिज संपदा से भरपूर होने के बावजूद भी विकास की रोशनी नहीं दिखाई देती, जिस प्रकार नाइजीरिया में दुनियाँ का दसवाँ सबसे बड़ा तेल भंडार होने के बाद भीनाइजर डेल्टाके नागरिक आदिम युग में जी रहे हैं, उसी प्रकार भारत की सारी खनिज संपदा का चालीस प्रतिशत भाग अपने गर्भ में संजोये हुए झारखंड विकसित राज्य की श्रेणी से कोसों दूर विकासशील राज्यों की सच्चाई से भी अभी बहुत दूर है। चिंता की बात यह है कि प्रतिवर्ष 6 हजार करोड़ रुपये का खनिज उत्पादन करने वाला यह राज्य गरीबी, भूखमरी एवं बेरोजगारी से तंग आकर नक्सलियों के चपेट में बुरी तरह फंस गया है। क्योंकि नार्वे जो दुनियाँ का तीसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है और बोत्सवाना जो हीरे जैसी सम्पदा से भरपूर है, के ईमानदार नेताओं जैसा झारखंड को नेता नहीं मिला, जो ईमानदारी एवं अपनी दूर दृष्टि से नार्वे और बोत्सवाना जैसी तरक्की जैसी ऊँचाई बुलंद करता। मधु कोड़ा ही नहीं बल्कि दूरसंचार मंत्री राजा के ऊपर 2 जी स्पेक्ट्रम में अरबों रुपये घोटाला करने का आरोप लगा और सी बी आई का मंत्रालय के मुख्यालय पर छापा पड़ा तो उन्होंने अपना ठीकरा राजग पर फोड़ते हुए पलटवार किया कि ‘‘भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार ने खास-खास कंपनियों को निशुल्क स्पेक्ट्रम आवंटित किया, जिसके फलस्वरूप सरकारी खजाने को एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।’’ ज्ञातव्य हो कि राजा ने 2007 में संचार मंत्री के रूप में 2001 की कीमत पर 2 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया था, जिससे कुछ कंपनियों ने अपनी हिस्सेदारी का कुछ प्रतिशत बेच कर हजारों करोड़ रुपये कमाया।
मधु कोड़ा के आय से अधिक संपत्ति के मामलें में 31 अक्टूबर 2009 को आयकर विभाग के 400 अधिकारियों के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी ने झारखंड के अलावे दूसरे राज्यों के 8 शहरों स्थित 70 ठिकानों पर एक साथ छापा मारकर उनके विदेशों में अरबों रुपये की संपत्ति का दस्तावेज हाथ लगने का दावा किया है। जहाँ एक तरफ देश के अंदर कोड़ा की संपति का पता लगाने के लिए आयकर विभाग की वाराणसी, मेरठ, इलाहाबाद, गोरखपुर, लखनऊ, आगरा एवं राँची की टीमों ने संयुक्त रूप से 19 नवम्बर 2009 को 18 जगहों पर एक साथ छापा मारा तो दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय विदेशों में उनकी अकूत संपति के सबूत जुटाने के लिए एड़ी चोटी एक किए हुए है। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार लाईबेरिया, दुबई और कंबोडिया जैसे देशों को मधु कोड़ा के संपति के बारे में विस्तृत जानकारी देने हेतु अनुरोध पत्र भेजा जा रहा है। लेकिन मधु कोड़ा खुले आम चुनाव प्रचार के दौरान यह कहा ‘‘मैं निर्दोष हूँ’’ यही नहीं उन्होंने यहाँ तक कहा है कि हवाला के माध्यम से अगर विदेशों में पैसे जमा कराये गए तो उसमें नेताओं की लंबी सूची है। आखिर जनता यह चूहा-बिल्ली का खेल कबतक देखती रहेगी ? क्या लोग कभी भी सच्चाई को सामने पा सकेगें ? मधु कोड़ा द्वारा दिये गए बयान में जिन नेताओं की ओर इशारा है, क्या उनकी पूरी सच्चाई जनता के सामने सकेगी ? या फिर अन्य घोटालों की तरह इस घोटाले को भी रफा-दफा कर दिया जाएगा ? दूरसंचार मंत्री को भारत के प्रधान मंत्री क्लीन चिट दे रहें हो और वित्त मंत्री सफाई देते नजर रहे हों तो मधु कोड़ा द्वारा बयान ‘‘मै निर्दोष हू’’ सच भी हो तो जनता जानना जरूर चाहेगी कि आखिर दोषी कौन है ? राज्य और देश को दीमक की भांति चाटने वाले भ्रष्ट नेतागण, चोर पदाधिकारी एवं बेईमान व्यापारी आखिर कानून की पकड़ से कबतक आँख मिचैली करते रहेंगे ?
