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सम्पूर्ण सृष्टि एक गहरे संकट मे फंस गई है। मानवी सभ्यता ही नहीं सम्पूर्ण चराचर जगत का अस्तित्व खतरे में है। समाधान स्वयं में संकट बन गया है। कोई भी रास्ता दूर तक नहीं जाता। मनुष्य-केन्द्रीत विचार से भला नहीं होने वाला है। इस विचार से दुनिया कीचेन और कमोडिटीज में तब्दील हो जायेगी। प्रकृति की विनाशलीला तो मनुष्य-केन्द्रित विचार का ही परिणाम है। जनशक्ति का नायक हो या गणशक्ति का नायक, किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। अब मनशक्ति का नायक ही तमाम समस्याओं का समाधान बनेगा।
तमाम वाद और प्रतिवाद पिट चुके हैं। मार्क्सवाद या पूँजीवाद, किसी में जनाकर्षण नहीं हैं। सभी ‘वाद’ ने समाज में निराशा को ही परोसा है। सभी वाद नकारा और अनुत्पादक हो गये हैं। अब एक ही वाद चलेगा, वह है ‘सम्बन्धवाद’। सम्बन्ध धर्म ही तमाम प्रश्नों का उत्तर बनेगा। मित्र-नायक ही युग का नायक बनेगा। विश्व से मैत्री और विश्वनाथ से प्रीति ही उसका प्रस्थान-बिन्दु होगा। हिंसा का द्वार मैत्री और करूणा के भाव से ही बंद होगा। आज का युग ‘सुपर पावर’ नहीं ‘सुपर पर्सन’ की मांग करता है। विश्वामित्र की अवधारणा भारत के कण-कण में व्याप्त है। ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ का भाव हमें दुनिया को बाजार नहीं, परिवार मानना सिखाता है। ‘जीयो और जीने दो’, ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथाः’ का दर्शन जीव, जगत और जगदीश से अन्तर्सम्बन्ध स्थापित करता है। हम बाजार नहीं, बाजारवाद के खिलाफ हैं। ‘शुभ और लाभ’ चाहिये, ‘लाभालाभ’ नहीं। हमारा लाभ, शुभ से नियंत्रित था।
उपभोक्तावाद के इस चरम ने नई अराजकता को जन्म दिया है, जो हिंसा का द्वार खोलता है। आतंकवादी को खत्म कर आतंकवाद नहीं मिटाया जा सकता। आतंकवाद के कारणों की पड़ताल जरूरी है। आतंकवादी को मिटाने से अमेरिका सुरक्षित होगा, पर आतंकवाद खत्म होने से विश्व-सुरक्षित होगा। ‘सीआईए’ हो या ‘आईएसआई’ दोनों के लिए आतंकवाद जरूरी है।
विषमता, गैरबराबरी को मिटाये बिना देश और दुनिया से अराजकता नहीं मिटेगी। ‘‘जब तक धरती पर शैतान रहेगा, भूखा नंगा इंसान रहेगा’’, शैतान और इस शैतानी-सभ्यता को खत्म करना जरूरी है। यह शैतान न केवल इंसानी सभ्यता के लिए खतरनाक है, बल्कि पूरी सृष्टि के लिए संकट बन गया है। कोपेनहेगेन की नौटंकी हम देख रहे हैं। ‘क्योटो संधि’ का क्या हुआ। कोपेनहेगेन हो या क्योटो, कहीं भी जीवन-मूल्य और जीने के तरीके पर विमर्श नहीं है। कोई भी देश अपनी जीवन पद्धति को छोड़ना नहीं चाहता; और यह जीवन पद्धति विनाशक है। बिना भागवत व्यक्तित्व के, विश्व में कोई सही नेतृत्व नहीं घटित हो सकता। चाहे गाँधी भारत का हो या अमेरिका का, बड़े फलक वाला नेतृत्व चाहिये। जिसके भीतर मैत्री हो, करूणा हो, प्रीति हो तथा जो सम्पूर्ण चर-अचर से एकात्म स्थापित करने वाला हो, वही इस धरा को बचायेगा। तभी कुदरत की यह बेहतरीन दुनिया जीने लायक बनी रह पाएगी।




अकारण ही... आज अकारण ही मन अपने अन्‍दर के खालीपन को स्‍वीकारना चाह रहा है। शब्‍द - अर्थ और फिर अर्थ्‍ा के भीतर के अर्थ। कितना ही छल भरा है मन में।
सच को स्‍वीकारने का साहस होता ही कब है। कब स्‍वीकार पाया हूँ अपने अर्थों के भीतर के अर्थ को। कई मर्तबा स्‍वीकार भी किया, तो ऐसी व्‍यंजना के साथ, कि सुनने वालों ने उस स्‍वीकारोक्ति को भी मेरी महानता मानकर मेरे भीतर के उस सत्‍य को धूल की तरह झाड़ दिया।

ऐसा ही एक सत्‍य है, 'स्‍त्री-सम्‍मान और मैं'। स्‍त्री होना ही पूर्णता है। स्‍त्री स्‍वयं में शक्ति का रूप है। स्‍त्री - शक्ति का सम्‍मान करना ही नैतिकता है। स्‍त्री का अपमान करना, निष्‍कृष्‍टतम् पाप है।

इन बातों का ऐसा प्रभाव हुआ, कि मैं भी स्‍त्री-शक्ति को विशेष रूप से खोजकर, उनका सम्‍मान करने लगा। अक्‍सर सड़क किनारे से गुजरते हुये ये ख्‍याल आ जाता था कि काश कोई सुन्‍दर स्‍त्री-शक्ति लड़खड़ाये, और मैं दौड़कर उसकी सहायता और सम्‍मान कर सकूं।

सोच रहा हूँ कि आखिर स्‍त्री-सम्‍मान के लिये इतनी बातों और इतने प्रयासों की आवश्‍यकता ही क्‍यूँ आन पड़ी ?और फिर इनका अपेक्षित परिणाम क्‍यूँ नहीं मिला ? क्‍यूँ स्‍त्री - सम्‍मान की सहज भावना नहीं पैदा हो पाई इस मन में ? क्‍यूँ मुझ जैसे अधिकतर युवाओं में 'सुन्‍दरतम् स्‍त्री-शक्ति का अधिकतम् सम्‍मान' की भावना बनी रही ?
क्‍यूँ शक्तिहीन और सौन्‍दर्यविहिन के प्रति सहज सम्‍मान-भाव नहीं जागृत हो सका मन में ?

इन प्रश्‍नों का उत्‍तर अभी भी अज्ञेय ही है।
भीतर के इस सत्‍य का कारण, समाज से चाहता हूँ।
उत्‍तर अभी प्रतिक्षित है।

- अमित तिवारी 'संघर्ष', स्‍वराज टी. वी.
(चित्र गूगल सर्च से साभार)
लेख से सहमति है, तो कृपया यहॉं चटका लगायें
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सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ज्ञाता, अध्येता, चिन्तक, दार्शनिक........ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति......

५ सितम्बर को शिक्षक दिवस है. राधाकृष्णन के जन्म-दिन को शिक्षक दिवस के रूप में देश मनाता आ रहा है.
हम आखिर क्यों राधाकृष्णन के जन्म-दिवस को शिक्षक-दिवस के रूप में मनाएं? राधाकृष्णन एक शिक्षक थे.. शिक्षक से राष्ट्रपति बन गए. यह राष्ट्रपति-दिवस हो सकता है, शिक्षक-दिवस कैसे हो सकता है? अगर कोई राष्ट्रपति, राष्ट्रपति का पद त्याग कर शिक्षक बनने आ जाये, तो शिक्षक का सम्मान बढेगा, शिक्षण कार्य सम्मानित होगा. राधाकृष्णन राष्ट्रपति का पद ठुकराकर शिक्षक ही बने रहने की बात करते तो, शिक्षकों के लिए गौरव की बात थी, परन्तु राधाकृष्णन ने ऐसा नहीं किया. उनके लिए 'राष्ट्रपति' शब्द, 'शिक्षक' शब्द से ज्यादा मूल्यवान था. राधाकृष्णन का शिक्षण कार्य से पलायन, शिक्षक-जगत के लिए अपमान जैसा ही है.

गाँधी, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर जिन कार्यों के लिय वे प्रतिबद्ध थे, वही कार्य उन्होनें किया. गाँधी मानवता की सेवा के लिए थे, और वे उसी के लिए समर्पित रहे. पता है न! नेहरु जब १५ अगस्त १९४७ को लाल किला से स्वतंत्रता का सन्देश दे रहे थे, तो गांधी नोआखली में बिलखती मानवता के आंसू पोंछ रहे थे. ऐसी प्रतिबद्धता!!!!

