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भारत विभाजन के बुनियादी कारण

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/20/2010 01:25:00 am 0 comments


उन बुनियादी कारणों की रूपरेखा प्रस्तुत करना जिनकी वजह से विभाजन हुआ। इन कारणों में हैः पहला, ब्रिटिश कपट, दूसरा कांग्रेस नेतृत्व की ढ़लती उमर, तीसरा, हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वस्तुपरक अवस्था, चौथा, जनता में साहस और सतर्कता की कमी; पांचवा, गांधी की अहिंसा; छठवाँ, मुस्लिम लीग की पृथकवादिता; सातवाँ, जो अवसर मिले उनका फायदा उठाने की अक्षमता; और आठवाँ, हिन्दू अहंकार।

अखंड भारती और विभाजन
कट्टर हिन्दूवाद द्वारा विभाजन के विरोध का कोई मतलब नहीं था, और न ही हो सकता था, क्योंकि देश का विभाजन करने वाली शक्तियों में एक शक्ति यही कट्टर हिन्दूवाद थी। यह वैसी ही थी जैसे कोई खूनी खून करने के बाद उस गुनाह के धक्के से पीछे हटता है। इसके बारे में कोई गलती नहीं होनी चाहिए। जिन्होंने अखंड भारत-अखंड भारत जोर-जोर से चिल्लाया, यानी वर्तमान जनसंघ और हिन्दूवाद की विचित्र अहिन्दू भावना वाले उसके पुरखों ने (अगर करतूतों के परिणाम की दृष्टि से देखें, न कि उनकी नीयत कि दृष्टि से) देश का विभाजन करने में ब्रिटेन और मुस्लिम लीग की मदद की है। उन्होंने एक ही देश के अन्दर मुसलमान को हिन्दू के करीब लाने का कोई जरा-सा भी काम नहीं किया। इस तरह का अलगाव ही विभाजन की जड़ बना। अलगाव के दर्शन को स्वीकार करना और साथ-ही-साथ, अखंड भारत की बात करना खुद को धोखा देने का गन्दा काम है। किसी युद्ध के संदर्भ में ही उनके इस काम का मतलब और मसरफ हो सकता है, जब वे खुद इतने ताकतवर हों कि अपने से अलग किये हुओं को दबा सके। इस तरफ का युद्ध कम-से-कम इस सदी में असम्भव है। इसलिए युद्ध के बिना अखंड भारत और हिन्दू-मुस्लिम अलगाव, इन दोनों अवधारणाओं को मिलाने से केवल विभाजन का विचार और मजबूत होता है और पाकिस्तान को मदद मिलती है। हिन्दूस्तान में मुसलमानों का विरोधी पाकिस्तान का दोस्त है। जनसंघी और हिन्दू ढब के सभी अखंड भारती पाकिस्तान के दोस्त हैं। मैं सच्चा अखंड भारती हूं। मैं विभाजन को पंसद नहीं करता। सीमा के दोनों तरफ ऐसे लाखों लोग जरूर होंगे। लेकिन अविभाजित हिन्दुस्तान की ललक के प्रति सच्चे होने के पहले सिर्फ हिन्दू या सिर्फ मुसलमान नहीं बने रहना चाहिए।
सच्चे राष्ट्रवाद के दो फांटे हो गये थे। उसके एक फांटे ने तो विभाजन के विचार को अपना समर्थन दिया, जबकि दूसरे ने उसका विरोध किया। सच्चा राष्ट्रवाद सिर्फ जबान से या खामोशी से ही विरोध कर सका, उसमें सक्रिय ढंग से विराध करने की शक्ति नहीं थी। इसीलिए राष्ट्रवाद की मुख्य संस्था के आत्मसमर्पण और द्रोह में उसका विरोध आसानी से समा गया।
कम्युनिस्टों की गद्दारी भी, इसी तरह, कोई प्रमुख रोल अदा नहीं करती। उसके कारण कुछ पैदा नहीं होता, कारण और कहीं से पैदा होते हैं। कम्युनिस्टों के समर्थन से पाकिस्तान नहीं पैदा हुआ। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा एक दाई का काम किया।