सवाल झारखंड के पूर्व मुख्य मंत्री या भारत के दूरसंचार मंत्री के द्वारा किए गए घोटाले का नहीं बल्कि सच्चाई सामने आने का है और कोड़ा के अनुसार अगर और लोग इस घोटाले में शामिल हैं, तो सरकार को उन सभी को कानूनी शिकंजे में लाना चाहिए। फिर दूरसंचार मंत्री का आरोप कि राजग सरकार के निशुल्क बाँटे गए स्पेक्ट्रम से सरकारी खजाने को हुए एक लाख साठ हजार करोड़ के नुकसान की भी उच्चस्तरीय जाँच होनी चाहिए और दोषी को अवश्य सजा मिलनी चाहिए क्योंकि सरकारी उपक्रम मंत्रियों, नेताओं या नौकरशाहों की बपौती संपति नहीं जिसे जैसे चाहे, जब चाहे उसे निलाम कर दें या बेच डालें।
वस्तुतः सरकारी उपक्रम जनता की धरोहर है, जिसकी रक्षा करना नेताओं या नौकरशाहों का परम् दायित्व है लेकिन आजकल सरकारी उपक्रम को सरकार उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के नाम पर धड़ल्ले से जिस प्रकार औने-पौने दाम पर बेच रही है, स्पेक्ट्रम इसका एक उदाहरण मात्र है। इससे प्रतीत होता है कि जनता की संपत्ति की ये लोग ट्रस्टी के रूप में रक्षा नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी संपति की तरह उपयोग कर रहे हैं। यही नहीं दूसरे पर गलती थोपकर अपनी गलती से किसी को वरी नहीं किया जा सकता। लगता है भारतीय भ्रष्ट नेताओं, बेईमान पदाधिकारियों एवं चोर व्यापारियों के लालच एवं बेशर्मी से तंग आकर स्विस बैंको के एसोसिएशन के प्रमुख पैट्रिक ओडियर ने भी अपना सर शर्म से झुका लिया और कहा कि स्विटजरलैंड के बैंको में अब जमा करने वाले विदेशियों के बारें में विदेश में व्यक्तिगत कर संबंधी दायित्वों की सूचना मांगने के बारे में विचार किया जा रहा है, लेकिन स्विटजरलैंड सरकार के साथ जिस सरकार का द्विपक्षीय समझौता होगा, उसपर ही यह नियम लागू होगा।

- Arvind Panjiyara


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जीती जा सकती है जंग भूख से ...

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/21/2010 10:20:00 PM 0 comments


जब भारत जैसे देश को चावल - चीनी का आयात करने की आवश्यकता पड़ जाये। जब एक कृषि प्रधान देश में आत्महत्या करने वाले किसानों का आंकड़ा बढ़कर लाखों में पहुँच जाये। जब एक ओर बुंदेलखंड जैसे तमाम हिस्सों में भुखमरी का दौर चल रहा हो और दूसरी जगह कहा जाए कि यह हमारी सामयिक समस्यायें हैं जिन्हें सुलझा लिया जायेगा। क्या स्थिति इतनी ही सहज और सरल है?
