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दुनिया बीमार हो गयी है. धीरे-धीरे यह एक अस्पताल में तब्दील हो रही है. हर कोई बीमार और लाचार नज़र आ रहा है.
'रोपे पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय....!!'

मौजूदा संसार हमारे ही अतीत के चिंतन का परिणाम मात्र है.
सृष्टि की इस अनमोल दुनिया को हमने अपनी असीम भोग की कामना के चलते बर्बाद एवं बदरंग कर दिया है.
पश्चिम के विचारकों ने कहा कि मनुष्य 'वासनाओं का एक पुंज है'. वासना की पूर्ति ही जीवन का लक्ष्य है. इस अवधारणा ने बेलगाम भोग को जन्म दिया. जंगल उजड़ गए,पहाड़ टूट गए. नदियाँ विषैली ही नहीं, सूख भी गयी. धरती बंजर हो गयी. दर्द एक हो, तब तो कहें, यहाँ तो चारों ओर विनाशलीला..........

जीवन की तमाम जरूरी चीजें अर्थहीन हो गयी हैं. आज हम जहरीली दुनिया में जीने को अभिशप्त हैं.
आज 'स्वाइन-फ्लू' से हड़कंप मचा है. कल 'बर्ड-फ्लू' का हौव्वा था. क्या मुर्गी और निरीह सूअर ही जिम्मेदार हैं इसके लिए?

दरअसल यह 'मानव-फ्लू' है. मनुष्य ही जिम्मेदार है इसके फैलाव के लिए.
१९१८ में फ्लू ने एक लाख लोगों की जान ली. १९५७ में चार लाख मौतें हुई. १९६८ में हांगकांग फ्लू ने सात लाख लोगों की जान ले ली. मौसमी बुखार से प्रतिवर्ष ३६००० की मौत केवल भारत में होती है.

अमेरिका में 'स्पिथफिल्ड फ़ूड कारपोरेशन' एक साल में १० लाख सूअर को काटता है. आज दुनिया की सबसे बड़ी मांस विक्रेता कम्पनी यही है. १० लाख सूअरों को जिस तरह रखा जाता है, वह भयानक बीमारी का कारण है. 'बर्ड-फ्लू' का भी यही कारण था, कि छोटी सी खोली में मुर्गियों को ठूंसकर रखा जाता है. स्वाभाविक जीवन नहीं जीने के कारण इससे वायरस का जन्म होता है, जो मनुष्य तक पहुँच जाता है.

मामला केवल सूअर और मुर्गी का ही नहीं है. सवाल है मनुष्य की लगातार कम होती जा रही प्रतिरोधी शक्तियों का.
मनुष्य जिस भयानक माहौल में जी रहा है, वह जानलेवा है. जहरीली हवा और पानी के साथ-साथ जहरीला भोजन भी अब प्रभाव दिखाने लग गया है.

भारत के खेतों में बोए जाने वाले बीज के बारे में आप जान लें. आज भारत के बीज बाज़ार पर 'मोनसेंटो' कम्पनी का एकाधिकार हो चुका है. यह वही 'मोनसेंटो' कम्पनी है, जो जहर बनाती है. पोटाशियम सायनाइड भी यहीं बनता है. इस कम्पनी ने जो बीज, बाज़ार में उतारा है, वह है 'जेनेटिक मोडिफाइड (जी.एम्.) सीड'. इस बीज में भी सूअर का जीन मिला है. इस बीज से उगी फसल जानलेवा है. कैंसर जैसी घातक बिमारियों का होना निश्चित है. शरीर की प्रतिरोधी शक्तियां भी क्षीण हो जाती हैं. इस बीज के पौधे का पराग, झड़कर जमीन को भी बंजर बनाता है. लगभग खाद्य सामग्री पर इसका प्रभाव है.

भारतीय समाज लाखों वर्षों से खेती से जुड़ा हुआ है. आज तक इन्होने जल, जमीन और वायु को प्रदूषण से बचाए रखा. हम जब पीपल की पूजा करते थे, गंगा और गाय को माँ कहकर पूजते थे, तो दुनिया हमारा मजाक उड़ाती थी, 'बैकवर्ड कंट्री' कहकर.

आज दुनिया उजाड़ की ओर बढ़ रही है, तो भारत की याद आ रही है. जैविक खेती, जैविक खाद, जैव उत्पाद, भू-संरक्षण, गोधन की रक्षा, वन और जल संरक्षण के लिए दुनिया भारत की ओर लौट रही है. विश्व के चिन्तक मानने लगे हैं, कि यह कथित विकास प्रकृति विरोधी है.

मानवी सभ्यता को अगर बचना है, तो भारतीय जीवन पद्धति और भारतीय मूल्यों की ओर लौटना ही होगा.
दुनिया आज मजबूर हो रही है, ' त्येन त्यक्तेन भुंजीथा:' का मन्त्र-जाप करने के लिए....

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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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3 Response to "मौत का तांडव: आओ लौट चलें भारत की ओर..."

  1. "जी एम कॉटन में सुअर का जीन मिला है और यह धरती को बंजर बना रहा है" क्या यह सच्चे तथ्यों पर आधारित है> क्यों कि मैने तो पढा है कि भारत में इसकी पूरी जाँच करने के बाद ही इसे उगाने की अनुमति दी गई है.

     

  2. यहाँ जो चित्र आपने लगाया है वो ही काफी है दिल हिलाने के लिए , क्या ऐसा मुमकिन है , पढ़ा था कहीं कि मुर्गियों को किसी ऐसी गैस वाली जगह रखा जाता है जहां उनकी फेसेस से रीएक्ट करते हुए उनके पंख खुद ही गल कर उतर जाते हैं , यहाँ भी कुछ ऐसा ही दृश्य लगता है | इंसान इस हद तक बेरहम भी हो सकता है ?

     

  3. aksar maine americi videshi filmo me dekha hai, waha ki badi badi companiya pehle virus banakar logo ko bimar karti hai fir uska antivirus taiyar kar dawai ke roop me wypar karte hai, aur koi bhi film yu hi kalpnik nahi banai jati, uske pichhe kisi na kisi prakar se satyata awasya jhalkti hai, isliye swine flu filane me bhi jarur kisi badi americi company ka hath hoga aur wah iski davai banakar cash karne ki jugat me jarur laga hoga.

     

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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