हिन्दू-मुस्लिम अलगाव का सिलसिला
पिछले आठ सौ बरसों के आपसी संबंधों में अलगाव और मेल के उतार चढ़ाव से हिन्दू और मुसलमान लगातार पीड़ित रहे और अलगाव पर ही कुछ ज्यादा जोर रहा। इससे एक राष्ट्र के अंदर इनकी भावात्मक एकता अभी तक नहीं हो सकी। साथ ही, हिन्दुस्तानी लोगों का स्वभाव समाधान, सहनशील स्वीकृति और आत्मसमर्पण की
कला इतनी मात्रा में सीख गया है कि इस धरती पर और कहीं भी गुलामी को विश्व-बंधुत्व या गद्दारी को राजनीति या परवशता को समझौता समझने की गलती नहीं होती। इन दो तत्वों ने हिन्दू-मुस्लिम समस्या को चलाया है। उनके बिना, ब्रिटिश कपट या कांग्रेसी नेताओं का बढ़ता हुआ बुढ़ापा इतिहास की बेमतलब तहसील बन कर रह जाते और इनके करण ऐसा कड़वा फल न निकलता जैसा कि निकला।
हिन्दू से मुसलमान के अलगाव का सिलसिला आजादी के बरसों में भी चला आया। आजादी के बरसों में भी मुसलमान को हिन्दू के नजदीक लाने के लिए, उनके मन से अलगाव के बीज खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया। कांग्रेस सरकार का एक अक्षम्य अपराध यह है कि वह इन विलग आत्माओं को नजदीक लाने में असफल रही। वास्तव में, इसके लिए प्रयास करने की उसकी इच्छा ही नहीं रही।
इस अपराध के पीछे वोट फंसाने की तबियत और विश्वयारी का दर्शन है। इस देश के लगभग सभी राजनैतिक तत्व, विशेषतः ऐसे जो अपनी धर्मनिरपेक्षता पर घमण्ड करते हैं, इनसे पीड़ित हैं। धर्मनिरपेक्ष दलों ने अभी तक हिन्दू और मुसलमान को ऐसी अपील करने की जुर्रत नहीं की है कि जिससे उनके बुरे विचार या बुरी आदतें छूट सकें। स्वार्थ की इस ख्वाहिश को विश्वयारी के दर्शन की परार्थवादी तर्कसंगति मिल गयी। हर एक समस्या अलग-अलग निपटाने या उसका हल ढूंढ़ने की कोशिश करने की आवश्यकता को विश्वयारों ने महसूस नहीं किया है। वे यह मानकर चलते हैं कि उद्योगीकरण और आधुनिक अर्थव्यवस्था हिन्दू-मुस्लिम अलगाव को खत्म कर
देंगे। यह बेवकूफी से भरी कल्पना है, क्योंकि ऐसा रिश्ता है ही नहीं।

धर्म व इतिहास के घटक
राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक घटक, समूहों और जातियों को तोड़ते हैं, लेकिन ऐसी टूट के लिए वास्तविक शक्ति कहीं और से आती है- प्रतीकों और निर्गुण चीजों से। निःसंदेह, सहभोज या अंतर्विवाह जैसे सामाजिक, संपूर्ण रोजगार या राष्ट्रीयकरण या बराबरी जैसे आर्थिक और पिछड़ी जातियों और गुटों को प्रतिनिधित्व की गारंटी जैसे राजनैतिक हल जरूर निकालने चाहिए। इन हलों के बिना, अलगाव की समस्या को कभी खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन सिर्फ इन्हीं दलों के भरोसे वह हमेशा किसी न किसी रूप में, चाहे शांत या उग्र रूप में रहेगी। धर्म और इतिहास के घटकों पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा। यह आदमी के दिल और दिमाग को कड़वा बनाते है। प्रयास इस बात का करना चाहिए कि दूसरे के धर्म के प्रति आदर और समझ-बूझ पैदा हो। इन्हें पैदा करने के लिए धर्मो का ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन बेहतरीन तरीका है। ऐसे मामलों में चिकनी-चुपड़ी भावुकता उतनी ही बेमतलब है, जितनी कि कट्टरता विनाशकारी और विभानकारी है। धार्मिक मतों और विश्वासों की
एक तरफ उपलब्धियों और दूसरी तरफ उनकी खामियों-कमियों का संयमित और ठंडे दिल से मूल्यांकन लाभदायी होगा।


राम मनोहर लोहिया की पुस्तक से साभार



लीजिये, जनकल्याणार्थ प्रधानमंत्री महोदय का एक और बयान आ गया है. लगता है कि देश में उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से परेशान हैं प्रधानमंत्री!

होना भी चाहिए, क्योंकि दूसरी बार सत्ता जो मिली है. जन भरोसा का सर्टिफिकेट मिला है; सो जन यानि आम जन की याद उन्हें फिर सता रही है. उन्होंने पिछले दिनों आह्वान किया था कि सीबीआई आमजनता की इस धारणा को समाप्त करे कि बड़ी मछलियाँ सजा से बच जाती हैं. इससे भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है , सुरसा के मुख की तरह. लिहाजा न केवल दुनिया में भारतीयों की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि इसके कारण गरीबों को सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. मनमोहन सिंह ने साफतौर पर यह कहा है, कि लोग यह मानते हैं कि हमारे देश में सिर्फ कमजोर लोगों के खिलाफ ही तुंरत कार्रवाई होती है, उच्च पदों पर बैठे और सबल लोग बच जाते हैं. उन्होंने उम्मीद जतायी कि इस धारणा और हालात को बदलने के लिए सम्बंधित एजेसियों को उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से आक्रामकता के साथ निपटना चाहिए. प्रधानमंत्री के मुताबिक, दुनिया हमारे लोकतंत्र का सम्मान करती है, पर यहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार हमारी छवि को धूमिल करता है. इससे निवेशक हतोत्साहित होते हैं, क्योंकि वे सौदों में पारदर्शिता चाहते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि देश का विकास हो रहा है और हम वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल हो रहे हैं, पर भ्रष्टाचार के कारण सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकी संसाधन हासिल नहीं हो पा रहे हैं. उन्होंने फिर दुहराया कि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा और ज्यादा खामियाजा गरीबों को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि उनके लिए शुरू की गयी योजनायें भ्रष्टाचार में ही ख़त्म हो जाती हैं, और वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं.