किसानों की आत्महत्या का क्रम बरकरार है। खेती किसान के लिए घाटे का सौदा बन रही है। वह खेती करता है, क्योंकि वह कुछ और नहीं कर सकता है। वह जिन्दा है, क्योंकि मरा नहीं है। किसान उत्पाद का वाज़िब दाम मिलने के कारण बहाल और सामान्य निम्नवर्गीय जनसंख्या खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्यों के चलते भुखमरी के कगार पर खड़ी है। खेती बिचौलियों के लिए लाभ का माध्यम बन गयी है। उच्चवर्ग तमाम प्रश्नों और समस्याओं से बेखबर। एक ओर सकल घरेलु उत्पाद में कृषि का कम होता योगदान और दूसरी ओर भुखमरी की विकराल होती समस्या।
समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। भूख एक वैश्विक प्रश्न बन गया है। सयुंक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट में वर्तमान वैश्विक खाद्य समस्या को भूख की एक शान्त सुनामी का नाम दिया है। रिपार्ट के अनुसार खाद्य समस्या के कारण लगभग 40 मीलियन लोगों को अपना भोजन कम करना पड़ रहा है तथा विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग छठवां हिस्सा भुखमरी की चपेट में है।
तीसरी दुनिया के तमाम देश भुखमरी की हृदय विदारक स्थिति में जीने के लिए अभिशप्त हैं।
जहां एक ओर दुनिया की लगभग 17 फीसदी आबादी भूखी है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की समस्या-समाधान के नाम पर चीन आदि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैव ईधन का शिगूफा छेड़े हुए हैं। गरीब देशों की आबादी भूखी सोने के लिए विवश है और अमीर देशों की जमात अपने आराम के लिए जैव ईंधन के उत्पाद के लिए लाखों टन खाद्यान्न को जला डाल रही है। रोज लाखों टन मक्के का इस्तेमाल जैव ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है।
यह तस्वीर आखिर क्या बयान करती है। यही नहीं तस्वीर के और भी रुख हैं। भारत के प्रख्यात रिसर्चर और लेखक देवेन्द्र शर्मा ने एक बातचीत के दरम्यान स्थिति को स्पष्ट करते हुए तस्वीर के ऐसे ही एक रुख की ओर इशारा किया था। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि विश्व में किसी भी प्रकार से अनाज की कमी नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी 6.7 अरब है, जबकि विश्व में कुल मिलाकर लगभग 11.5 अरब लोगों की जरूरत का अनाज पैदा हो रहा है। सच यह है कि विश्व का एक भाग अधिक खाद्यान्न का इस्तेमाल कर रहा है, यहां तक की खाद्यान्न का इस्तेमाल जैव ईंधन तक बनाने में कर रहा है, जबकि दूसरी ओर एक बड़ा हिस्सा खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। कमी खाद्यान्न की नहीं है बल्कि वितरण प्रणाली में कमी है। खाद्यान्न का विश्व में सही वितरण नहीं है। वैश्विक भुखमरी की समस्या से लड़ रहे तमाम वैश्विक संगठनों को यह सत्य स्वीकार करना होगा। खाद्यान्न वितरण पर कारपोरेट जगत तथा उच्च वर्ग के नियंत्रण को कम कर करके यदि खाद्यान्नों का पूरे विश्व में सही वितरण किया जाये तो भूख से यह जंग जीती जा सकती है।

-Amit Tiwari
News Editor

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शाम ढलते ही शमा जल उठती. परवाना शनैः-शनैः महफिल की ओर सरकता. घुंघरूं की बोलों में आमंत्रण होता. शमा-ए- महफिल के कद्रदानों की कमी नहीं होती. कोठों पर कद्र भी खूब था. ना लूट, ना खसोट.. बख्शिशों का सिलसिला थमता नहीं जब तक बलखाती वारांगना की कमर लचकती. अदा और अदावत का संगम बेहतरीन बनता. इन नाजनीनों का नखरा, श्रृंगार में तब्दील होता. सुरों में शाश्त्रीय संगीत का रस होता. सत्य था कि संगीत कंठों से निकलकर कोठों पर पहुँच गया. बावजूद सामवेद की ऋचाएं यूँ ही समझ की हद में आती.
