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मौलवी शफाअतुल्ला का बयान:

मौलवी शफाअतुल्ला ने कहा, कि मैं एक सभा में भाषण दे रहा था कि कृपाराम ने मुझे एक मांस का टुकडा और दूसरे कई लोगों ने हड्डियाँ दिखाई. मैंने उपस्थित लोगों को वे चीजें दिखा दी. २५ तारीख को सवेरे मैं उस स्थान पर गया, जहाँ लाशें जलाई गयी थी. वह जगह रस्सी से घेर दी गयी थी. जिससे लोग जूते पहनकर उस पर ना जाएँ.
उस घेरे के अन्दर ३-४ फ़ुट ऐसी जगह थी जहाँ से केरोसिन तेल की बू आ रही थी. खुरेदने से, वहां हड्डी के छोटे-छोटे टुकड़े निकलते थे. मेरे सामने वह जगह खोदी गयी. उसमें से हड्डी के टुकड़े और अधजले कोयले निकले. उनसे भी मिटटी के तेल की बू आ रही थी. वहां से कोई दो सौ गज के फासले पर एक जगह खून लगे हुए कंकड़ पड़े थे. मेरे साथियों ने उन्हें चुन लिया.
हमें मालूम हुआ, कि पुलिस वाले कसूर से ग्रंथी और आचार्य लाये थे. वहां जाकर तलाश करने पर हमें जगन्नाथ आचार्य मिल गया. पर ग्रंथी नहीं मिला. उसने साथ चलकर वह जगह दिखाई जहाँ लाश जलाई गयी थी. कसूर में खोज करने पर मालूम हुआ कि डिप्टी पुलिस सुपरिटेंडन्ट शिव दर्शनसिंह ने २३ मार्च की शाम को एक दुकान से ४ टिन मिटटी का तेल ख़रीदा था.

फिरोजपुर में जांच कमिटी

१५वीं अप्रैल को, जाँच कमिटी फिरोजपुर पहुंची. वहां जाते समय सदस्यगण दाह-स्थान देखने के लिए गए. आज वह स्थान नहीं पहचाना जाता था, बालू से बराबर कर दिया गया था और स्वयंसेवकों द्वारा बनाया हुआ घेरा भी तोड़ डाला गया था. दो खुफिया पुलिस के आदमी थोडी दूर से उस स्थान की निगरानी कर रहे थे. सड़क के दूसरी ओर करीब फर्लांग की दूरी पर तीन खीमें गडे हुए थे, जिसमें एक दर्जन से अधिक पुलिस के सिपाही बैठे थे. जमीन के बराबर किये जाने के सम्बन्ध में पूछने पर सी. आई.डी. वालों ने अपनी अनभिज्ञता जतलाई. फिरोजपुर में गवाहियाँ लेने पर फोटोग्राफर लाला मेहरचंद, जिन्होंने दाह-स्थान का फोटो लिया था, और कृपाराम नमक एक दुकानदार ने पिछले बयान का समर्थन किया. कृपाराम ने कमिटी के सामने एक बोतल पेश की, जिसमें चिता स्थान पर पाया गया मांस का एक टुकडा रखा गया था. टुकड़े का वजन १ छटांक के लगभग था.
हरवंशलाल नामक मोटर ड्राईवर ने कहा कि कृपाराम ने उसके सामने मांस का टुकडा चिता-स्थान से उठाया था. गवाह ने उससे एक छोटा टुकडा ताबीज बनाने के लिए लिया. नौजवान भारत सभा के अध्यक्ष अमरनाथ ने कहा कि उन्हें उस स्थान पर कुछ जली हुई हड्डियाँ मिली. गवाह ने हड्डियों को कमिटी के सामने पेश भी किया.
पं. चिरंजीलाल ने भी मांस का टुकडा कमिटी के सामने पेश किया. फिरोजपुर के लाला मुकुन्दलाल एडवोकेट ने कहा कि दाह-स्थान ४ वर्ग फ़ुट से ज्यादा न होगा. इतने संकीर्ण स्थान में तीन लाशें अलग-अलग नहीं जलाई जा सकती. उन्होंने कहा कि हिन्दू या सिख किसी की भी लाश किरोसिन के तेल से जलाना धर्म विरुद्ध है. डॉ. सत्यपाल के प्रश्न का उत्तर देते हुए मौलवी मुहम्मद हुसैन ने कहा कि लाशों के काटे जाने की बात सुनी है.
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सरदार भगतसिंह आदि के शव-दाह के विषय में जांच करने के लिए कांग्रेस की ओर से जो कमेटी नियुक्त की गयी थी, उसने लाजपत राय हाल में १२वीं अप्रैल से बयान लेना शुरू कर दिया. १२वीं अप्रैल को बयान शुरू होने से पहले डॉ. सत्यपाल ने बताया कि हमने पंजाब-सरकार के चीफ सेक्रेटरी से इस जाँच में सहयोग देने का अनुरोध किया था, पर वहां से जवाब मिला कि सरकार इस मामले की जाँच कर चुकी है और उसका नतीजा भी प्रकाशित कर दिया गया है; इसलिए अब वह और किसी जाँच में सहायता देना नहीं चाहती. इसके बाद फिरोजपुर कांग्रेस कमेटी के मंत्री श्री पृथ्वीचंद वकील, मि. शफ़ाअतुल्ला, श्रीमती पार्वती देवी और श्रीमती सोंधी की गवाहियाँ हुईं.