गेरीवाल्डी भी कम बड़े मसीहा नहीं थे. राष्ट्रपति बनने का जब मौका आया, तो वे राष्ट्रपति पद को ठुकराकर अपने किसान जीवन और अपने खेत की ओर लौट गए. उस देश के किसानों के लिए कितने गौरव की बात रही होगी... कृषि-कर्म को कितना सम्मान मिला होगा, हम भी गर्व करते हैं..

जे. पी. भी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे. कहाँ विरोध था उनका? प्रधानमंत्री बनना उनकी प्राथमिकता में नहीं था, तो नहीं बने. .

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपना पुश्तैनी काम, बाल-दाढ़ी बनाने का, करते रहे.

राधाकृष्णन की असीम विद्वता पर कोई सवाल नहीं है. सवाल है शिक्षक-दिवस का...
हम उलटी दिशा में चल रहे हैं. हमारी खोपडी ही उलटी दिशा में घूमी हुई है. लगातार हम शिक्षक-दिवस मनाते आ रहे हैं, पर शिक्षक के सम्मान और मर्यादा में एक प्रतिशत भी बढोत्तरी नहीं हुई है.

इस शिक्षक दिवस को मनाने वाले शिक्षक ही आज नेता, सांसद, विधायक बनने के लिए बेचैन हैं. अच्छा ऑफर मिल गया तो वे बैंक कर्मचारी, अधिकारी और कंपनियों की ओर भी चले जाते हैं.

जब राधाकृष्णन शिक्षण कार्य से पलायन कर सकते हैं, तो फिर इनके अनुयायी क्यों न भागें?

यह गुरुओं का देश रहा है. स्वयं यह देश भी 'विश्वगुरु' कहलाया. अमेरिका की तरह 'विश्व-सेठ' कहलाने की चाहत नहीं थी देश को.

भारतीय परंपरा में पूरी राजसत्ता गुरु के चरणों में थी. गुरुओं की अवहेलना करना अनर्थ था. समर्थ गुरु रामदास के चरणों में शिवाजी ने अपनी सल्तनत रख दी थी. कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, गुरु वशिष्ठ के गुरु-शिष्य परंपरा को हमने आगे बढाया. चन्द्रगुप्त-चाणक्य, रामकृष्ण-नरेन्द्र........आदि कहानियां भरी पड़ी हैं.......

जिस गुरु के चरणों में राजा झुकते थे, उस गुरूजी के लिए ऑफिस का किरानी भी नहीं झुकता. आचार्य, उपाचार्य, उपाध्याय, प्राचार्य आदि शब्द अब अर्थहीन हो गए हैं. वेतनभोगी, भत्ताभोगी, पैरवीबाज गुरु, अब गुरु नहीं रहे, गुरुघंटाल हो गए हैं. अब तो गुरु, 'शिष्याबाज' भी हो गए हैं. मटुकनाथ ने जूली को शिष्या से संगिनी बना डाला. रोज कोई न कोई गुरु जी शिष्या को लेकर फरार हो रहे हैं.

इन शब्दों को पढिये- लव-गुरु, शेयर-गुरु, मैनेजमेंट-गुरु...... अब तो मुंबई के भाई-लोग भी गुरु 'शब्द' को कब्जाने में लगे हैं.

आज गुरु को प्रणाम भी कौन करता है? बचपन के गुरुओं को पैर छूकर आज भी प्रणाम करते हैं. पर कॉलेज में आज शिक्षकों को हाय मेम, हाय सर ... से ज्यादा कुछ नहीं मिलता. आज के लड़के-लड़कियां गुरुओं के सामने झुकें भी तो कैसे? उनके टाइट कपडे दिक्कत करते हैं.....!!!

खैर, शिक्षक दिवस पर हम विचार करें. वक़्त का पहिया तो हम घुमा नहीं सकते. गुरुकुल परम्परा में लौट नहीं सकते. लेकिन अगर न्यूनतम मर्यादा की बहाली भी हो जाए, तो शिक्षण कार्य सम्मानित होने लग जायेगा. बच्चे पढाई से ज्यादा शिक्षकों के निजी जीवन, व्यवहार और चरित्र से सीखते हैं. `

आज भी आदर्श शिक्षक बचे हैं, जो हमारा रोल-मोडल बन सकते हैं. बची-खुची प्रतिष्ठा भी इन शिक्षकों पर ही है. शिक्षण-कार्य श्रेष्ठ है. इसके सामने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद भी छोटा है- विचार कीजिये...

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.


जबसे होश संभाला, गानों को समझना शुरू किया, तभी से ये गाना भी सुनता आ रहा हूँ, 'चाँद सा रोशन चेहरा, जुल्फों........'. कभी-कभी ये भी सुनाई दे जाता,'चाँद सी हो महबूबा मेरी..'.

तब कुछ ख़ास समझ नहीं थी, 'महबूब और चाँद' के संबंधों के बारे में. हाँ कभी-कभी सोचता जरूर था, कि ये 'चंदा मामा' महबूब कैसे हो जाते हैं. उस वक़्त कन्हैया की ये हठ भी पढता था,'मैया मोहे चन्द्र खिलौना लैहो..'.
ये दोनों विरोधाभाषी बातें मन में कभी-कभी ही उठा करती थीं. जब तक छोटे थे 'चन्द्र-खिलौना' चला, फिर धीरे धीरे 'चाँद सी महबूबा' हो गयी....

समय के साथ-साथ ये प्रश्न मन में आने लगा, कि आखिर ये महबूबा चाँद जैसी ही क्यों है?
चाँद में वो कौन सी खासियत है, जिसकी वजह से उसे सुन्दरता के साथ जोड़ा जाने लगा..

चाँद गोल है, लेकिन गोल तो चपाती भी है. फिर चपाती जैसा चेहरा क्यों नहीं है??

फिर सोचा कि शायद चाँद रौशनी करता है, इसलिए ऐसा कहते होंगे, शायद इसीलिए उसे सुन्दरता का प्रतीक बना दिया गया. लेकिन रौशनी तो सूरज उससे बहुत ज्यादा करता है, तब फिर उसे क्यों नहीं माना गया?
और मान लो सूरज जलता है, लेकिन घर में जो CFL ट्यूब लाईट है, वो तो एकदम चाँद के जैसी रौशनी देता है, तब फिर लेटेस्ट वर्जन में सुन्दरता को CFL क्यों ना कहा जाए.??

फिर सोचा कि चाँद की शीतलता की बहुत चर्चा रहती है, क्या पता इसीलिए उसे सुन्दरता से तुलना करते हों! वैसे भी आजकल सुन्दरता भी आँखों को शीतल करने के काम आने लगी है...!! लेकिन 'बर्फ' तो उससे भी कहीं ज्यादा शीतल है, तब फिर बर्फ की तुलना क्यों ना की जाए सुन्दरता से??? फिर बर्फ तो सफ़ेद भी होता है, एकदम उजला-धप्प..

कोई भी तर्क संतुष्टि नहीं दे पाया. सब के सब यही साबित करते रहे, कि चाँद में ऐसा कुछ खास नहीं है. वो तो बस पुराने कवियों ने कहा, तब से सब लकीर के फ़कीर बने उसी लीक पर चलते जा रहे हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है. चाँद में ऐसी ही एक बात है, जो उसके चरित्र को सुन्दरता के चरित्र के पास ले आती है.
चाँद जब पूर्ण हो जाता है, तब उसमे ह्रास होने लगता है. चाँद की सम्पूर्णता ही उसके क्षरण का प्रारंभ बिंदु है. जिस दिन चाँद पूरा हो जाता है, बस अगले ही दिन से वह घटने लगता है.

यही चरित्र सुन्दरता का भी है. जब सुन्दरता पूर्ण हो जाती है, तभी उसमे ह्रास शुरू हो जाता है. सुन्दरता भी चाँद की कलाओं की तरह बढती है, और फिर पूर्ण होते ही उसका भी क्षरण शुरू हो जाता है. पूर्ण सौंदर्य स्थिर नहीं होता...और पूर्ण चन्द्र भी स्थिर नहीं रहता.. जैसे चाँद का आकर्षण उसकी अपूर्णता में है, क्योंकि तारीफ भी 'चौदहवी के चाँद' की या फिर 'चौथ के चंदा' की होती है, कोई पूर्णिमा के चाँद सी महबूबा नहीं खोजता... उसी तरह सौंदर्य का आकर्षण भी उसकी अपूर्णता में ही है.

यही चरित्र फूल का भी है, उसका सारा आकर्षण उसके खिलने की प्रक्रिया में है. जिस दिन वह पूरा खिल जाता है, मुरझाना शुरू हो जाता है. इसीलिए 'फूलों सा चेहरा तेरा..' है. वरना खुशबू तो 'ब्रीज' साबुन में 17 सेंटों की है.

-Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

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संघ का राजनीतिक ब्रह्मचर्य...??

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/29/2009 04:36:00 pm 4 comments


भारत ब्रह्मचारियों का देश रहा है. ब्रह्मचर्य की एक से एक कथा यहाँ प्रचलित है. स्त्री-सम्बन्ध, भारतीय ब्रह्मचर्य के समक्ष बड़ी चुनौती के रूप में आती रही है.

ब्रह्मचर्य की आड़ में स्त्री-समागम और संततियों की अनेकों कथाएँ भी मौजूद हैं. अकेले मेनका, विश्वामित्र की वर्षों की साधना को ध्वस्त करने में सक्षम थी. कामिनी से हम लगातार भयभीत होते रहे हैं. कामिनी से बचने और अपने ब्रह्मचर्य को बचाने का उपाय खोजना जरूरी था. हनुमान सबसे बेहतर उदहारण थे. हनुमान हमारे सुरक्षा-कवच बने. अपने-अपने मकसद के अनुसार हमने भगवानों का लिस्ट छांटा. पर, ब्रह्मचारियों के रोल-मॉडल तो हनुमान ही बने.

आप जानते होंगे कि इस ब्रह्मचारी हनुमान को एक बेटा भी था, जिसको बहुत कम भक्त जानते हैं, वह है मकरध्वज....
मकरध्वज को हनुमान जैसा ब्रह्मचारी बाप मिला. हनुमान ने भी कभी इसे छिपाने का प्रयास नहीं किया. ना ही कभी संबंधों को लेकर कबड्डी खेली. मकरध्वज जायज औलाद है कि नाजायज, कभी भी इसके लिए हनुमान को स्पष्टीकरण नहीं देना पड़ा. लोगों ने कभी इसे डिबेट नहीं बनाया.

आज बजरंगबली तो चर्चा में नहीं हैं, पर, हमारे बजरंगी भाई चर्चा में अवश्य हैं.
संघ प्रमुख मोहन जी भगवत, भाजपा से रिश्ते को लेकर परेशान हैं. परेशानी समझ में नहीं आती, कि भाजपा इतनी भी बदसूरत पार्टी नहीं है, जिसे रिश्तेदार कहने में शर्म आवे. हाँ, झारखंडी पार्टी होती तो भागवत भाइयों को बैठने में ख़राब भी लगता, पर यहाँ तो सभी खाए-पिए-अघाए लोग हैं. लाल टुह-टुह गाल और धवल वस्त्र, फिर भी...
...देशभक्त भाजपा बोलती भी है जबरदस्त...?

स्थापना से लेकर आज तक सभी संगठन मंत्री तो संघ से भेजे गए. तपोनिष्ठ दीनदयाल उपाध्याय, वाजपेयी, मोदी, आडवाणी सभी के सभी तो संघ के प्रचारक ही रहे हैं. भाजपा आज वह अंगुलिमाल डाकू बन गयी है, जिसके पाप का भागी बनने के लिए कोई तैयार नहीं है. सत्ता और संसाधन-सुख जुटाए भाजपा और भोगे संघी और वक़्त आये तो इज्जत ख़राब कर दो.......ई भाई कहाँ का इंसाफ है?

पार्टी जिस घोडे पर सवार है, उसका लगाम उसके हाथ में कभी होता ही नहीं. आज जो नेता भाजपा विरोध में हैं, उन्हें पहले ही पता था, कि लगाम उनके हाथ में नहीं होगा, फिर लगाम लपकने की हसरत क्यों? हसरत दिखाओगे तो भोगोगे..

देश बेवकूफ नहीं रह गया है. देश अब राजनीति की परिभाषा जानता है. संघ संपूर्णतः एक राजनीतिक संगठन है. सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री नहीं हैं, तो क्या प्रधानमंत्री से कम रसूख है उनका?

घी दाल में कहीं भी गिरे, परिणाम में क्या अंतर आएगा? संघ की बहिन जी हैं, राष्ट्र सेविका समिति, भांजी हैं दुर्गावाहिनी, लाडला है विद्यार्थी परिषद्, कुल-पुरोहित है विहिप. कोई सदस्य किसानी में है, तो कोई मजदूरी में. जरूरत के हिसाब से एक परिवार को जितनी सुविधा चाहिए, उतनी सुविधा के लिए अलग-अलग प्रकल्प संघ ने खडा किया.

एक दम खांटी स्वदेशी......... बाहर से आउटसोर्सिंग की जरूरत ही नहीं. सारी वेरायटी घर में ही. यहाँ तक कि 'नकली विरोधी' भी इन्होने खडा कर लिया है. दूसरा कोई गाली-गलौज करे, परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगे, इससे बेहतर हैं कि अपने लोग ही गाली दें. गोविन्दाचार्य जैसा छुट्टा सांड, संघ का ही छोडा हुआ है. खूब गालियाँ रटवाई गयी इन्हें.......

हाँ, गाँव में एक नया शब्द विकसित हुआ है, वह है 'बुलौकिया'. गिरमिटिया नहीं बुलौकिया..... यह बुलौकिया 'Block' यानि प्रखंड से बना है. बड़े परिवार में एक सदस्य नेतागिरी में अवश्य ही रहता है. परिवार का यह सदस्य राजनीतिक सुविधा से फंड, राशन, खाद-बीज, सब्सिडी आदि जमा करता है. इसकी दलाली से परिवार को बहुत फायदा होता है. राजनीतिक सम्बन्ध के बिना आज परिवार जिन्दा ही नहीं रह सकता. हर कोई दबोचने का प्रयास करता है.

खैर, मैं संघ परिवार की बात कर रहा था. इस परिवार ने भी भाजपा के रूप में अपना बुलौकिया बनाया.
भाई ई त अच्छी बात बा.... इनमे कौन बुराई बा..? भाजपा तोहार औलाद बा.... काहे गरियावत बानी भागवत जी ? रउरा गुड खाई तो गुलगुला से परहेज काहे...............

संघ की स्वदेशी पढ़ते-पढ़ते मैं भी कभी-कभी देसज हो जाता हूँ. राजनीति पवित्र है, मौलिक है. देश, समाज और जन-गण-मन इस राजनीति से प्रभावित होता है. जिस देश को भागवत जी खडा करना चाहते हैं, वह राजनीति के बिना कैसे संभव है? राजनीति तो गाँधी, पटेल, सुभाष ने भी किया था. क्या ये लोग गलत थे? चुनावी राजनीति हो या सांस्कृतिक राजनीति चरित्र सबका एक ही होता है. इस स्थिति में राजनीतिक ब्रह्मचर्य एक पाखण्ड ही होगा.

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा : एक अभियान

Posted by अमिताभ भूषण"अनहद" On 8/28/2009 07:46:00 pm 1 comments


जंगल से निकली थी सांप के भय से, गाँव-शहर में आई तो आदमी ने डंस लिया...

यह दशा है, व्यथा है, गौमाता, गौवंश की. उस वंश परंपरा की, जिसका सीधा सम्बन्ध भारत के स्वास्थ्य, समृद्धि, स्वावलंबन और जीवन से रहा है. सहस्त्राब्दियों से भारतीय समाज में पूज्य रहे, पालक-पोषक रहे गौवंश का संरक्षण व संवर्धन समय की दरकार है. तकनीक तथा मशीन के अंध प्रयोग, नक़ल की होड़ में जुटे समाज को गौवंश के निरादर का गंभीर परिणाम भुगतना होगा. गाँव, खेत, किसान की पहचान से गौवंश की दूरी भविष्य के लिए खतरनाक संकेत हैं.

अभी कुछ वर्ष पहले तक ग्राम्य जीवन में गाय, बैल संपन्नता के प्रतीक थे. घर के बाहर खूंटे से बंधी गायों, बैलों की जोड़ी गृहस्वामी के प्रतिष्ठा का आधार होती थी. गाँव का गरीब से गरीब आदमी गौसेवा, गौपालन के लिए लालायित होता था. सामर्थ्यवान व्यक्ति से गाय अथवा बछडा और बैल सशर्त लेकर गौवंश से अपने दरवाजे की शोभा बढाता था. समय के साथ बदलते समृद्धि, उन्नति के मापदंड ने दरवाजे पर गडे खूंटे और हौदी(नादी) को सूना कर दिया है. ट्रैक्टर और थ्रेशर सरीखे मशीन अब ग्राम्य जीवन की संपन्नता के नए प्रतीक हैं. सोयाबीन के दूध में प्रोटीन ढूँढने वाला समाज, निरोग काया के लिए अब भी गाय के दूध को अमृत मानता है. गोमूत्र के औषधीय उपयोग और गोबर के धार्मिक, खेतिहर प्रयोग आज भी भारत में निर्विकल्प हैं. बावजूद, देश में गौवंश के प्रति विमुखता अपने चरम पर है.