पर आज सब कुछ बदला-बदला सा नजर आता है. कोठों से अब घुंघरू की आवाज सुनाई नहीं पड़ती. अब वहां से चीखें सुनाई पड़ती हैं.. लहूलुहान जिंदगी का आर्तनाद.. बदनाम गली की इस अँधेरी गुफा में मासूमों और बेसहारों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता...
मैं जी.बी. रोड पर इफ्तखार खान की चाय पी रहा हूँ. सामने खड़ी होती है सकीना. आगंतुक के इंतजार में थकी-थकी सी. जबरदस्ती प्रश्न करने के लिए मैं खड़ा था. . जी. बी. रोड के चहल पहल और कमाई के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा,‘‘यह भीड़ मेरे लिए नहीं है. इतनी दुकानें खुल गयी हैं. यहाँ मैं ही नहीं बिकती हूँ, यहाँ मोटर पार्ट्स और मशीनें भी बिकती हैं और जो ये तक-झांक वाले हैं, ये बिल्कुल ही छिछोरे हैं.
बेरोजगारी की स्थिति में ऐयाशी के लिए पैसा कहाँ? और जिनके पास पैसा है, वह यहाँ क्यों आयेंगे? हर गली-मोहल्ले में देह हाजिर है. घर ही कोठा हो गया. प्रोफेशनल को अब शारीरिक रिश्ते बनाने से परहेज कहाँ.
घरों में भी घुँघरू बजेंगे तो यहाँ कोई क्यों बीमारी खरीदे..’’
कोठा नं. 38 से 71 तक बासी जिंदगी पसरी हुई है. पहले पहाड़गंज के लक्कर बाजार में यह सब होता था. वहां का रेडलाईट एरिया अब कार्पोरेट एरिया में तब्दील हो गया है. जी. बी. रोड भी धीरे-धीरे बदनाम हुआ. शुरुआत में शहतारा गली के दादाओं की दादागिरी थी. उनकी मनमानी चलती थी. बगल में एक कॉलेज भी था. वहां के लड़के बहुत बदमाशी करते.
राजस्थान से लायी गयी पूनम बड़ी मुश्किल से बात करने के लिए तैयार होती है. वह बताती है कि,‘मात्र 10कोठों के पास लाइसेंस है, वो भी सिर्फ मुजरा के लिए. मुजरा तो केवल बहाना है. यहाँ वही होता है, जो अवैध है. कोई भी संगीत प्रेमी नहीं, सब शरीर प्रेमी हैं. मजबूरी में संगीत को साइड करके शरीर को सेल पर लगाती हूँ..’
हरिश्चंद्र कोठा की पहचान छीना-झपटी की नहीं है. वहां हाई प्रोफाइल लड़कियां हैं. आज यहाँ दलालों का मेला है. ग्राहक कम, दलाल ज्यादा है. पहले ग्राहक दलाल को खोजते थे, अब दलाल ग्राहक को खोजते हैं. कोई रिक्शा या अनजान आदमी जी.बी. रोड पर आया कि सब घेर लेते हैं.
यही रोज का किस्सा है.


-Vijayendra
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देह व्‍यापार की दारुण दास्‍तान

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/21/2010 02:15:00 PM 0 comments


बड़े भाग मानुष तन पावामें गोस्वामी तुलसीदास देह की महिमा का बखान करते हैं. इस दुर्लभ देह के लिए देवता भी लालायित रहते हैं. तुलसीदास किसी स्त्री-देह या अन्य देह की बात नहीं कर रहे हैं. इस देह की दुर्लभता पर तुलसीदास ही नहीं बल्कि व्यापार भी कई अर्थगीत लेकर सामने आया. पहले दैहिक सुखों के लिए बाजार आवश्यक था, अब बाजार के लिए देह आवश्यक हो गयी है.
अब देह, बाजार में है. बाजार देह का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा है. विज्ञापनों में, स्वागत में, हर ओर देह ही देह है. देह के बिना ना कोई विज्ञापन आगे बढ़ रहा है, ना ही तकनीक. आज हम देह-युग में जीने को अभिशप्त हैं. इसी देह-बोध से यह युग-धर्म संचालित है. धर्म हो या अर्थ, देह के बिना ना तो कोई मोक्ष देखता है, ना ही कोई दिखाता है.