श्री पृथ्वीचंद वकील का बयान :
श्री पृथ्वीचंद ने अपने बयान में कहा कि २४ मार्च को सवेरे ८ बजे मुझे मालूम हुआ कि सरदार भगतसिंह आदि की लाशें, सतलज के किनारे पुराने पुल के पास जलाई गई हैं. इस समाचार की सच्चाई की जाँच करने पर पता लगा कि खबर ठीक है. उस जगह से मिटटी के तेल की बू आ रही है. और जमीन अभी तक गरम है. सवा दस बजे के करीब एक सिक्ख देकेदार ने भी आकर कहा कि रात ही को वहां लाशें दफना दी गई और जमीन से अभी तक मिटटी के तेल की बू आ रही है.
थोडी देर बाद मुझे मालूम हुआ कि सरदार भगतसिंह और उनके साथियों के रिश्तेदार मौके पर आये हैं, कुछ मित्रों के साथ मैं भी वहां पहुंचा. मैंने देखा कि जहाँ लाशें दफनाई गयी थी, वहां से केरोसिन की गंध आ रही थी. कुछ अधजले कोयले के टुकड़े भी वहां पर पड़े हुए थे. मैंने मेहरचंद फोटोग्राफर को बुला कर उस स्थान का फोटो खिंचवा लिया. एक आदमी ने, जिसका नाम कृपाराम है, मुझे एक अधजला मांस का टुकडा दिखाया. वह अठन्नी के बराबर था और आध इंच के करीब मोटा था. उसने कहा कि चींटियाँ उस टुकड़े को घसीट कर ले जा रही थीं. वहां मुझे यह भी मालूम हुआ कि वहां एक कटी हुई हड्डी मिली थी, जिसे भगतसिंह के घरवाले ले गए.
छुट्टी के दिन हम लोग फिर उस स्थान पर गए. खां शफ़ाअतुल्ला ने चिता-स्थान से करीब ३० कदम के फासले पर एक जगह दिखाई, जहाँ दाह-क्रिया के दूसरे दिन उसने खून देखा था. हम लोगों को वहां कुछ कंकड़ मिले, जिन पर खून लगा हुआ था. वे कंकड़ फिरोजपुर में मेरे पास रखे हुए हैं. पचास-साठ कदम के फासले पर एक झोपडी थी, जिसमे झोपडी वाले के सिवा एक और आदमी था. झोपडी वाले को कुछ मालूम न था, किन्तु उस दूसरे आदमी ने कहा कि दाह-स्थल के पास एक जगह उसने खून गिरा हुआ देखा था. रेलवे फाटक पर उस समय मौजूद एक आदमी से पूछने पर मालूम हुआ कि रात को ४-५ लारियाँ वहां आई थी. जिनमे अधिकतर अंग्रेज थे. एक पर डेढ़-दो मन लकड़ी और मिट्टी के तेल के कनस्तर भी थे. रायजादा हंसराज के प्रश्न करने पर व्यक्ति ने कहा, कि जहाँ दाह-क्रिया की गई थी, वहां तीन अर्थियां अलग-अलग रख कर नहीं जलाई जा सकती है, अगर ऐसा किया जाता तो पास वाली झाड़ियों तक आग का असर जरूर पहुंचता, और एक झाड़ी तो जल ही जाती.
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-Nirman Samvad, News Desk

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(1) भगतसिंह और साथियों को फांसी कैसे दी गयी?

(2) भगत सिंह की फांसी के बाद महात्मा गांधी का वक्तव्य..

(3) नाराजगी तो है तुम्हारे प्रेम-पत्र से......


२३ मार्च को सरदार भगतसिंह और उनके साथियों से अंतिम भेंट करने के लिए उनके घर वालों को सूचना तो दी गयी थी, पर वे भेंट नहीं कर सके. उस दिन भगतसिंह अपनी कोठरी में बैठे हुए ऊँचे स्वर से गा रहे थे-
'मेरा रंग दे बसंती चोला, इसी रंग में रंग के शिवा ने माँ का बंधन खोला..'