प्रधानमंत्री को यह याद दिलाना जरूरी है, कि दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी भी अपने समय में ऐसी चिंता व्यक्त कर चुके हैं. उन्होंने तो आंकडे भी दिए थे. वर्तमान पार्टी महासचिव राहुल गाँधी भी इस बात को कई बार कह चुके हैं.
समस्या बीस पैसा, दस पैसा पहुँचने का नहीं, बल्कि जो मातहत ठेकेदार या सरकारी, गैर सरकारी एजेंसियां क्रमबद्ध रूप से ८०-८५ पैसा खा रही हैं, उनके विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई, पीएमओ को इस पर श्वेतपत्र लाना चाहिए.

प्रधानमंत्री को याद दिलाना होगा कि देश में मौजूदा नौकरशाही और उसकी विभिन्न लाबियों, समाज में सक्रिय दबाव समूहों, अर्थजगत में छाई विभिन्न लाबियों को जनोन्मुखी बनाने, तथा इसमें बाधक व्यक्तियों को न्यायिक जांच के दायरे में लाने में, और समय रहते देश में प्रचलित ठेकेदारी की व्यवस्था की भी समीक्षा करने में, यदि वे विफल रहते हैं, तो फिर यही समझा जायेगा कि मतदाताओं ने दलित व पिछड़ी मानसिकता से बाहर निकलकर कांग्रेस को जो जनाधार दिया है, उसका मकसद अधूरा रह गया.

राजनीतिक इतिहास फिर अपने आप को दुहराए, तो देश में सबसे लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस को हतप्रभ नहीं होना चाहिए. सवाल देश की आर्थिक सेहत का तो है ही, आम जनता के आर्थिक सेहत की उपेक्षा भी घातक हो सकती है.....

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रेडियो-दूरदर्शन पर 'हरियाणा नंबर वन' का धुआंधार प्रचार जारी है. देखते-सुनते आजिज हो गया हूँ. विकास की जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह बहुत ही फूहड़ और खोखली प्रतीत होती है.

भाजपा का अपना अन्तर्विरोध है, नाकारापन है, पर कांग्रेस भारत के मौजूदा चीखते सवालों से बचकर भाग नहीं सकती. अपने सौ दिनों के ही शासन काल में देश की जो दुर्गति की है, वह कहने और गिनाने की जरूरत नहीं है.

महंगाई, पार्टी पूछकर घर नहीं घुसती...चाहे कांग्रेसी हों या भाजपाई, हर का जीवन जंजाल बन गया है. महंगाई स्थायी मुसीबत के रूप में स्थापित हो चुकी है. सूखे की मार अलग है. देश महामारी को झेलने को विवश है..
झूठ को हज़ार बार दुहराओ कि वह सत्य बन जाए. क्या हरियाणा भारत राष्ट्र से अलग है? क्या हरियाणा की भूमि अचानक उर्वरा हो गयी है? क्या हरियाणा के भूजल स्तर में सुधार आ गया है? उत्पाद, बाज़ार और विपणन पर क्या हरियाणा के किसानो का अधिकार हो गया है? खेती योग्य जमीन से क्या किसानो की बेदखली रुक गयी है?

हरियाणा भ्रूण-हत्या के मामले में 'नंबर वन' रहा है. क्या यह छवि सुधर गयी है? जातीय समरसता जार-जार नहीं हुई है, क्या हरियाणा में? झज्जर की तालिबानी पंचायतो का क्या फैलाव नहीं हुआ है?

दरअसल मनमोहन सिंह के सिपाही जिस विकास की बात कर रहे हैं, उस विकास की पोल खुल चुकी है.'हरियाणा नंबर वन' जिस विकास की कसौटी पर 'नंबर वन' बना है, उसकी परिणति देश देख रहा है.
किसानों के हाथ से बीज छिन गए, बाज़ार निकल गया. खाद ख़त्म हो गए. कृषि के तमाम साधन आज बाज़ार के हवाले हो चुके हैं. खेती बाज़ार का नहीं, आजीविका का साधन है.

हरियाणा में भूमि का कम्पनीकरण किया गया. बड़े पैमाने पर किसानों की भूमि छीनी गई. उपजाऊ भूमि पर मॉल बन रहे हैं या फैक्ट्रियां खुल रही हैं. ऊंची अट्टालिका हरियाणा की बर्बादी को बयां कर रही हैं. सड़क, बिजली और पीने के पानी को पूरे सामाजिक जीवन से अलग कर विकास के लक्ष्य के रूप में विकसित किया गया.
हरियाणा का जो विज्ञापन टी.वी. और रेडियो पर चल रहा है, उसका सम्बन्ध केवल हरियाणा से नहीं है. उसे पूरा देश देख रहा है. अरबों रुपया खर्च करके कांग्रेस देश को क्या दिखाना चाहती है, कि वह तीस मारखां है...