दो बैलों की कहानी तथा लाला दाउदयाल का गऊप्रेम अब इतिहास कथा होने को है. क्या हम नयी पीढी को दो बैलों की कहानी के स्थान पर 'दो ट्रैक्टर की कहानी' पढाना चाहते हैं? या लाला दाउदयाल के गऊप्रेम की जगह किसी सभ्य भारतीय का कुत्ता-बिल्ली प्रेम आदर्श के तौर पर पढाना चाहते हैं?

शायद इन तमाम प्रश्नों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गंभीरता से सोचा है. रचनात्मक कार्यों के प्रति अपनी सांगठनिक प्रतिबद्धता को, संघ अपने गो संरक्षण-संवर्द्धन अभियान के जरिये दुहराने को तैयार है. २९ जून २००९ को भोपाल के शारदा विहार परिसर में संघ ने देश भर से आये डेढ़ सौ से अधिक कार्यकर्ताओं के बीच इस अभियान को लेकर विमर्श किया. तीन दिन तक चले विमर्श से 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' के सम्पूर्ण स्वरुप का निर्धारण हुआ. अपने स्थापना दिवस अर्थात विजयादशमी के दिन 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' का शंखनाद कुरुक्षेत्र की भूमि से करने का संघ ने निश्चय किया है. एक सौ आठ दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में २०००० किलोमीटर की दूरी तय की जायेगी.

माना जाता है, कि अयोध्या आन्दोलन के बाद एक बार फिर 'विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा' के जरिये संघ समाज में अपने पकड़ और प्रभाव का परिचय देगा. चार प्रमुख रथों से निकलने वाली इस यात्रा का उद्देश्य गौवंश के प्रति समाज में कर्तव्यबोध उत्पन्न करना तथा गाँव, पर्यावरण, संस्कृति के लिए चेतना जागृत करनाहै.

संघ के सारथी इस यात्रा में समाज के सभी पंथ, धर्मं, जाति को जोड़ने का प्रयास करेंगे. इस यात्रा का परिणाम क्या होगा, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. फ़िलहाल इतना तय है कि गौवंश के रक्षार्थ निकलने वाली यह यात्रा संघ की ही नहीं, अपितु समय की भी यात्रा है.

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-Amitabh Bhushan 'Anhad'

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लीजिये, जनकल्याणार्थ प्रधानमंत्री महोदय का एक और बयान आ गया है. लगता है कि देश में उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से परेशान हैं प्रधानमंत्री!

होना भी चाहिए, क्योंकि दूसरी बार सत्ता जो मिली है. जन भरोसा का सर्टिफिकेट मिला है; सो जन यानि आम जन की याद उन्हें फिर सता रही है. उन्होंने पिछले दिनों आह्वान किया था कि सीबीआई आमजनता की इस धारणा को समाप्त करे कि बड़ी मछलियाँ सजा से बच जाती हैं. इससे भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है , सुरसा के मुख की तरह. लिहाजा न केवल दुनिया में भारतीयों की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि इसके कारण गरीबों को सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. मनमोहन सिंह ने साफतौर पर यह कहा है, कि लोग यह मानते हैं कि हमारे देश में सिर्फ कमजोर लोगों के खिलाफ ही तुंरत कार्रवाई होती है, उच्च पदों पर बैठे और सबल लोग बच जाते हैं. उन्होंने उम्मीद जतायी कि इस धारणा और हालात को बदलने के लिए सम्बंधित एजेसियों को उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से आक्रामकता के साथ निपटना चाहिए. प्रधानमंत्री के मुताबिक, दुनिया हमारे लोकतंत्र का सम्मान करती है, पर यहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार हमारी छवि को धूमिल करता है. इससे निवेशक हतोत्साहित होते हैं, क्योंकि वे सौदों में पारदर्शिता चाहते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि देश का विकास हो रहा है और हम वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल हो रहे हैं, पर भ्रष्टाचार के कारण सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकी संसाधन हासिल नहीं हो पा रहे हैं. उन्होंने फिर दुहराया कि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा और ज्यादा खामियाजा गरीबों को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि उनके लिए शुरू की गयी योजनायें भ्रष्टाचार में ही ख़त्म हो जाती हैं, और वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं.

प्रधानमंत्री को यह याद दिलाना जरूरी है, कि दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी भी अपने समय में ऐसी चिंता व्यक्त कर चुके हैं. उन्होंने तो आंकडे भी दिए थे. वर्तमान पार्टी महासचिव राहुल गाँधी भी इस बात को कई बार कह चुके हैं.
समस्या बीस पैसा, दस पैसा पहुँचने का नहीं, बल्कि जो मातहत ठेकेदार या सरकारी, गैर सरकारी एजेंसियां क्रमबद्ध रूप से ८०-८५ पैसा खा रही हैं, उनके विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई, पीएमओ को इस पर श्वेतपत्र लाना चाहिए.

प्रधानमंत्री को याद दिलाना होगा कि देश में मौजूदा नौकरशाही और उसकी विभिन्न लाबियों, समाज में सक्रिय दबाव समूहों, अर्थजगत में छाई विभिन्न लाबियों को जनोन्मुखी बनाने, तथा इसमें बाधक व्यक्तियों को न्यायिक जांच के दायरे में लाने में, और समय रहते देश में प्रचलित ठेकेदारी की व्यवस्था की भी समीक्षा करने में, यदि वे विफल रहते हैं, तो फिर यही समझा जायेगा कि मतदाताओं ने दलित व पिछड़ी मानसिकता से बाहर निकलकर कांग्रेस को जो जनाधार दिया है, उसका मकसद अधूरा रह गया.

राजनीतिक इतिहास फिर अपने आप को दुहराए, तो देश में सबसे लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस को हतप्रभ नहीं होना चाहिए. सवाल देश की आर्थिक सेहत का तो है ही, आम जनता के आर्थिक सेहत की उपेक्षा भी घातक हो सकती है.....

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-Kamlesh pande, Spl. Correspondent, Swaraj T.V.

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दुनिया बीमार हो गयी है. धीरे-धीरे यह एक अस्पताल में तब्दील हो रही है. हर कोई बीमार और लाचार नज़र आ रहा है.
'रोपे पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय....!!'

मौजूदा संसार हमारे ही अतीत के चिंतन का परिणाम मात्र है.
सृष्टि की इस अनमोल दुनिया को हमने अपनी असीम भोग की कामना के चलते बर्बाद एवं बदरंग कर दिया है.
पश्चिम के विचारकों ने कहा कि मनुष्य 'वासनाओं का एक पुंज है'. वासना की पूर्ति ही जीवन का लक्ष्य है. इस अवधारणा ने बेलगाम भोग को जन्म दिया. जंगल उजड़ गए,पहाड़ टूट गए. नदियाँ विषैली ही नहीं, सूख भी गयी. धरती बंजर हो गयी. दर्द एक हो, तब तो कहें, यहाँ तो चारों ओर विनाशलीला..........

जीवन की तमाम जरूरी चीजें अर्थहीन हो गयी हैं. आज हम जहरीली दुनिया में जीने को अभिशप्त हैं.
आज 'स्वाइन-फ्लू' से हड़कंप मचा है. कल 'बर्ड-फ्लू' का हौव्वा था. क्या मुर्गी और निरीह सूअर ही जिम्मेदार हैं इसके लिए?

दरअसल यह 'मानव-फ्लू' है. मनुष्य ही जिम्मेदार है इसके फैलाव के लिए.
१९१८ में फ्लू ने एक लाख लोगों की जान ली. १९५७ में चार लाख मौतें हुई. १९६८ में हांगकांग फ्लू ने सात लाख लोगों की जान ले ली. मौसमी बुखार से प्रतिवर्ष ३६००० की मौत केवल भारत में होती है.

अमेरिका में 'स्पिथफिल्ड फ़ूड कारपोरेशन' एक साल में १० लाख सूअर को काटता है. आज दुनिया की सबसे बड़ी मांस विक्रेता कम्पनी यही है. १० लाख सूअरों को जिस तरह रखा जाता है, वह भयानक बीमारी का कारण है. 'बर्ड-फ्लू' का भी यही कारण था, कि छोटी सी खोली में मुर्गियों को ठूंसकर रखा जाता है. स्वाभाविक जीवन नहीं जीने के कारण इससे वायरस का जन्म होता है, जो मनुष्य तक पहुँच जाता है.

मामला केवल सूअर और मुर्गी का ही नहीं है. सवाल है मनुष्य की लगातार कम होती जा रही प्रतिरोधी शक्तियों का.
मनुष्य जिस भयानक माहौल में जी रहा है, वह जानलेवा है. जहरीली हवा और पानी के साथ-साथ जहरीला भोजन भी अब प्रभाव दिखाने लग गया है.