फांसी कैसे दी गयी..

जब हाईकोर्ट में दी हुई दोनों दरख्वास्तें नामंजूर हो गई, तब लाहौर की सेन्ट्रल जेल में फांसी देने का प्रबंध किया जाने लगा. साधारणतया फांसी प्रातः काल ही हुआ करती है, पर सरदार और साथियों को रात में ही ख़त्म कर डालने का निश्चय कर लिया गया था. चार से छः बजे तक जेल का वह हाल था, कि जेल के जो अफसर बाहर थे, वे बाहर ही रह गए और जो अफसर अन्दर थे, वे अन्दर रह गए.
ठीक ७ बजकर ३५ मिनट पर तीनों देशभक्त कोठरियों से निकाले गए. उनकी आँखों पर टोपी पहनाई गयी. पहले सरदार भगत सिंह के गले में फांसी का फंदा रखा गया. सरदार ने बड़े ऊँचे स्वर में अपने दोनों साथियों से विदा ली. जवाब में उन्होंने 'भगतसिंह जिंदाबाद' का नारा लगाया. इस तरह से उनका नारा लगाना था कि सेन्ट्रल जेल के राजनीतिक तथा साधारण कैदियों को सिग्नल मिल गया. यद्यपि सभी कैदी अपनी-अपनी बैरकों में उस वक़्त बंद किये जा चुके थे, तो भी उन्होनें जोर-जोर से 'भगतसिंह-जिंदाबाद' के गगन-भेदी नारे लगाये. उनके नारे जेल के बाहर भी सुने जा सकते थे.
उसी समय 'डाउन-डाउन विद यूनियन जैक' (ब्रिटिश झंडे का क्षय हो) के नारे लगाए गए, जो एक मिनट तक लगते रहे. फिर आवाजें बंद हो गयीं. सरदार के बाद श्रीयुक्त राजगुरु को और अंत में श्रीयुक्त सुखदेव को फांसी दी गयी. उसके बाद तीनों लाशें स्ट्रेचर पर रखीं गयीं और दीवार के एक छेद से बाहर कर दी गयीं.
शहीदों की भस्म भी नहीं दी गयी.
२४ मार्च को प्रातःकाल नगर के विभिन्न मुहल्लों में जिला मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर से निम्नलिखित पोस्टर चिपके हुए पाए गए:-
"सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि कल शाम को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गयी और उसके बाद जेल के बाहर ले जाकर, लाश सतलज के किनारे भस्म कर दी गयी और राख़ नदी में बहा दी गयी."


"भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटकाने में जल्दबाजी कर गवर्नमेंट ने समस्त देश के मनोभावों को कुचलने का प्रयत्न किया है. उसने ऐसे अवसर पर जो भयंकर भूल की है, उसका संधि पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता."
-हिन्दू (अंग्रेजी)

"राजनैतिक दृष्टि से इससे अधिक शैतानी कार्य की योजना नहीं की जा सकती."
-स्वराज्य ( अंग्रेजी)

"गवर्नमेंट ने विप्लववादियों की सहानुभूति प्राप्त करने का सुवर्ण अवसर हाथ से खो दिया है."
-स्वदेश मित्रम (अंग्रेजी)

"भगतसिंह और उनके साथियों की फांसी से देश के शिक्षित युवकों में भयंकर असंतोष फैलने की संभावना है. उनके प्राणों की भिक्षा के लिए गवर्नमेंट के पास हजारों प्रार्थना-पत्र भेजे गए, सैकडों सभाएं हुईं. परन्तु अंत में उनका परिणाम कुछ भी न निकला. यद्यपि जनता ने इन वीर और अमर देशभक्तों को, जिन्हें कानून ने अंतिम दंड दिया था, जुलुस निकाल कर और अन्य प्रकार से बचाने का प्रयास किया था; उनकी कानूनी कार्यवाही में इतनी भूलें थी, कि यदि गवर्नमेंट चाहती तो उन्हें कानून के आधार पर मुक्त कर सकती थी. इसमें संदेह नहीं कि गवर्नमेंट ने कराची कांग्रेस के अवसर पर उन्हें फांसी पर लटका कर महात्मा गाँधी के मार्ग में कांटे बिछा दिए हैं. "
-लीडर (अंग्रेजी)