देह को लेकर सदियों से संघर्ष होता रहा है. जमीन कम, जोरू के लिए ज्यादा ही जंग लड़े गए इस जगत में.
मेरे इस देह-गीत का लय केवल स्त्री-देह से जुड़ा हुआ नहीं है. आज देह-व्यापार का मायना बदल गया है. वेश्या यानि सिर्फ स्त्री नहीं, अब तो पुरुषों ने भी इस क्षेत्र में दखल दे दिया है. पुरुष वेश्या या वेश्या...
देह-व्यापार पुनः नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध के विमर्श से बाहर निकल, एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है.
इसी देह-बल पर साम्राज्यवाद आगे बढ़ा. साम्राज्य और संसाधन का विस्तार बाहु-बल के बिना कैसे संभव था? भौगोलिक साम्राज्यवाद के विस्तार का आधार था ही देह-बल. इसे नकारना तब भी संभव नहीं था.
आज आर्थिक साम्राज्यवाद का दौर है. इस दौड़ ने अराजक-भोग की ओर मानवी सभ्यता को धकेल दिया. यह मानवी-सभ्यता अनैतिकता और अवैधानिकता की दीवार तोड़ डालने की स्थिति में पहुँच गयी है. वेश्या, स्त्री हो या पुरुष सभी देह बेच रहे हैं. केवल बिपाशा ही नहीं सलमान, जॉन और अन्य खान की भी देह उघड़ रही है. इनकी नंगी होती छाती बाजार को बल प्रदान करने में लगी है. सौन्दर्य बेंचें या शरीर, सभी वेश्यावृत्ति का ही हिस्सा तो है. जिस द्रौपदी को दुशासन निर्वस्त्र नहीं कर सका, वह काम तो महज एक साबुन की टिकियालिरिलकर दे रहा है.
सोचना यही है कि इस देह का क्या करना है? इसे बाबु जी की सेवा में लगाया जाय, बाबा की भक्ति में झोंका जाए, बाजार के हवाले किया जाय या फिर विज्ञापन की उघड़ती दुनिया के वश में कर दिया जाय?
वैसे संस्कृति, सभ्यता, समाज, परिवार के नाम पर देह का खुदरा व्यापार तो हो ही रहा है. निजाम कल का हो या आज का, इनका इंतजाम बिना स्त्री-देह के कैसे पूरा हो सकता है? चाहे नाम जो हो, देह का इस्तेमाल जारी है. तवायफ का डायलॉग याद है ना? घोषित और अघोषित, हर स्त्री वेश्या की ही तरह है. असुरक्षा और मजबूरियों के बीच स्त्री की इच्छा और अनिच्छा का स्पेस ही कहाँ है?
बाजार में पुरुष दर पुरुष की यात्रा में लहूलुहान जिंदगी के भीतर की दास्ताँ क्या है? कौन इसे पढ़ना चाहेगा? कौन इनके जख्मों को सहलाएगा?
शायद कोई नहीं.....