'हरियाणा नंबर वन' बना सकते हैं, तो देश को भी नंबर वन बना सकते हैं. कांग्रेस लाज बचा रही है. महंगाई का जवाब नहीं है कांग्रेस के पास.

कांग्रेस मायावती को घेरती है कि वह मूर्ति क्यों बनावती फिर रही हैं? कांग्रेस बताये कि वह देश का पैसा क्यों पानी की तरह बहा रही है?
देश की दारुण स्थिति को देखते हुए, कांग्रेस को तुंरत इस प्रकार की फिजूलखर्ची पर रोक लगाना चाहिए. हरियाणा में विकास के नाम पर हुए विनाश की चर्चा जारी रहेगी.......

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नए पाठकों से आग्रह है कि कृपया वाद के विषय को जानने की दृष्टि से माननीय विजयेन्द्र जी का यह लेख अवश्य पढें. और उसपर की गई टिप्पणियों को भी.

सम्माननीय निशाचर जी(क्षमा किजीयेगा, ब्लॉग जगत में नया होने के कारण आपके वास्तविक नाम से परिचित नहीं हूँ) मैं दो दिन से सुरेश जी के लेख के समालोचना (पूरा लेख पढने पर इसमें कही भी मात्र आलोचना नहीं लगती) में लिखे गए माननीय विजयेन्द्र जी के लेख पर चल रहे विवाद को देख रहा हूँ. जैसा उचित लगा मैंने टिपण्णी भी की.

एक बात आप स्वीकार करें या ना करें, बात चाहे लेख की हो या टिप्पणियों की, आप और सुरेश जी अपने पूर्वाग्रह से बाहर नहीं ही निकल पाए. आपने सदैव ही एक पक्ष को देखना चाहा.

संघ की दीक्षा में मैं भी जिया हूँ. उनकी अच्छी बातें आज भी जीवित हैं मन में, और जीवन में भी. लेकिन किसी वर्ग विशेष के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना बेकार है. 'ग' से 'गणेश' न भी पढाया जाए तो क्या होना है? उनका अस्तित्व तो सिर्फ इस बात का मोहताज नहीं है, कि उन्हें किताबों में सजा कर रखा जाए. उन्हें मन में बनाये रखने का कितना प्रयास किया हमने, प्रश्न तो ये है. फिर आखिर 'गणेश' और 'गधे' की ही बहस क्यों है? 'ग' से 'गणराज्य' पढाने की चिंता क्यों नहीं है आपको? रही बात मेरे कलमा पढने या ना पढने की, तो जहाँ तक मैंने उसी शिशुमंदिर की पढाई से मानवता के बारे में जाना है, उससे यही निष्कर्ष निकलता है, कि मात्र कलमा पढ़ देना, इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि मैं हिन्दू नहीं रहा. बल्कि सच यही है, कि इस प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित तथाकथित महान हिन्दुओं के कारण ही आज हिंदुत्व एक प्रश्न बन गया है.

आखिर हिंदुत्व की बात तो विवेकानंद ने भी की थी, लेकिन उसके विरोध में कोई प्रश्न नहीं खडा हुआ. तब फिर आपके हिंदुत्व पर प्रश्न क्यों खड़े हो रहे हैं, इस पर आपको खुले दिल और दिमाग से सोचना होगा.
मुझे पार्टीबाजी में कोई दिलचस्पी नहीं है. ना मैं भाजपा विरोधी हूँ ना कांग्रेस समर्थक. लेकिन इस बात पर मेरा विरोध अवश्य है, कि भाजपा ने हिंदुत्व को एक प्रश्न बना दिया है. विवेकानंद का हिंदुत्व एक समाधान था. सारे विश्व ने उसका सम्मान किया. सनातन संस्कृति को भी सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता रहा. लेकिन इस बात पर विमर्श की आवश्यकता है कि आखिर आज क्यों यह शब्द प्रश्न बन गए हैं?

आखिर इस हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्र में भी आपको समर्थन नहीं मिल रहा है, तो इसका अर्थ है कि आप आमजन को अपनी विचारधारा नहीं समझा पा रहे हैं. क्यों नहीं समझा पा रहे हैं? इसका कारण भी है. इसका कारण जानने के लिए, आपको इस तथाकथित हिंदुत्व के पीछे पनप रहे ब्राह्मणवाद को भी समझना और स्वीकारना होगा.