"सरदार भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की सजा रद्द न कर, गवर्नमेंट ने जैसी भयंकर भूल की है, उसकी तुलना कई वर्षों की किसी भयावह घटना से नहीं की जा सकती. इस देश के इतिहास में इतनी सनसनी किसी मामले में नहीं फैली, जितनी इस मामले में. और कभी किसी मामले में फांसी की सजा रद्द करने के लिए देश ने इतनी अनुनय-विनय नहीं की है. "
-ट्रिब्यून (अंग्रेजी)

"सरदार भगतसिंह को फांसी हो गई और सरकार समझती है, कि शायद इन देश-भक्तों को फांसी देकर उसने विप्लववाद का नाश कर दिया है, पर उसे मालूम होना चाहिए, कि इस एक ही घटना से उसकी कठिनाइयाँ हजार गुना बढ़ गयी. और इससे केवल यही भय नहीं है कि विप्लव की आग और भी भड़केगी, वरन यह भी संभव है कि इस घटना से महात्मा गाँधी का प्रभाव भी एकदम कम हो जाए, जिसने देश को खून खराबे से अब तक बचा रखा है. "
-रियासत (उर्दू)

"सरदार भगतसिंह आदि को फांसी देकर सरकार ने केवल अपने ही मार्ग में कठिनता का सामान पैदा नहीं कर लिया है, बल्कि कांग्रेस को भी मुश्किल में डाल दिया है. "
-अवध अख़बार (उर्दू)

"हम यह तो नहीं कह सकते, कि सरकार ने यह काम बुद्धिमानी का किया है या मुर्खता का, क्योंकि यह तो समय ही बताएगा. परन्तु यह अनुमान करना कठिन नहीं, कि इससे देश में बेचैनी बढेगी और महात्मा गाँधी जैसे बुद्धिमान और प्रभावशाली नेताओं का स्थान नवयुवक छीन लेंगे."
-शेर खालसा (उर्दू)

"जहाँ तक देश में शांति की प्रतिष्ठा और भारत तथा इंग्लैंड के सम्बन्ध को कायम रखने का पक्ष है, हमारी राय में इस फांसी से उसको असह्य चोट पहुंची है. लार्ड इर्विन और मि. मैकडोनाल्ड ने एक से अधिक बार दोनों देशों में अच्छा सम्बन्ध स्थापित करने की अपील की थी, जिसके उत्तर में महात्मा गाँधी ने अपना सत्याग्रह बंद कर दिया और सरकार को मौका दिया......परन्तु शोक है कि इन्ही लार्ड इर्विन और मि. मैकडोनाल्ड के शासन-काल में सरदार भगतसिंह आदि को फांसी के तख्ते पर लटका कर देश में शांति के परदे पर बिजलियाँ गिराने की चेष्टा की गई."
-वतन (उर्दू)

"सरकारी हलके में इंग्लैंड और भारत के सम्मानपूर्ण समझौते के शत्रु तो बहुत से हैं, परन्तु जिस व्यक्ति ने वायसराय को इस आखिरी मौके पर इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी है, वह सचमुच दोनों देशों का कट्टर दुश्मन भी है और अत्यंत मूर्ख भी. "
-पंजाब केसरी (हिंदी)

"सरकार की जिद से यह बात सिद्ध होती है, कि उदारता के ढोल पीटने पर भी सरकार अपने हाथ की शक्ति कम नहीं करना चाहती. "
-नवीन भारत (हिंदी)

-Swaraj T.V. Desk
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सरदार पटेल का वक्तव्य :

२४ मार्च को सरदार पटेल ने भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी के सम्बन्ध में नयी दिल्ली में निम्न वक्तव्य दिया:-
"अंग्रेजी कानून इस बात पर अभिमान से झूमता था, कि वह गवाही में जिरह के द्वारा प्रमाणित किये बिना किसी अभियुक्त को सजा नहीं देता, परन्तु उसी कानून ने ऐसी गवाही के विश्वास पर, जो घटना के बहुत देर बाद प्राप्त हुई थी और जिसमे जिरह का नाम न था- भारत के श्रेष्ठ युवकों की हत्या कर डाली. किसी व्यक्ति को ढीठता और उच्छ्स्रंख्लता के अपराध की सजा दी जा सकती है, परन्तु उसे फांसी पर लटका देना कहाँ का न्याय है"

पंडित मदनमोहन मालवीय का क्लेश:

पं. मदनमोहन मालवीय ने कराची को प्रस्थान करने से पहले मुलाकात में कहा- "इस फांसी से मुझे इतना दुःख हुआ है कि मेरे मुंह से शब्द नहीं निकलते."