भारत के खेतों में बोए जाने वाले बीज के बारे में आप जान लें. आज भारत के बीज बाज़ार पर 'मोनसेंटो' कम्पनी का एकाधिकार हो चुका है. यह वही 'मोनसेंटो' कम्पनी है, जो जहर बनाती है. पोटाशियम सायनाइड भी यहीं बनता है. इस कम्पनी ने जो बीज, बाज़ार में उतारा है, वह है 'जेनेटिक मोडिफाइड (जी.एम्.) सीड'. इस बीज में भी सूअर का जीन मिला है. इस बीज से उगी फसल जानलेवा है. कैंसर जैसी घातक बिमारियों का होना निश्चित है. शरीर की प्रतिरोधी शक्तियां भी क्षीण हो जाती हैं. इस बीज के पौधे का पराग, झड़कर जमीन को भी बंजर बनाता है. लगभग खाद्य सामग्री पर इसका प्रभाव है.

भारतीय समाज लाखों वर्षों से खेती से जुड़ा हुआ है. आज तक इन्होने जल, जमीन और वायु को प्रदूषण से बचाए रखा. हम जब पीपल की पूजा करते थे, गंगा और गाय को माँ कहकर पूजते थे, तो दुनिया हमारा मजाक उड़ाती थी, 'बैकवर्ड कंट्री' कहकर.

आज दुनिया उजाड़ की ओर बढ़ रही है, तो भारत की याद आ रही है. जैविक खेती, जैविक खाद, जैव उत्पाद, भू-संरक्षण, गोधन की रक्षा, वन और जल संरक्षण के लिए दुनिया भारत की ओर लौट रही है. विश्व के चिन्तक मानने लगे हैं, कि यह कथित विकास प्रकृति विरोधी है.

मानवी सभ्यता को अगर बचना है, तो भारतीय जीवन पद्धति और भारतीय मूल्यों की ओर लौटना ही होगा.
दुनिया आज मजबूर हो रही है, ' त्येन त्यक्तेन भुंजीथा:' का मन्त्र-जाप करने के लिए....

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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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प्रख्यात चिन्तक बेकन का मत है, कि 'इतिहास मनुष्य को बुद्धिमान बनाता है.'

इतिहास का छात्र होने के नाते मैं भी इससे सहमत हूँ. जिस प्रकार प्रकृति में अमृत (गाय) और विष (सांप) दोनों निहित हैं, एवं उसकी मात्रात्मक गडबडी अपने गुणों के विपरीत अवगुण में बदल जाती है. यानि कि अधिक घी का सेवन जानलेवा साबित होता है, और विष की उचित मात्रा औषधि में परिवर्तित होकर कई जीवन बचा लेती है.

कहने का तात्पर्य यही है, कि जैसे सागर-मंथन से निकले अमृत-विष की मात्रात्मक गडबडियां तुंरत विरोधाभाषी गुण में परिवर्तित हो जाती हैं; उसी प्रकार व्यक्तित्व के 'इतिहास सागर' में जब भी 'विवेक की मथानी' चलायी जाए, तो इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि जिन्हें हम महापुरुष कहते हैं और उनकी पूजा करने को आतुर रहते हैं तथा जिन्हें हम खलनायक मानकर सर्वत्र निंदा का पात्र बना देते हैं, के बारे में भारतीय/वैश्विक बुद्धिजीवियों को अतिप्रशंसा और अतिनिन्दा की प्रवृति से बचना चाहिए. क्योंकि कुछ भी पूर्ण सत्य नहीं होता.

जयचंद एक ऐतिहासिक पात्र है. तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति में उसने खलनायक की भूमिका निभाई और विदेशी आक्रान्ताओं से मिल गया, जिससे भारतीयता कमजोर हुई. हम गुलाम हुए, और वह अब तक निंदा का पात्र है.

वस्तुतः, जयचंद कोई पात्र नहीं, अपितु एक प्रवृत्ति है. यह प्रवृत्ति देश के अन्दर भी हाथ मिलाती है और देश के बाहर भी. हम सबको जयचंद के बारे में यह समझना चाहिए कि वह सत्ता प्रतिष्ठान के अधिक करीब था, इसीलिए उसने राजा के साथ विश्वासघात किया. क्या ब्रिटिश कालीन भारत में या आजादी के बाद के भारत में यह प्रवृत्ति नष्ट हो गयी?
कदापि नहीं..

केंद्रीय राजनीति हो, सूबाई राजनीति हो या त्रिस्तरीय पंचायती राज वाली राजनीति, क्रमशः प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जिला परिषद् अध्यक्ष-प्रखंड प्रमुख-मुखिया जी से पूछें कि जहाँ दलगत सत्ता है, वहां पार्टी को आधार बनाकर और जहाँ दलगत सत्ता नहीं है, वहां व्यक्ति को आधार बनाकर कितनी बार तख्ता-पलट की सफल या विफल कोशिश हुई है...

क्या हम लोग इन देशी जयचंदों को माफ़ कर पाएंगे; क्योंकि हालिया 'जिन्ना-जसवंत' प्रकरण से तो यही लगता है कि हमने इन्हें माफ़ करना भी सीख लिया है.
जयचंद की ही अगली कड़ी विभीषण है. सिर्फ अर्थ की गंभीरता दोनों को अलग करती है...

क्रमशः...
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-Kamlesh Pande, Spl. Correspondent, Swaraj T.V.

(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)

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दिग्विजय सिंह ने कभी इन नेताओं को वह सम्मान नहीं दिया, जो कि लालू को रघुवंश प्रसाद सिंह, नीतीश को राजीव रंजन-प्रभुनाथ सिंह, रामविलास को सूरज सिंह-रामा सिंह, मायावती को सतीश चन्द्र मिश्र आदि देकर सत्ता सुख भोगते रहे और तथाकथित सवर्ण हितों की उपेक्षा कर, अपनी व्यक्तिगत और दलगत राजनीति को चमकाते रहे. लिहाजा सवर्ण समाजवादी जमात अब दिग्विजय के लोकमोर्चा में अपना भविष्य देखने लगे हैं.

इतिहास साक्षी है कि १९७७ में जनता पार्टी; १९८९ में जनता दल और १९९६-१९९८-१९९९ में भाजपा को तथा २००४
और २००९ में कांग्रेस को सवर्णों ने जमकर वोट दिया, लेकिन किसी भी दल को गरीब सवर्ण के हितों का ख्याल नहीं आया. सच तो यह है कि नीतीश सरकार के द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत में आरक्षण आदि से भी सवर्ण जनमानस नाराज है. भले ही हाल के लोकसभा चुनाव में जनता ने लालू-पासवान को सत्ता में आने से रोकने के लिए, तथाकथित सुशासन यानि कि 'अफसरशाही शासन' के नाम पर राजग की झोली में काफी सीटें डाल दीं. लेकिन प्रभुनाथ की हार और दिग्विजय की जीत के गहरे निहितार्थ हैं और इसी से दिग्विजय का हौसला बुलंद है.

लोकमोर्चा के बहाने वे फिर से अपनी वही औकात पाना चाहते हैं, जो राजग सरकार में रहते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के सानिध्य में थी. यह सही है कि २००४ के बाद से दोनों बार केंद्र में कांग्रेस नित सरकार बनी, इससे दिग्विजय की राह थोडी आसन हो गयी. यदि २००९ में केंद्र में राजग सरकार बनती तो नीतीश के हाथ मजबूत हो जाते. संभवतः अपने धुर विरोधी और लोकसभा चुनाव में जदयू प्रत्याशी से पराजित 'शातिर समाजवादी नेता' जॉर्ज फर्नांडिस को बतौर जदयू प्रत्याशी राज्यसभा में भेजकर नीतीश ने दिग्विजय को ही कमजोर करने का पासा फेंका था, जिसका जवाब दिग्विजय ने लोकमोर्चा का गठन करके दिया है. यही नहीं सांसद इंदर सिंह नामधारी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी, समाजसेवी विजय प्रताप, पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी, प्रख्यात चिन्तक शिवखेडा, मशहूर गायक अनूप जलोटा आदि की उपस्थिति से जाहिर होता है कि 'बांका विजय' के गहरे निहितार्थ हैं.