जाकर देखिये उन इलाकों में, जहाँ पादरी की बेटी गंदे और मैले-कुचैले दलित के बच्चों को गोद में उठाकर मातृत्व बरसाती है, आखिर वो इसाई नहीं तो क्या बनेंगे? आखिर कितने तथाकथित हिंदुत्व के पुरोधा उन दलितों को पुचकारने जा रहे हैं? राहुल गाँधी चाहे आपके शब्दों में ढोंग ही कर रहे हों, लेकिन आमजन को अच्छा लगता है जब वह संसद में दलित 'कलावती' का मुद्दा उठाते हैं. आपने हिंदुत्व को, उस हिंदुत्व रक्षक जमात से जोड़ने का प्रयास किया ही कब है?

जहाँ तक बात सुरेश जी की है, सुरेश जी, कथित तौर पर एक देशभक्त लेखक हैं, आपकी देशभक्ति अनुकरणीय है, आपके भीतर नए भारत के निर्माण की बेचैनी भी है. लेकिन देश के लिए मरना है तो क्या ट्रेन के नीचे सो जाएँ? भाई! इस देश को कमजोर करने और तोड़ने वाली ताकतें कौन सी हैं. उन कारणों को चिन्हित किये बिना, राष्ट्रनिर्माण का कौन सा हथियार हम गढ़ पाएंगे? दुश्मन ही पता नहीं हो, तो शून्य में तलवार भांजने से क्या फायदा? आग्रह और पूर्वाग्रह से हमें मुक्त होना ही होगा. अतीत लाख विकृत हो, पर उस विकृति को संस्कृति मानकर क्यों चला जाए?

सारे तंत्र फेल हो चुके हैं. झंडों का रंग एक हो चुका है. "जो जाए लंका वही हो जाये रावण....!" स्वदेशी की कोख से निकली हुई सरकार ने तो कोख को कलंकित कर ही दिया. और वाजपेयी सरकार के देशप्रेम को भी हम देख चुके हैं. भारत-माता की जय यानि भारत सरकार की जय नहीं होना चाहिए. हिंदुत्व को मारने की ताकत ना तो माइकल में है, ना मोहम्मद में है. तब फिर मीडिया की क्या बिसात है? क्या हिंदुत्व की रक्षा अब इस दो टके पर बिकने वाली मीडिया के हाथों ही होगी? हिंदुत्व अगर मरेगा, तो अपने ही अन्तर्विरोध के कारण से.

आपके इतिहासबोध पर हमें विश्वास है, कि हिंदुत्व के निरंतर हार के पीछे के कारण क्या है, आप जानते होंगे. अपने पूर्वजों की कमाई को कितना देर बेच-बेचकर खाते रहेंगे. हमें अपने इतिहास को लेकर आत्महीनता नहीं है. अपने इतिहास के प्रति आत्ममुग्ध होना भी अच्छा है, लेकिन असीम आत्ममुग्धता तो ठीक नहीं है.

सम्माननीय, भारत का मौजूदा चीखता हुआ सवाल इस प्रकार के आग्रही चिन्तनों से समाधान की ओर नहीं बढ़ पायेगा. परिवर्तन की हवा बनाने में बुद्धिजीवियों की भूमिका तो होती है, परन्तु कुर्बानी तो बनवासी, गिरिजन, आदिवासियों को ही देनी होती है.

वैसे भी दुनिया का कोई विचार अंतिम सत्य नहीं है, मैं भी जो कुछ कह रहा हूँ, वह सत्य का केवल एक टुकडा भर है, और आप भी जो लिख रहे हैं आजकल, वह भी सत्य का एक टुकडा ही है, किसी भी विचार या चिंतन को अंतिम सत्य मान लेना राष्ट्रीय दुर्भाग्य को न्यौता देना होगा. न ही 'दास कैपिटल' अंतिम सत्य है, न ही 'बंच ऑफ़ थोट्स' अंतिम सत्य है, ठीक उसी तरह ना 'हिंदुत्व' अंतिम सत्य हैं, न 'इसलाम' अंतिम सत्य है. इस वक़्त की एक जरूरी जरूरत है, हर जगह की अच्छी बातों को स्वीकार कर, एक नए औजार को गढा जाए. यही नया औजार, नए भारत के निर्माण में सहायक होगा.