पं. जवाहरलाल नेहरु का वक्तव्य:

२४ ता. को नयी दिल्ली में पं. जवाहरलाल नेहरु ने अपने वक्तव्य में कहा:-"मैंने इन देश-भक्तों के अंतिम दिनों में अपनी जबान पर लगाम लगा रखी थी, क्योंकि मुझे संदेह था, कि मेरे जबान खोलते ही कहीं फांसी की सजा रद्द होने में बाधा न पहुंचे. यद्यपि मेरा ह्रदय बिलकुल पक गया था और खून अन्दर से उबाल खा रहा था, परन्तु तिस पर भी मैं मौन था. परन्तु अब, फैसला हो गया. इस देश भर के लोग मिलकर भी भारत के ऐसे युवक की रक्षा नही कर सके, जो हमारा प्यारा रत्न था और जिसका अदम्य उत्साह, त्याग और विकट साहस भारत के युवकों को उत्साहित करता था. भारत आज अपने प्यारे बच्चों को फांसी से छुडाने में असमर्थ है. इस फांसी के विरोध में देश भर में हड़तालें होगी और जुलुस निकलेगा. हमारी इस परतंत्रता और असहायता के कारण देश के कोने-कोने में शोक का अन्धकार छा जायेगा."

मौलाना ज़फरअली का वक्तव्य:

"अभागे भारत ने अपने इतिहास में ऐसी असहायता का कभी अनुभव नहीं किया था, जैसी असहायता का अनुभव उसने २३ ता. को भगत सिंह और साथियों की फांसी के वक़्त किया है."

-Swaraj T.V. Desk

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नयी दिल्ली से करांची कांग्रेस के लिए रवाना होने से पहले ता.२४ को महात्मा गाँधी ने सहयोगी "हिंदुस्तान टाईम्स" में प्रकाशित होने के लिए निम्नलिखित वक्तव्य दिया है:-

"भगत सिंह और उनके साथी अमर-शहीद हो गए हैं. उनकी मृत्यु से आज लाखों व्यक्ति दुखी हैं. मैं इन नवयुवक देश-भक्तों की लगन की भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ. परन्तु मैं देश के नवयुवकों को इस बात की चेतावनी देता हूँ, कि वे उनके पथ का अवलंबन न करें. हमें भरसक उनके अभूतपूर्व त्याग, अदम्य उत्साह और विकट साहस का अनुकरण करना चाहिए, परन्तु उन गुणों का उपयोग उनकी तरह ना करना चाहिए. देश की स्वतंत्रता हिंसा और हत्याओं से प्राप्त नहीं होगी. गवर्नमेंट के सम्बन्ध में मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूँ, कि उसने विप्लववादियों की सहानुभूति प्राप्त करने का स्वर्ण अवसर खो दिया है. संधि की शर्तों के अनुसार उसका यह कर्तव्य था कि वह उनकी फांसी की सजा को कुछ समय के लिए स्थगित कर देती. अपने इस कार्य से उसने संधि पर बड़ा आघात किया है और इस बात का परिचय दिया है, कि उसमें अभी भी जनता के मनोभावों को कुचलने की शक्ति है. पशुबल के इस प्रदर्शन से यह स्पष्ट हो जाता है, कि बड़ी-बड़ी घोषणाएं और सहानुभूति-सूचक सन्देश देने के उपरांत भी वह अपनी शक्ति और शासनाधिकार से जरा भी हाथ खींचना नहीं चाहती. परन्तु गवर्नमेंट की इस दुनिती से कांग्रेस को अपने उद्देश्य और अपने निश्चय से तिल-मात्र भी नहीं डिगना चाहिए. आवेश में आकर हमें पथ-भ्रष्ट न होना चाहिए. हमें यह समझकर संतोष कर लेना चाहिए, कि फांसी की सजाएं रद्द करना संधि के प्रस्तावों में निहित न था. गवर्नमेंट पर हम गुण्डापन का दोष आरोपित कर सकते हैं, परन्तु हमें उस पर संधि भंग करने का दोष न मढ़ना चाहिए. मेरी व्यग्तिगत राय से भगतसिंह और उनके साथियों की फांसी से हमारी शक्ति बढ़ गयी है. हमें आवेश में आकर इस अवसर को व्यर्थ न खोना चाहिए. इस फांसी के विरोध में देश भर में हड़तालें होना बिलकुल स्वाभाविक है. इन देश-भक्तों की फांसी के विरोध में मौन-जुलुस निकालने से अधिक उनका सम्मान नहीं हो सकता. इस अवसर पर हमें देश पर और अधिक आहुति देने के लिए तैयार होना चाहिए.