इन सबों की उपस्थिति में जिस लोकतान्त्रिक समाजवाद की उन्होंने वकालत की है तथा जिस तरह से जातिवादी, धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय ताकतों से समान दूरी बनाये रखने की प्रतिबद्धता जताई है, यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है. यही नहीं मौजूदा आर्थिक नीतियों और विदेश नीति में अमेरिका के पिछलग्गू बनने के रुझान के खिलाफ जो संघर्ष करने का ऐलान किया है, उससे साफ़ जाहिर है कि उनके निशाने पर 'पटना की सल्तनत' के साथ-साथ दिल्ली की सल्तनत भी है. क्योंकि प्रख्यात समाजवादी नेता, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और मंडल मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के निधन तथा भाजपा द्वारा पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत को साइड करने एवं पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह को पार्टी से हटाने तथा कांग्रेस द्वारा पूर्व मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह को साइड करने की परिस्थितियां, उससे उन्होंने केंद्रीय राजनीति में अपने लिए एक माकूल अवसर भांप लिया है. वह यह भी समझते हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की वर्तमान चलती, हमेशा नहीं रहेगी. ऐसे में सत्ता के शागिर्दों पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले दिग्विजय सिंह, जो 'राजनीतिक जुगाड़वाद' के स्रोत भी माने जाते हैं, का लोकमोर्चा क्या गुल खिलायेगा, प्रतीक्षा करना दिलचस्प होगा..........

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-Kamlesh Pande, Spl. Correspondent, Swaraj T.V.

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रेडियो-दूरदर्शन पर 'हरियाणा नंबर वन' का धुआंधार प्रचार जारी है. देखते-सुनते आजिज हो गया हूँ. विकास की जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह बहुत ही फूहड़ और खोखली प्रतीत होती है.

भाजपा का अपना अन्तर्विरोध है, नाकारापन है, पर कांग्रेस भारत के मौजूदा चीखते सवालों से बचकर भाग नहीं सकती. अपने सौ दिनों के ही शासन काल में देश की जो दुर्गति की है, वह कहने और गिनाने की जरूरत नहीं है.

महंगाई, पार्टी पूछकर घर नहीं घुसती...चाहे कांग्रेसी हों या भाजपाई, हर का जीवन जंजाल बन गया है. महंगाई स्थायी मुसीबत के रूप में स्थापित हो चुकी है. सूखे की मार अलग है. देश महामारी को झेलने को विवश है..
झूठ को हज़ार बार दुहराओ कि वह सत्य बन जाए. क्या हरियाणा भारत राष्ट्र से अलग है? क्या हरियाणा की भूमि अचानक उर्वरा हो गयी है? क्या हरियाणा के भूजल स्तर में सुधार आ गया है? उत्पाद, बाज़ार और विपणन पर क्या हरियाणा के किसानो का अधिकार हो गया है? खेती योग्य जमीन से क्या किसानो की बेदखली रुक गयी है?

हरियाणा भ्रूण-हत्या के मामले में 'नंबर वन' रहा है. क्या यह छवि सुधर गयी है? जातीय समरसता जार-जार नहीं हुई है, क्या हरियाणा में? झज्जर की तालिबानी पंचायतो का क्या फैलाव नहीं हुआ है?

दरअसल मनमोहन सिंह के सिपाही जिस विकास की बात कर रहे हैं, उस विकास की पोल खुल चुकी है.'हरियाणा नंबर वन' जिस विकास की कसौटी पर 'नंबर वन' बना है, उसकी परिणति देश देख रहा है.
किसानों के हाथ से बीज छिन गए, बाज़ार निकल गया. खाद ख़त्म हो गए. कृषि के तमाम साधन आज बाज़ार के हवाले हो चुके हैं. खेती बाज़ार का नहीं, आजीविका का साधन है.

हरियाणा में भूमि का कम्पनीकरण किया गया. बड़े पैमाने पर किसानों की भूमि छीनी गई. उपजाऊ भूमि पर मॉल बन रहे हैं या फैक्ट्रियां खुल रही हैं. ऊंची अट्टालिका हरियाणा की बर्बादी को बयां कर रही हैं. सड़क, बिजली और पीने के पानी को पूरे सामाजिक जीवन से अलग कर विकास के लक्ष्य के रूप में विकसित किया गया.
हरियाणा का जो विज्ञापन टी.वी. और रेडियो पर चल रहा है, उसका सम्बन्ध केवल हरियाणा से नहीं है. उसे पूरा देश देख रहा है. अरबों रुपया खर्च करके कांग्रेस देश को क्या दिखाना चाहती है, कि वह तीस मारखां है...

'हरियाणा नंबर वन' बना सकते हैं, तो देश को भी नंबर वन बना सकते हैं. कांग्रेस लाज बचा रही है. महंगाई का जवाब नहीं है कांग्रेस के पास.

कांग्रेस मायावती को घेरती है कि वह मूर्ति क्यों बनावती फिर रही हैं? कांग्रेस बताये कि वह देश का पैसा क्यों पानी की तरह बहा रही है?
देश की दारुण स्थिति को देखते हुए, कांग्रेस को तुंरत इस प्रकार की फिजूलखर्ची पर रोक लगाना चाहिए. हरियाणा में विकास के नाम पर हुए विनाश की चर्चा जारी रहेगी.......

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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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ऐसा पहली बार हुआ है, नम्बर वन हरियाणा। क्या वाकई हरियाणा देश के अन्य राज्यों के मुकाबले नम्बर वन का खिताब जीत चुका है? यह खिताब किसकी तरफ से और किस तरह से दिया गया है? राष्ट्रीय स्तर की संस्था द्वारा, सरकार द्वारा, खुद कांग्रेस द्वारा या फिर इसे पैसे से खरीदा गया है। इस तरह से कई सवाल कौंध रहे है, लोगों के मन में। अब तक तो हमने सुना था कि गुजरात अन्य राज्यों के मुकाबले में ज्यादा विकसित, प्रशासनिक रूप से कुशल, आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी सराहनीय कार्य कर अपनी जगह नम्बर वन के खिताब पर पक्की किए हुए है।