हम अच्छे बनें, हिन्दू अच्छा बने और मुसलमान भी अच्छा बने. परन्तु हिन्दू बनाने का जो आपका कार्यक्रम है, उससे हिंदुत्व कम से कम नहीं ही बचेगा. समाज की प्रतिरोधी शक्तियों को बढाएं. भेदभाव, ऊंच-नीच को मिटायें, भारतीय समाज किसी भी वायरस का मुकाबला कर लेगा. आप इसकी चिंता करें.
जिस दिन आप इसकी चिंता करना शुरू कर देंगे, हिन्दू और हिंदुत्व दोनों बच जायेंगे.
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'पुन्य प्रसून वाजपेयी' ने एक लेख लिखा है, कि लालू यादव किस प्रकार खामोशी से हवाई अड्डा से बाहर निकल जाते हैं. उत्साही कार्यकर्ताओं के 'इन्कलाब जिंदाबाद' की चीख कहाँ गायब हो गई. पुन्य प्रसून ने गंभीर विश्लेषण किया है अपने इस लेख में.
सत्य है, कि लालू यादव केंद्र और राज्य की सत्ता से बेदखल हो गए हैं. अवसरवादी कार्यकर्ताओं की भीड़ का ना जुटना स्वाभाविक है.
बावजूद, लालू यादव की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. उनका जनाधार आज भी ख़त्म नहीं हुआ है.
आज नीतीश बिहार का बागडोर संभाले हुए हैं. नीतीश के इस वर्त्तमान का आधार भी लालू यादव ही हैं. यथास्थितिवाद, सामंतवाद और जातिवाद का पहला आक्रमण तो लालू ने ही झेला था.
क्या परिस्थिति थी बिहार की? जगन्नाथ मिश्र, विन्देश्वरी दूबे, भागवत झा आदि का शासन बिहार झेल चुका था. चारों ओर जातिवाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला था. हर कार्यालय, हर मंच और मोर्चे पर जातिवादी, सामंतवादी शक्तियों का ही कब्जा था.
लालू पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा. अपराध का राजनीतिकरण, परिवारवाद का आरोप लगा.कर्पूरी ठाकुर पर किसी भ्रष्टाचार, परिवारवाद एवं अपराधियों के प्रशय का आरोप नहीं लगा. एकदम बेदाग व्यक्तित्व. यहाँ तक कि कर्पूरी ठाकुर ने कभी अपने बेटे को टिकट नहीं दिया और परिवार को हासिये पर रखा.
आखिर इतनी योग्यता के बाद भी कर्पूरी ठाकुर की सत्ता क्यों नहीं टिक पायी.?
लालू ने जवाब बनने का प्रयास किया. पिछडे के पास भी सबल, स्वावलंबी और स्वाभिमानी नेतृत्व हो, इसके लिए लालू ने अनचाही हरकत को भी अंजाम दिया.
लालू पर जितना घोटाला का आरोप लगा, उतनी राशि तो दिल्ली में कोई चपरासी भी नहीं छूता.
पिछले बीस-पचीस वर्षों से बिहार की सत्ता पिछडों के बीच ही घूम रही है.
नीतीश का भाजपा से गठबंधन है, बावजूद भी उपमुख्यमंत्री का पद सुशील मोदी को ही मिला. अश्विनी चौबे एवं अन्य ब्राह्मण नेतृत्व हासिये पर ही रह गया. अगर लालू बेदाग होते. कथित आरोपों से मुक्त होते, किसी भूत-बेताल को अपने साथ नहीं सटाते, तो बिहार में वे कितने दिन टिक पाते? ब्रिज बिहारी प्रसाद की तरह उनकी भी हत्या हो जाती.
नागनाथ से सांपनाथ अच्छा है. बिहार का जमींदार जितना जहरीला था, कि उसका दंश झेलना ज्यादा मुश्किल था.
संचिकाओं के निष्पादन का सफल मुख्यमंत्री, लालू भले ही न बन पाए हों, पर इतना तय है, कि बिहार के वंचितों, दबे-कुचलों को उनकी उपस्थिति ने स्वाभिमानी बनाया.अत्याचार का जो सनातन सिलसिला शुरू हुआ था, उसपर लगाम अवश्य लगा. समाज के उपेक्षित वर्ग सीना ठोंककर आगे बढे.
एक बात और है कि लालू अगर इतना ही नकारा था, तो १५-१६ बरस राज करने का मौका बिहार ने क्यों दिया? सदियों के शोषण से निजात के समक्ष लालू की अकर्मण्यता छोटी दिखती रही.
लालू की सत्ता भी तभी गई जब बिहार को नीतीश जैसा मजबूत विकल्प मिल गया. बिहार किसी भी स्थिति में यथास्थितिवादियों और सामंती ताकत को फिर से सत्ता सौंपने की तयारी में नहीं है.
शरद, लालू, नीतीश, मुलायम और पासवान अगर साथ हों, दूरगामी लक्ष्य सामने हो, तो बिहार और उत्तर प्रदेश से फिर साम्राज्यवाद की हवा बह सकती है.
लालू की दी हुई बुनियाद को नीतीश भी स्वीकारते होंगे.
उत्तर-भारत की यह समाजवादी शक्तियां एकजुट हो गई तो कारपोरेट राजनीति पर लगाम लग सकती है.
राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. नीतीश और शरद भी भाजपा के गुलाम थोड़े ही हैं.
जिस प्रकार महंगाई की मार है, गुलाम होती खेती और किसानी है, बिकते जल, जंगल और जमीन हैं, तो उस स्थिति में ये एक हो जायें, इस संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता. आखिर ये सब साथ तो रह ही चुके हैं.
बस, प्रसून जी, लालू की खामोशी विस्फोट के पूर्व का सन्नाटा भर है, देखते रहिये.
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कल यमुना पुल से होकर गुजर रहा था...नजर भव्य अक्षरधाम मंदिर पर जाकर अटक सी गयी.. कितना ही भव्य बना हुआ है यह मंदिर..
लेकिन किस लिए???
मन कहता है कि यह भारत देश ही एक मंदिर है....... और जब तक हम इस मंदिर के परिवेश को सुन्दर बनाये रखने का कोई प्रयास ही नहीं कर रहे, तब फिर ऐसे करोडों रूपये लगाकर हज़ार अक्षरधाम खड़े करने से क्या होगा??
जब तक देश का असली देवता, किसान भूखा रहेगा.. आत्म हत्या करेगा....तब तक आप किसी भी मंदिर की पूजा से स्वर्ग नहीं पहुँच सकते..
वैसे मेरा प्रश्न मंदिर बनने से नहीं है....अच्छा है कि ऐसे और भी भव्य मंदिर बनें...मैं भी आस्तिक प्रवृत्ति का प्राणी हूँ....ईश्वर में गहरी आस्था है...मंदिरों में माथा टेकना अच्छा लगता है मुझे भी....
लेकिन क्षोभ तो यमुना को देख कर पैदा हुआ है....यमुना की हालत देखकर बरबस ही आंसू निकल पड़ते हैं..आज यमुना नदी से नाले में तब्दील होती जा रही है... मैं खोजता हूँ उस यमुना को, जिसके किनारे कदम्ब की छाँव में मेरे कन्हैया बांसुरी बजाते थे.....
हमारा धर्म तो कभी भी प्रकृति-विरोधी नहीं रहा है... तब फिर यमुना की छाती को उजाड़ कर कंक्रीट का जाल बना देना, कौन से धर्म का द्योतक है... प्रकृति के साथ चलते हुए ऐसे हजारों मंदिरों का समर्थक हूँ मैं भी...लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ करके बनाए गए इस मंदिर से मेरे मन को कोई शांति नहीं मिलती.. ..लेकिन याद रखना होगा हमें कि अगर यमुना के दामन पर दाग लगेगा तो फिर यहाँ के निजाम का दामन भी बेदाग नहीं रह सकता.
प्रकृति के साथ ऐसा ही एक खिलवाड़ मेट्रो के नाम पर किया जा रहा है.. आज भी इस हस्तिनापुर पर राज तो मनमोहन का ही है....लेकिन ये मेरे मोहन नहीं हैं...क्योंकि इन्हें कदम्ब के पेड़ों से कोई लगाव नहीं है...यह यमुना किनारे कदम्ब की नहीं मेट्रो की खेती कर रहे हैं...
श्रीधरन जी को थोडा सा भी इतिहासबोध होता...या कि तनिक सा भी लगाव होता इस यमुना से, तो वो कटीली झाड़ियों के बदले कदम्ब के वृक्ष लगा रहे होते यमुना बैंक पर...आपको मेट्रो के विकास का श्रेय तो मिल ही रहा है...यमुना की संस्कृति बचाने का शुभकार्य भी कर लेते...
आप विकास कीजिये, मंदिर बनाइये, मेट्रो बनाइये, मगर कम से कम प्रकृति की प्रवृत्ति को तो ध्यान में रखिये..
विकास के नाम पर यमुना की छाती पर किये जा रहे इस तांडव को आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाता रहेगा....?