-Swaraj T.V. Desk

'रंग दे बसंती चोला' से 'चोली के पीछे क्या है' तक......(1)


"LOC kargil" फिल्म लगी थी सिनेमा हाल में. देशभक्ति का अवसान काल चल रहा था. फिर भी देखने का जज्बा सा जाग पड़ा. हाल पहुँच कर बड़ा सुकून मिला था. अच्छी खासी भीड़ थी देखने वालों की. लगा कि चलो देश मरा नहीं है. दर्शकों में ज्यादातर युवा ही थे, मेरी ही उम्र के आसपास के.
फिल्म चल पड़ी थी, मेरा उत्साह जोर मार रहा था. लेकिन युवा साथी कुछ शांत से लग रहे थे, लड़ाई का सीन शुरू होते ही सबकी चेतना वापस आने लगी थी. लेकिन अचानक हुए शोर से (हूटिंग कहते हैं) मैं थोडा सा चौंक गया था, कारन समझ नहीं आया था शोर का. फिर थोडी देर में पता लगा कि शोर कही गयी बातों पर नहीं हो रहा था, बल्कि तालियाँ तो उन शब्दों पर बज रही थीं जिन्हें "बीप-बीप" की आवाज में डायरेक्टर ने छुपा दिया था, शायद सेंसर के चलते. मगर मैं सोच रहा था कि अब सेंसर कहाँ गया..ना कहते हुए भी कह देने का तरीका भी तो है.
शोध कहते हैं कि सोशल नेट्वर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर युवा इनके जरिये ऐसे ही नए चलन में आये हुए स्टाइलिश शब्दों का आदान प्रदान करते हैं. "दिल दोस्ती" और "ओमकारा" की तारीफ इनकी जबान पर है.
बातें तो LOC की भी है, लेकिन "बीप-बीप" की चर्चा ज्यादा है.
हालिया प्रकरण सच का सामना धारावाहिक को लेकर मचा हुआ बवाल भी है. आश्चर्य होता है जब इस तरह के धारावाहिकों के समर्थन में किसी को कहते सुनता हूँ, एक से एक कुतर्कों के साथ.
जितनी निर्लज्जता के साथ निर्देशक ने इसे पेश किया है, प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं. उतनी ही निर्लज्जता के साथ कुछ बुद्धिजीवी इसके समर्थन का राग भी अलाप रहे हैं. तर्क दिया जा रहा है कि आखिर अमेरिका में भी तो यह धारावाहिक चलता है.
भैया अमेरिका में तो शादी की पाँचवीं सालगिरह मनाने की नौबत ही नहीं आती, लेकिन भारत में सात जन्मों का साथ निभता है.
तासीर का फर्क तो समझो अमेरिका और भारत की. वहां "माँ सिर्फ पिता की पत्नी होती है." उस संस्कृति में आप इस "सेक्स का सामना" करवाइए....मगर भारत में तो नहीं..
आश्चर्य है अब देश की चर्चा, मूलभूत समस्यायों की चर्चा करने के लिए किसी के पास समय ही नहीं बचा है.
हर साल की तरह फिर एक बार स्वतंत्रता दिवस आने वाला है. उत्साह हर रोज घटता जा रहा है. अब भगत सिंह पैदा तो होना चाहिए लेकिन हमारे घर में नहीं पडोसी के घर में.
'सरदार भगत सिंह के आखिरी उदगार' पढ़ रहा था, यकीन ही नहीं होता कि जिस उम्र में साला हम एक खरोंच से डर जाते हैं, उसी उम्र का वो बन्दा कितनी बेफिक्री से अपने मरने के तरीके सूझा रहा था ब्रिटिश सल्तनत को. हमें बेकार की लफ्फाजियों से फुर्सत नहीं और भगत सिंह पूरी दुनिया को अर्थशास्त्र सिखा रहा था.
जब सारा देश महात्मा गाँधी का पूजा की हद तक सम्मान कर रहा था तब कैसी बेबाकी और साफगोई से सुखदेव ने उन्हें पत्र लिखकर अपना और क्रांतिकारियों का पक्ष रखा, और अपने लिए माफ़ी की बात खारिज कर दी..
पता नहीं किस मिटटी के बने थे वो? या शायद इस पीढी की मिटटी ख़राब हो गयी है. !!
मंहगाई, भूख, बेरोजगारी, लूट, बलात्कार सब कुछ तो है बस अगर कुछ नहीं है तो वो है इन बातों पर चिंतन करने और इन्हें ख़त्म करने वाली जमात. 'सच का सामना' पर तो बहस है, लेकिन इन जमीनी मुद्दों पर कहीं चूं भी नहीं है.
सब खोज में लगे हुए हैं चोली के पीछे के राज को...
कौन जिम्मेदार है इस वैचारिक और नैतिक पतन का?
-Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.