-Vijayendra
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देश की सुरक्षा का सवाल किसी भी देश के लिए सबसे अहम सवाल होता है। आम तौर पर देशवासियों के अन्दर देशभक्ति की भावना काफी प्रबल होती है। शोषक-शासक समूह जनता की इसी भावना का इस्तेमाल कर अपने निहित हितों की पूर्ति के लिए तरह-तरह का अन्यायपूर्ण युद्ध लड़ता रहता है। हमारे देश के साम्राज्यवादपरस्त शासक समूह पहले बाहरी दुश्मनों - कभी पाकिस्तान तो कभी चीन और फिर कभी दोनों से खतरे की अन्तहीन बात किया करते थे। लेकिन फिलहाल उन्होंने देश के अन्दर ही अपना दुश्मन चुन लिया है। वे आजकल अपनी न्यायसंगत व जायज मांगों के लिए संघर्षरत जनता के विभिन्न समूहों को ‘देश की एकता व अखण्डता’ के लिए खतरनाक घोषित करने पर तुले हुए हैं। वे कभी आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए संघर्षरत विभिन्न उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं पर अपना निशाना साधते हैं तो कभी ‘देश की जनता की मुक्ति’ की लड़ाई लड़ने वाले माओवादियों पर। देश की जनता का जो समूह जितना ही जोरदार व जुझारू तरीके से संघर्ष करता है, शोषक-शासक वर्गों की राजसत्ता उन पर उतना ही तीखा हमला करती है। यह विचार पी.डी.एफ.आई. की अखिल भारतीय समन्वय कमेंटी की ओर से अर्जुन सिंह ने रखे।
आगे उन्होंने कहा कि चूंकि माओवादी शोषक और दमनकारी सत्ता व व्यवस्था के खिलाफ ‘सशस्त्र संघर्ष’ या ‘क्रान्तिकारी युद्ध’ संचालित कर रहे हैं और क्रान्ति के जरिए एक नई जनवादी सत्ता व व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं, इसलिए केन्द्र सरकार ने उन्हें सबसे बड़ा ‘आन्तरिक दुश्मन’ घोषित कर दिया है। करीब दो साल पूर्व ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐलान किया कि वामपंथी उग्रवाद व माओवादी ‘देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए ‘एकलौता सबसे बड़ा खतरा’ बन गये हैं।
इसके बाद माओवादियों और उनकी समर्थक जनता पर विशेष पुलिस व अर्द्ध सैनिक बलों के हमले शुरू हो गये। सबसे पहले छत्तीसगढ़ में ‘सलवा जुडूम’ के नाम पर क्रूर दमनकारी अभियान चलाये गये और फिर इस साल ‘ऑपरेशन लालगढ़’ और ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ शुरू हुआ। और अब तो केन्द्र सरकार ने सम्बन्धित राज्यों (छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा व झारखंड आदि) की सरकारों के साथ सीधा तालमेल कर संघर्षशील जनता पर एक किस्म का युद्ध ही थोप दिया है। खासकर उन आदिवासी बहुल इलाकों को प्रहार का निशाना बनाया गया है, जहां माओवादी आन्दोलन अपेक्षाकृत ज्यादा सघन है। वहां सघन सैन्य अभियान चलाने के लिए अब तक विभिन्न अर्द्ध सैनिक व विशेष सुरक्षा बलों के करीब एक लाख जवानों को लगा दिया गया है। इनके अलावा केन्द्र सरकार माओवादी आन्दोलन को चकनाचूर करने के लिए थल सेना व वायु सेना के भी इस्तेमाल का मन बना रही है। वैसे तो सेना के विभिन्न विभाग इस विशेष दमन अभियान की योजना बनाने व संचालित करने और इसके लिए सुरक्षा बलों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करने में पहले से ही लगे हुए हैं। वायु सेना के हेलीकाप्टर भी लगातार ‘लाजिस्टिक्स सपोर्ट’ (सुरक्षा बलों को लाने-ले जाने का काम आदि) दे रहे हैं। अब तो सरकार ने इन हेलीकॉप्टरों पर तैनात सैनिकों को ‘आत्मसुरक्षा’ में फायरिंग करने की इजाजत भी दे दी है। ऊपर से अमेरिकी सैटेलाइट एवं सैन्य व खुफिया विभाग की मदद तो इन्हें मिल ही रही है। कुल मिलाकर केन्द्र सरकार द्वारा भारतीय जनता के लड़ाकू हिस्से पर छेड़ा गया युद्ध ‘आतंकवाद’ के खिलाफ अमेरिकी युद्ध’ का एक हिस्सा बनने जा रहा है। जिस तरह अमेरिका ने इराक व अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना और अपनी पराराष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा जमाने के लिए हमला किया, उसी प्रकार भारत सरकार ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थित बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए इस युद्ध को छेड़ा है। अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संसद में दिये गये बयान कि, ‘यदि खनिज के प्राकृतिक सम्पदा वाले हिस्से में वामपंथी अतिवाद फूलता-फलता रहा तो निवेश का वातावरण प्रभावित होगा’, पर चर्चा करते हुए कहा कि इस बयान से आदिवासी क्षेत्रों में चलाये जा रहे सैनिक अभियान का असली मकसद स्पष्ट हो जाता है।