'सर्दी, खांसी न मलेरिया........लवेरिया..' वाला गाना अब बंद करो भैया... सर्दी, खांसी से अब लवेरिया का नहीं....स्वाइन-फ्लू का रिश्ता हो गया है. सूअर कहीं का....और फ्लू कहीं और..
इस बीमारी से 'मैन' तो तबाह है ही, मार्केट भी तबाह हो गया है. गालों पर क्रीम अब कौन लगाये? लिपस्टिक लगाकर भी क्या होगा? भाड़ में जाए यह रंग-बिरंगी लिपस्टिक.....कौन देखने वाला है अब लाल-लाल होंठ को...
अब तो बस गोरे-गोरे चेहरे पर उजला-उजला मास्क....मास्क के भीतर से आवाज भी स्पष्ट नहीं आती. लड़कियां बोलती हैं आम, तो लगता है इमली....
स्वाइन-फ्लू ने युवाओं को बेचैन बना दिया है. नहीं चाहिए किसी के साँसों की ताजगी....क्या ठिकाना ताजगी के चक्कर में कोई ताज़ा खबर न बन जाए....
खांसने के बाद कोई बालिका उलटकर देखती तक नहीं, बल्कि मुंह फेर लेती है..
थियेटर भी बंद और शोपिंग मॉल भी बंद.... बस केवल चैटिंग ही शेष है चुम्मा-चाटी के सहारे के तौर पर....
वैसे हंसते वक़्त मैं कभी मुंह का ख्याल नहीं रखता था. खैर लड़कियां तो पहले से ही मुंह पर रुमाल रखकर खांसती रही हैं. अब उबड़-खाबड़ दांत वालों को बहुत राहत हो गयी है. पान-गुटखा खा-खाकर मैंने भी कई दांतों की शहादत दी है. इस सूअर-फ्लू से मुझे भी काफी राहत है.
सरकार भी मसखराबाज हो गयी है. वह कभी कुछ बोलती है तो कभी कुछ.. कभी कहती है कि इसका इलाज संभव है, तो कभी असंभव..
दवा उद्योग की चांदी हो गयी है. बाजार को तो बिक्री चाहिए. बर्बादी से इसे क्या वास्ता..
ई ससुरा मास्क भी महंगा हो गया है. १५ रुपये का मास्क सौ रूपये में बिकने लगा है. डरी-सहमी जनता का लाभ न उठाओ भाई, नहीं तो आपका भी गंगा-लाभ हो जायेगा. गंगा से बहुत लाभ होता है, पर गंगा-लाभ ठीक नहीं. बहती गंगा में बाजार हाथ ना धोये, हाथ साबुन से धोये.. गंगा की तरह परिवेश को निर्मल बनाये रखें.
जिंदगी इकलौती है. सबों को जीने का मौका दें. लिप ही नहीं जिन्दा रहेंगा, तो लिपस्टिक कैसे बिकेगा? पहले व्यक्ति को बचा ले, फिर बाजार भी जिन्दा रहेगा. बस सबों के बेहतर स्वास्थ्य की कामना के साथ...