अत्यंत सम्माननीय महात्मा जी,
आजकल के नए समाचारों से मालूम होता है कि आपने संधि-चर्चा के बाद से क्रांतिकारियों के नाम कई अपीलें निकाली हैं जिनमे आपने उनसे कम से कम वर्तमान समय के लिए अपने क्रन्तिकारी आन्दोलन रोक देने के लिए कहा है. वास्तविक बात यह है कि किसी आन्दोलन को रोक देने का काम कोई सैद्धांतिक या अपने वश की बात नहीं है. समय-समय की आवश्यकताओं का विचार करके आन्दोलन के नेता अपना और अपनी नीति का परिवर्तन किया करते हैं.
हमारा अनुमान है, कि संधि के वार्तालाप के समय आप एक क्षण के लिए भी यह बात न भूले होंगे, कि यह समझौता कोई अंतिम समझौता नहीं हो सकता. मेरे ख्याल से इतना तो सभी समझदार व्यक्तियों ने समझ लिया होगा, कि आपके सब सुधारों के मान लिए जाने पर भी देश का अंतिम लक्ष्य पूरा न हो जायेगा. कांग्रेस, लाहौर कांग्रेस के प्रश्नानुसार स्वतंत्रता का युद्ध तब तक लगातार जारी रखने के लिए बाध्य है, जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये. बीच-बीच की संधियों और समझौते क्षणिक विराम मात्र है. उपरोक्त सिद्धांत पर ही किसी प्रकार का समझौता या विराम-संधि की कल्पना की जा सकती है.
समझौते के लिए उपयुक्त अवसर का तथा शर्तों का विचार करना नेताओं का काम है. यद्यपि लाहौर के पूर्ण स्वाधीनता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आन्दोलन स्थगित कर दिया है, फिर भी वह प्रस्ताव ज्यों का त्यों बना हुआ है. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के क्रांतिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित करना है. इस ध्येय संशोधन के लिए जरा भी गुंजाईश नहीं है. वे तो अपना संग्राम, जब तक कि ध्येय न प्राप्त हो जाए और आदर्श की पूर्ण स्थापना न हो जाए, तब तक जारी रखने के लिए बाध्य है. परन्तु वे परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ-साथ अपनी युद्ध-नीति भी बदलते रहना जानते हैं. क्रांतिकारियों का युद्ध भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न स्वरुप धारण कर लेता है.
कभी वह प्रकट रूप रखता है, कभी गुप्त धारण कर लेता है., कभी केवल आन्दोलन के रूप में हो जाता है और कभी जीवन और मृत्यु का भयानक संग्राम करने लग जाता जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में क्रांतिकारियों के सामने आन्दोलन रोक देने के लिए कुछ विशेष कारणों का होना तो आवश्यक ही है. परन्तु आपने हम लोगों के सामने ऐसा कोई निश्चित कारन उपस्थित नहीं किया, जिस पर विचार करके हम अपना आन्दोलन रोक दें.
केवल भावुक अपीलें क्रांतिकारियों के संग्राम में कोई प्रभाव नहीं पैदा कर सकतीं. समझौता करके आपने अपना आन्दोलन स्थगित कर दिया है, जिसके फलस्वरूप आपके आन्दोलन के सब बंदी छूट गए हैं. परन्तु क्रन्तिकारी बंदियों के विषय में आप क्या कहते हैं? सन १९१५ के ग़दर पार्टी वाले राजबंदी अब भी जेलों में सड़ रहे हैं., यद्यपि उनकी सजाएं पूरी हो चुकी हैं. लोदियों मार्शल-ला के बंदी अब भी जीवित ही कब्रों में गडे हुए हैं. इसी प्रकार दर्जनों बब्बर अकाली कैदी जेल यातना भोग रहे हैं. देवगढ, काकोरी, मछुआ बाजार और लाहौर षड़यंत्र केस लाहौर, दिल्ली, चटगांव, बम्बई, कलकत्ता आदि स्थानों में चल रहे हैं. दर्जनों क्रांतिकारी फरार हैं. जिनमें बहुत सी तो स्त्रियाँ हैं. आधे दर्जन से अधिक कैदी अपनी फांसियों की बाट जोह रहे हैं. इस सबके विषय में आप क्या कहते हैं? लाहौर षड़यंत्र के केस के तीन राजबंदी, जिन्हें फांसी देने का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश देश में बहुत बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली है, क्रांतिकारी दल के सब कुछ नहीं हैं. दल के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीं है. वास्तव में इनकी सजाओं के बदल देने से देश का उतना कल्याण न होगा, जितना कि इन्हें फांसी पर चढा देने से होगा. परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी आप इनसे अपना आन्दोलन