लेकिन कुछ दिनों से हरियाणा सरकार, एफएम, सरकारी और गैर सरकारी चैनलों के अलावा अखबार अर्थात बाजारू हो चुकी पत्रकारिता के माध्यम द्वारा प्रसारित अपनी चंद चुनावी घोषणाओं के आधार पर नम्बर वन कहलाने की जुगत में लगी हुई है। एफएम 92.7 (बिग एफएम) ने तो अपने हर गानों के बाद ही हरियाणा के हुड्‌डा सरकार का गुणगान कर चुनावी वोट बटोरने का खासा इंतजाम कर रखा है।
ये सब तो ठीक है भैईया कीमत उसे मिली है, आखिर चंद वोटरों को भी तो वोट डालने के लिए कीमत दी जाती रही है। लेकिन तब जब पूरे साढ़े चार साल बाद चुनाव की बारी आई। इससे पहले तक शायद हरियाणा की हुड्डा सरकार को इन बेहतरीन योजनाओं पर नजर नहीं पड़ी होगी। दरअसल ये केवल हुड्डा की बात नहीं है. बल्कि ऐसा काम कांग्रेस अनेकों बार कर चुकी है और तो और ये उनकी अब आदत सी हो गई है। वे अपने शासन के कार्यकाल के चार वर्षों तक जनता को मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से शोषण करती है। और चुनाव आते ही जनता को लुभाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा देती है। हालांकि इसका लाभ जनता को चुनाव तक ही लोगों को मिलता है, फिर वही ढाक के तीन पात। सरकार के दोबारा सत्ता में आते ही मंहगाई चरम पर, थाल से दाल गायब, चीनी की मिठास में फीकापन, बेरोजगारी से जुझते नौजवानों का अंबार, आंतकवाद के आगे घुटने टेकते भारतीय प्रधानमंत्री। क्या ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है, दोबारा चुनी गई इस कांग्रेस सरकार में।
लेकिन ये सब कुछ भी ठीक है, क्योंकि जो जैसा करता है, वह वैसा ही पाता है। जनता ने चुनावी घोषणा को देखकर अपना मत दिया, ना कि पूरे पांच वर्ष के कामकाज को देखकर। दरअसल कांग्रेस ही क्या, सभी सरकार जानती हैं कि जनता की स्मरण शक्ति बेहद कमजोर है. वह अपने घरेलु परेशानियों से इस कदर जुझती रहती है कि उसे अन्य राजनीति में अपनी बुद्धि खर्च करना नागवार गुजरता है। और वह पुरानी बातों को आसानी से भूल जाती है। आज देश में न जाने कितनी समस्याएं है और इस परेशानियों से जनता त्राहिमाम्-त्राहिमाम्‌ करती दिखाई दे रही है। लेकिन हमें यह भी पता है कि लोग ४ सालों बाद इसे अवश्य भूल जाएंगे; क्योंकि उस वक्त भी कांग्रेस सरकार कुछ नया तोहफा, प्रसाद के तौर पर अवश्य बांटेगी। जिसका गुणगान करने में मीडिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा। क्योंकि मीडिया मैनेज भी बड़ी चीज होती है, जिससे भी चुनाव में जीत होती है। पर अफसोस की बात है कि मीडिया, एफएम फिर भी भारत को नम्बर वन नहीं बना पाएगा। क्योंकि जो काम ६३ सालों में नहीं हो पाया भला ५ सालों में क्या संभव होगा! हरियाणा की हुड्डा सरकार ने हाउस टैक्स, किसानों को कर में छुट, कृषि उत्पाद दरों में बढ़ोत्तरी, अनुसुचित जाति के युवतियों की शादी के लिए १५ हजार का मदद के साथ पेंशन देने का प्रावधान जैसे कई आकर्षक घोषणाएं कर हरियाणा के लोगों को आकर्षित करने का अवश्य काम किया है। यह अच्छी बात है, लेकिन यह सबकुछ दो-तीन वर्ष पहले ही हो जाता, तो शायद और भी लाभ लोगों को मिलता।
सबसे बड़ी विडम्बना यह रही कि जितनी भी चुनावी घोषणाए परियोजनाओं के तौर पर हुई वह या तो राजीव गांधी के नाम पर शुरू हुई या इंदिरा गांधी के नाम पर। फिर सवाल यह जेहन में उठता है, कि क्या हरियाणा की माटी ने किसी ऐसे महापुरूष या सपूत को जन्म नहीं दिया, जिसके नाम से यह सारी परियोजनाएं शुरू की जा सकती थी। इतना ही नहीं कम से कम हमारे देश भक्तों के नाम से भी कुछ परियोजनाएं होनी चाहिए थी, जिसके बहाने ही सही, लोगों के जेहन और जुबान में ऐसे सपूतों के नाम तो आते, जिन्होंने देश की आजादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। इतना नही तो कम से कम फिरोज गांधी के नाम से भी कुछ शिलान्यास कार्य कर डालते, जिससे लोगों को भी पता तो चलता कि नेहरू खानदान में गांधी उपनाम जुड़ने का अभिप्राय महात्मा गांधी से नहीं बल्कि
फिरोज गांधी से है। लेकिन आज जहां भी देखे और कुछ भी देखे तो किसी भी मुख्य स्थान, लगभग समस्त संस्थान या परियोजनाओं के नाम में नेहरू परिवारों का जिक्र होता रहा है। यहीं वजह है कि लोग सच्चे देश भक्तों को भूलने लगे है। और चिंता तब होती है, जब आने वाली हमारी नस्ले इन्हें पूरी तरह भूल चुकी होगी। इसके लिए राजनीतिक तौर पर कांग्रेस और नेहरू परिवार जिम्मेदार होंगे।
देश की आजादी के लिए मर मिटे शहीदों को भी नेहरू परिवार और कांग्रेस से अब घिन्न अवश्य आने लगी होगी और वे मरणोपरांत अफसोस भी जताने लगे होंगे की हमने देश के लिए क्या कुछ नहीं किया। परिवार गवाया, प्यार गवाया, जिंदगी गवाई, हमने सिर्फ खोया और जिसने केवल देश में राजनीति की, पैसों के दम पर, वह न केवल पा रहे है, बल्कि अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हमारा नामों निशान तक मिटा रहे है।
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-Narendra Nirmal

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'जिन्ना का जिन्न' लगातार विकराल रूप धारण करता जा रहा है. आडवाणी को अध्यक्ष पद गंवाना पड़ा, क्योंकि उन्होंने जिन्ना को सेकुलर कह दिया और उनकी मजार पर चादर चढाया. जसवंत को तो दल से ही बाहर कर दिया गया. रामनामियों ने अपने हनुमान का ही कत्ल कर दिया. भाजपा का तोप शांत हो गया. सुधीन्द्र कुलकर्णी ने अपनी शहादत दे दी.

'वर्शिपिन्ग फाल्स गोड' लिखने वाले अरुण शौरी ने भाजपा को 'ब्लंडर लैंड' तथा 'कटी पतंग' कह डाला. न्यूज लिखने तक भाजपा ने शौरी की शरारत को संगीन मान लिया, शायद उनकी विदाई हो रही होगी.

यह 'जिन्ना फ्लू' भाजपा से निकलकर एनडीए के अन्य घटक दलों को भी अपनी जद में लेने लग गया है. जसवंत से जिन्ना-फ्लू जद(यू) तक पहुँच गया है. जद(यू) नेता शरद यादव ने कह दिया कि जसवंत की किताब पर बैन नहीं लगाया जा सकता है. इधर हरियाणा का पुराना गठबंधन टूटकर बिखर गया है. भाजपा हरियाणा में अलग-थलग पड़ गयी है. महाराष्ट्र में शिवसेना अलग ही ताल ठोंक रहा है.

संघ के पूर्व संघचालक के.सी. सुदर्शन ने जिन्ना को राष्ट्रवादी घोषित कर दिया है. हो.वे. शेषाद्री ने अपने चर्चित पुस्तक 'यों देश बंट गया' में जिन्ना को लगभग क्लीन चिट ही दिया है. सुदर्शन के बयान आने के बाद देश भौंचक हो गया है. आखिर सुदर्शन ने जलती-पकती भाजपाई आग में इतना घी क्यों डाल दिया?
सुदर्शन के बयान के बाद जिन्ना विवाद की दिशा बदल गयी है. दशकों से जो स्वयंसेवक जीवन लगाया, अखंड भारत का सपना संजोया, आज वह सपना टूट-टूटकर बिखर रहा है.
मोहन भगवत क्या करना चाहते हैं? क्या अन्दर की रणनीति है, वह विचारणीय है. क्योंकि संघ कभी भी लूज गेम नहीं खेलता....

संभव है कि जैसा कि गोविन्दाचार्य ने पार्टी को भंग कर नयी वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत की बात की है, उस दिशा में संघ आगे बढे या फिर इस ड्रामेबाजी से भाजपा को मीडिया में बनाये रखने का खेल हो....!
अगर जिन्ना को लेकर निकालने की ही बात है, तो सुदर्शन को भी संघ से निकालना चाहिए.

महंगाई, मुद्रा स्फीति, भुखमरी चरम पर है. गरीबों का जीना मुहाल हो गया है, इस वक़्त में भाजपा को मजबूत प्रतिपक्ष की भूमिका निभाना चाहिए, ना कि इस नकली मुद्दों में देश को फंसाकर रखना चाहिए.
देश को इतिहास की जरूरत अभी नहीं है. अभी इतिहास नहीं, रोटी चाहिए. इतिहास-इतिहास कर के भाजपा देश की आम जनता का उपहास कर रही है.

अगर इतिहास की ही बात करनी है तो जिन्ना के जीवन चरित्र पर एक श्वेत-पात्र ही जारी कर दे भाजपा. सत्य पर कितना रॉब दिखायेंगे भागवत..

एक नज़र जिन्ना पर.
(१) गाँधी ने जिन्ना को कायदे-आजम (महान नेता) कहा.
(२) पिता का नाम पूंजी भाई झीना भाई और माँ का नाम रत्ना बाई था तथा बेटी का नाम दीना बाई...
(३) ना दाढ़ी ना टंगा पायजामा...
(४) जिन्ना को मुसलमानों से बदबू आती थी..
(५) १९२५ में संविधान सभा में जिन्ना ने कहा कि मैं भारतीय हूँ..
(६) पृथक मतदान का विरोधी..
(७) तिलक के अपमान का बदला जिन्ना ने वेलिंग्टन से लिया..
(८) १९३३ में जिन्ना ने 'रहमत अली' के 'पाकिस्तान' शब्द का मजाक उड़ाया. उन्हें काफिर कहा..
(९) १९३८ तक जिन्ना का रसोइया हिन्दू, ड्राइवर सिख, क्लर्क ब्राह्मण, गार्ड हिन्दू(गोरखा), संपादक ईसाई, डॉक्टर पारसी था.

उपर्युक्त बिन्दुओं से न्यूनतम चरित्र तो झलकता ही है, जिन्ना का..
'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता........'


आखिर संघ को गुस्सा किस बात को लेकर है. पटेल के अपमान को लेकर नाराजगी है, कि जिन्ना की प्रशस्ति पर, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा है. सुदर्शन के बयान के बाद देश चिंतित है, जानने के लिए कि इसके पीछे का खेल क्या है? करोडों स्वयंसेवक भी तो हमारे देश के हैं. इन स्वयंसेवकों के साथ होने वाले छल से भी तो देश की ही क्षति है.
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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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६३ वें स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में न केवल 'वर्तमान राजनीतिक संकट और लोकतान्त्रिक समाजवाद का भविष्य' विषय पर परिचर्चा हुई बल्कि गैर कांग्रेसवाद और गैर-भाजपावाद की राजनीतिक सरजमीं पर देश भर के बिखरे समाजवादियों को एक बार फिर से एक सूत्र में पिरोने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल भी की गई और इस प्रकार 'लोकमोर्चा' नामक संगठन, जो आने वाले दिनों में समस्त औपचारिकताएं पूरी कर, राजनीतिक दल का आकर ग्रहण करेगा, अस्तित्व में आया.