उनका मानना है कि इस युद्ध के पीछे केन्द्र सरकार का वास्तविक लक्ष्य उन इलाकों में स्थित जल, जंगल व जमीन के अन्दर छुपे बेशकीमती खनिजों पर कब्जा करना है और उन्हें देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सुपूर्द करना है। साथ ही साथ, उसे अमेरिकी साम्राज्यवादियों के वैश्विक हितों को फायदा भी पहुंचाना है। अमेरिकी नौसेना एकेडमी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने साफ शब्दों में कहा है कि ‘नक्सलवाद दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों के लिए एक चुनौती है।’ और भारत सरकार ने इसी चुनौती को खत्म करने के लिए जनता पर खुले युद्ध का ऐलान कर दिया है। आज कश्मीर और मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ एवं हत्या का दौर जारी है, दिल्ली व गुड़गांव के मजदूरों पर हमले हो रहे है, पंजाब व उत्तर प्रदेश के किसानों पर गोलियां व लाठियां बरसाई जा रही हैं; ‘वनवासी चेतना आश्रम’ जैसे गांधीवादी कुटीर को तोड़ा जा रहा है और ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ के कार्यालय में ताले जड़े जा रहे हैं व उनके नेताओं को गिरतार किया जा रहा है। अर्जुन सिंह ने कहा कि इस स्थिति में शासक वर्ग की भूमिका के संदर्भ में लिखी गोरख पाण्डेय की कविता की ये पंक्तियां काफी प्रासंगिक हैं - ‘कानून अपना रास्ता पकड़ेगा; देश के नाम पर जनता को गिरतार करेगा, जनता के नाम पर बेच देगा देश और सुरक्षा के नाम पर असुरक्षित करेगा।’ और पाश के शब्दों में ‘यदि देश की सुरक्षा ऐसी होती है.... तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है।’
उन्होंने कहा कि अगर देश के जल-जंगल-जमीन और खनिज पदार्थों व अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर जनता के स्वामित्व को स्थापित करना है और सचमुच देश को असली दुश्मनों से सुरक्षित रखना है तो तमाम प्रगतिशील, देशभक्त, जनतांत्रिक व क्रान्तिकारी ताकतों का दायित्व बनता है कि वे सर्वप्रथम मोर्चाबद्ध हों और शोषण व दमन पर टिकी इस सत्ता व व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव लाने और इसकी जगह सही मायने में एक लोक जनवादी सत्ता व व्यवस्था बनाने की लड़ाई को तेज करें। इसी लड़ाई की एक कड़ी के रूप में प्रगतिशील, देशभक्त, जनतांत्रिक व क्रान्तिकारी ताकतों का साझा मंच ‘भारत का लोक जनवादी मोर्चा’ की ओर से निम्नांकित मांगो का ज्ञापन सरकार को सौंपा गया -
- सभी प्रकार के क्रान्तिकारी-जनवादी व राष्ट्रीयता आन्दोलनों पर राजकीय दमन बन्द किया जाये;
- जनता के किसी हिस्से के आन्दोलन के खिलाफ सेना के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जाये;
- ‘देश की सुरक्षा’ या ‘माओवादियों से ‘इलाके को मुक्त कराने’ के नाम पर आदिवासी इलाकों में चलाये जा रहे तमाम सैन्य अभियानों को तत्काल बन्द किया जाये और उन इलाकों से तमाम सुरक्षा बलों को वापस किया जाये;
- गैर कानूनी गतिविधियां निवारक कानून रद्द किया जाये और इस कानून व अन्य कानूनों के तहत गिरतार सभी राजनीतिक बन्दियों को रिहा किया जाये;
- माओवादियों या अन्य आन्दोलनकारियों द्वारा उठाये गये मुद्दों को बातचीत के जरिये हल किया जाये।
उनका कहना है कि पी.डी.एफ.आई. अपनी मांगो को लेकर दृढ़ रहेगा। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आन्दोलन करने की बात भी कही गयी।


--Chandan Jha




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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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