खींच लेने की सार्वजानिक अपीलें कर रहे है. वे अपना आन्दोलन क्यों रोक लें, इसका कोई निश्चित कारन नहीं बतलाया? ऐसी स्थिति में आपकी इन अपीलों के निकालने का मतलब तो यही है कि आप क्रांतिकारियों के आन्दोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हैं. आप इन अपीलों के द्वारा स्वयं क्रांतिकारी दल में विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे हैं. अगर यह बात न होती, तो आपके लिए सबसे अच्छा उपाय यह था कि आप कुछ प्रमुख क्रांतिकारियों से मिलकर इस विषय की सम्पूर्ण बातचीत कर लेते. आपको उन्हें आन्दोलन खींच लेने की सलाह देने से पहले अपने तर्कों को समझाने का प्रयत्न करना चाहिए था. मेरा ख्याल है, कि साधारण जन-समुदाय की तरह आपकी भी यह धरना न होगी कि क्रन्तिकारी तर्कहीन होते है और उन्हें केवल विनाशकारी कार्यों में ही आनंद आता है. हम आपको बतला देना चाहते है कि, यथार्थ में बात इसके बिलकुल विपरीत है. वे प्रत्येक कदम आगे बढ़ने के पहले अपनी चतुर्दिक परिस्थितियों का विचार कर लेते हैं. उन्हें अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान हर समय बना रहता है. वे अपने क्रांतिकारी विधान में रचनात्मक अंश की उपयोगिता को मुख्य स्थान देते हैं, यद्यपि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें केवल विनाशात्मक अंश की ओर ध्यान देना पड़ा है.
गवर्नमेंट क्रांतिकारियों के प्रति पैदा हो गयी सार्वजानिक सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी तरह से उन्हें कुचल डालना चाहती है. अकेले में वे सहज ही कुचल दिए जा सकते हैं. ऐसी हालत में किसी प्रकार की भावुक अपील निकाल कर उनमे विश्वासघात और फ़ुट पैदा करना, बहुत ही अनुचित और क्रांति-विरोधी कार्य होगा. इसके द्वारा गवर्नमेंट को, उन्हें कुचल डालने में प्रत्यक्ष सहायता मिलती है. इसलिए आपसे हमारी प्रार्थना है, कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओं से, जो कि जेलों में हैं, इस विषय में कोई बातचीत करके कुछ निर्णय कर लीजिये या फिर अपनी अपीलें बंद कर दीजिये. कृपा करके उपरोक्त दो मार्गों में से किसी एक का अनुसरण कीजिये. अगर आप उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो कृपा करके उन पर रहम कीजिये. और उन्हें अकेला छोड़ दीजिये. वे अपनी रक्षा अपने आप कर लेंगे. वे अच्छी तरह से जानते हैं, कि भविष्य के राजनितिक युद्ध में उनका नायकत्व निश्चित है. जनसमुदाय उनकी ओर बराबर बढ़ता आ रहा है और वह दिन दूर नहीं है, जबकि उनके नेतृत्व और उनके झंडे के नीचे जनसमुदाय उनके सोशलिस्ट प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखाई पड़ेगा.
या, यदि आप सचमुच उनकी सहायता करना चाहते हैं, तो उनका दृष्टिकोण समझने के लिए उनसे बातचीत कीजिये और सम्पूर्ण समस्या पर विस्तार के साथ विचार कर लीजिये.
आशा है, आप उपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेंगे ओर अपनी राय सर्व-साधारण के सामने प्रकट कर देंगे.

आपका,
'अनेकों में से एक'



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फांसी के कुछ दिन पहले सरदार भगत सिंह और उनके साथियों ने दया प्रार्थना के लिए इनकार करते हुए पंजाब गवर्नर को लिखा था- "अंत में हम केवल यह कहना चाहते हैं कि आपकी अदालत के फैसले के अनुसार हम सम्राट के विरुद्ध युद्ध करने का अभियोग लगाया गया है और इस प्रकार हम युद्ध के शाही कैदी हैं. अतएव हमें फंसी पर न लटका कर गोली से उदय जाना चाहिए. इसका निर्णय अब आपके ही ऊपर है कि जो कुछ अदालत ने निर्णय किया है इसके अनुसार आप कार्य करेंगे या नहीं. हमारी आपसे विनम्र प्रार्थना है और हमें पूर्ण आशा है कि आप कृपा कर फौजी महकमे को आज्ञा देकर हमारे प्राण-दंड के लिए एक फौज या पलटन के कुछ जवान बुलवा लेंगे."



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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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