इस पूरी मुहीम के केंद्र में नवगठित लोकमोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक, बांका(बिहार)सांसद दिग्विजय सिंह हैं. श्री सिंह को पूर्व रेल राज्यमंत्री एवं पूर्व विदेश राज्य मंत्री होने का गौरव भी प्राप्त है. वैसे तो श्री सिंह के इस प्रयास को बिहार के मुख्यमंत्री जदयू नेता नीतीश कुमार को घेरने और उनपर दबाव बढाने के रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन जिस प्रकार से बिहार के जाने-माने समाजवादी नेता और पूर्व सांसद रामजीवन सिंह, पूर्व सांसद अरुण कुमार के अलावा उपेन्द्र कुशवाहा, ब्रहमानंद मंडल, गजेन्द्र हिमांशु, शिवनंदन बाबु आदि नीतीश विरोधी नेता दिग्विजय सिंह के पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं, उससे इतना तो तय है, कि सत्ताधारी जदयू-भाजपा गठबंधन को हालिया विधानसभा उपचुनाव और २०१० में होने वाले विधानसभा चुनाव में राजद, कांग्रेस, लोजपा, वामपंथी पार्टियों के साथ-साथ लोकमोर्चा से भी मिलने वाली राजनीतिक चुनौतियों को भी झेलना पड़ेगा. और परिणाम कुछ भी हो सकता है, क्योंकि निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दिग्विजय सिंह की जीत से न केवल उनका हौसला बढा है, बल्कि मंडल आन्दोलन और दलित चेतना के प्रमुख नेताओं नीतिश कुमार, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के राजनीतिक बयानबाजियों और प्रशासनिक निर्णयों से क्षुब्ध रहने वाले सवर्ण नेताओं एवं कट्टर सवर्ण मतों के लोकमोर्चा के साथ जुड़ने की संभावनाएं बलवती हुई हैं.

जारी......
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-Kamlesh Pandey, Spl. Correspondent, Swaraj T.V.

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हम आज 'फाइंड फ्रेंडशिप' के दौर में जी रहे हैं. फ्रेंडशिप तो हो भी जा रहा है, पर फ्रेंड का मिलना मुश्किल हो गया है. मित्रता जैसे भाववाचक को, संज्ञा प्रदान करना कठिन हो गया है.
भारत राष्ट्र का विकास, एक जैविक विकास है. समाज, संबंधों का संकलन है, एक समुच्चय है. हर व्यक्ति एक साथ अनेकों संबंधों को जीता है. हम किसी के पिता है, तो किसी के पुत्र हैं. किसी के चाचा हैं, तो किसी के भतीजा हैं. हम साला भी हैं और बहनोई भी. बिना सम्बन्ध और संबोधनों के हमारी सामाजिक अभिव्यक्ति नहीं हो सकती.

हमारे सम्बन्ध किसी औपचारिकता की कहानी नहीं बयां करते. जीवन-पर्यंत हम इन संबंधों को जीते थे. सहकार, सद्भाव, सहयोग का सन्देश देता रहा है, हमारा सम्बन्ध. तमाम अभावों के बावजूद यहाँ जीवन जीने का अवसर था. 'कम से कम असुरक्षा' थी. संबंधों का यह संसार हमारे जीवन को संतुलन प्रदान करता था. नीति-अनीति, अच्छा-बुरा व्यव्हार एवं विचार प्रमाणित होता था, इन रिश्तों से. किसी कानून, संविधान व राज्यादेश की जरूरत ही नहीं थी.

परिवार, हमारे जीवन की प्रथम पाठशाला था. परदादा-परदादी, दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, विधवा एवं परित्यक्ता के जीवन का सहारा परिवार था.
आज परिवार बिखर रहा है. बारी-बारी से परदादा-परदादी, दादा-दादी, माता-पिता परिवार से बेदखल हुए हैं. विधवा, परित्यक्ता तथा बहन-बुआ के लिए जगह समाप्त होती जा रही है.

अब सांस्कृतिक आक्रमण इतना तेज़ है, कि पति अलग, पत्नी अलग...... बच्चे क्रेच या होस्टल में... बच्चों को पढाया भी जाने लगा, कि संयुक्त परिवार बुरे परिवार होते हैं, इसे ख़त्म हो जाना चाहिए.

पाश्चात्य चिंतन में परिवार की परिभाषा यह है - "मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चे, हम दोनों के बच्चों से झगडा करते हैं." यानि पति भी पत्नी को तलाक देकर बच्चा बांटकर लाया है और पत्नी भी पति को तलाक देकर बच्चा साथ लायी है, और अब नयी शादी हुई है. इस नयी शादी से जो बच्चा पैदा हुआ, वह बच्चा, उन दोनों के बच्चों से झगड़ता है.
यही हम परिवार का मानक खडा करना चाहते हैं. भौगोलिक साम्राज्यवाद से जितना खतरा भारतीय समाज को नहीं हुआ था, उससे ज्यादा खतरा सांस्कृतिक आक्रमण से है.

दूरदर्शन और विभिन्न चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम भारतीय समाज पर एक 'साइलेंट एनविजन' (silent invasion) है. हमें पता ही नहीं चल पाया कि कब हमने अपनी विरासत को खो दिया. वैध-अवैध संतति और संबंधों की भरमार है, चलने वाले धारावाहिकों में. नकली पात्र, नकली सम्बन्ध और उसका नकली संसार. सब कुछ औपचारिक. बासी फूल. कोई जीवन का सुगंध नहीं, कोई सुरभि नहीं. प्लास्टिक का पैसा, प्लास्टिक का दिल और प्लास्टिक का घर....

अगर यह परिवार बिखर गया, तो क्या होगा? बुजुर्ग अगर पूरे तौर पर बेगाने हो गए, तो रहेंगे कहाँ? कितने वृद्धाश्रम, कितने अनाथालय, कितने परित्य्क्ताश्रम एवं विधवाश्रम बनेंगे?
वृद्ध-पेंशन देने की व्यवस्था तो सरकार कर नहीं पाती, आखिर इतने बेगाने लोगों की जिंदगी का क्या होगा?
भारत का बचपन तो दादा-दादी, नाना-नानी की गोद में ही खिलता रहा है. बच्चों के भीतर का सम्बन्धबोध तो यहीं से जगता था.
रिश्ते, अर्थ खोते जा रहे हैं. पर, आज भी इनकी उपयोगिता दिख रही है.
बचपन बाहर से ज्यादा, तो घर में असुरक्षित हो गया है. बच्चों की किडनैपिंग भी ज्यादातर रिश्तेदार ही कर रहे हैं. बलात्कार की ज्यादातर घटनाओं में रिश्तेदार के ही नाम आ रहे हैं.
परिवार को हम बाजार के हवाले करते जा रहे हैं.

बाज़ार में रिश्तों का कोई मायने नहीं होता. बाज़ार को लाभ चाहिए.....शुद्ध लाभ..
माता-पिता अगर परिवार में हैं भी, तो केवल इसलिए कि नौकर और दाई का पैसा बचाना है, या बच्चों की रखवाली करवानी है.
पितृ देवो भव, मातृ देवो भव..........ये अब दया के पात्र हैं.

पश्चिम में 'कूड़े हटाओ और बूढे हटाओ' का आन्दोलन चल रहा है. हम इस वाहियात संस्कृति की नक़ल नहीं कर सकते. अर्थहीन होते रिश्तों का केवल पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष ही नहीं, आर्थिक पक्ष भी है.
भारत को एक भीड़ में तब्दील करने की गहरी सांस्कृतिक साजिश चल रही है. देश को अगर बचाना है, तो इन पारिवारिक मूल्यों को बचाना ही होगा. अन्यथा यह पीढी अराजक होगी, संज्ञाहीन होगी. संबोधन मुक्त होगी..

यह भी संभव है कि इस अराजकता में कोई बेटा 'माँ' को 'वाइफ ऑफ़ फादर' कहने लग जाए. जब 'माँ' ही 'वाइफ ऑफ़ फादर' हो जायेगी, तब फिर इस गौमाता, गंगा माता और भारतमाता का क्या होगा? क्या मातृऋण और राष्ट्र-ऋण चुकाए बिना ही यह पीढी गुजर जायेगी.
आइये! संबंधों के इस संसार को बाजार बनाने से रोकें...

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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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