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जल-जमाव, जलाधिक्य और जल-संकट....यह है पानी का सौगात इस सूबे के लिए.ये तीनों प्रकार का दुर्भाग्य सबके भाग्य में नहीं होता.......
बिहार की आँखें कभी सरबती हैं, तो कभी भींगती हैं और कभी सूख जाती हैं......बिहार के तन-मन में इतने गहरे जख्म पड़े हैं, कि दर्द भी परेशान है कि किस जख्म से बाहर निकले....?
साल दर साल की तबाही का अंत नहीं... तस्वीर बनते-बनते उजड़ जाती है. सड़कें हर साल गड्ढे में तब्दील हो जाती हैं. संसाधन यूँ ही स्वाहा होता रहता है. बिहार का धैर्य अब टूटता जा रहा है. किन-किन परिस्थितियों से लड़े....बाढ़ से, सुखाड़ से या जलभराव से...?
इस बार बाढ़ नहीं तो सुखाड़ आ गया.. पूरा बिहार अभी सूखे की चपेट में है. २६ जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है. हेल्पलाइन, राहत शिविर, राहत पॅकेज का फिर से वही जुगाड़.... बिहार का त्राहिमाम सन्देश बार-बार केंद्र को भेजा जा रहा है. आखिर बिहार, कांग्रेस के लिए कोई बुंदेलखंड तो नहीं है, जहाँ सियासत चमकेगी. वैसे शायद प्रधानमंत्री सिर्फ विदर्भ और बुंदेलखंड ही नहीं बिहार के लिए भी होता है.... लगातार बिहार की उपेक्षा असहनीय है..
४१% कम बारिश हुई है बिहार में. ३५ लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती थी. मात्र १९% खेती की बुवाई संभव हो पाई है. १४,५०,७०६ हेक्टेयर में से केवल ६०,००० हेक्टेयर भूमि को ही सिंचाई की सुविधा बिहार सरकार अभी मुहैय्या करवा पा रही है.
१९६५ के भयावह सूखे का रिकार्ड भी टूट रहा है. लोगों का पलायन शुरू हो गया है. गाँव का गाँव खाली होने की स्थिति में है. बिहार नयी वीरानगी की ओर बढ़ चला है. महंगाई अलग ही मुंह चिढा रही है.
सियासती खेल में सूबे के इस संकट को कम करके देखना, एक राजनीतिक नाइंसाफी है. सूखा-बिहार आखिर किस प्रकार इस स्वतंत्रता दिवस का स्वागत करेगा???
स्वतंत्रता का एहसास बिहार को भी करवाइए प्रधानमंत्री जी, या फिर इस बार लाल किला से बिहार के लिए लाल कफ़न मुहैया कराने की घोषणा कीजियेगा...

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"जी मंत्री जी... बाढ़ बहुत भयावह स्थिति में है, मैं उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से बचाव और राहत का प्रयास कर रहा हूँ. आप प्रशासन से कुछ और सहायता के लिए आग्रह कीजिये...." अविनाश ने बेचैनी से कहा.
अविनाश की नियुक्ति बाढ़-प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष के रूप में अभी जल्दी ही हुई थी. पहली बार बाढ़ की विभीषिका को देखने के कारण से उसे ये बाढ़ कुछ ज्यादा ही भयावह लग रही थी. और शायद इसीलिए सुधार की दिशा में उसकी गति भी विभाग की कच्छप गति से कहीं ज्यादा तीव्र थी. अंततः बाढ़ थम गयी, और राहत कार्यों की तीव्रता के चलते जनजीवन आशा से कहीं शीघ्र सामान्य होने लगा. सारा महकमा अचंभित था.
लेकिन अविनाश को पता था कि ये मंजिल नहीं है. शीघ्र ही राज्य के प्रमुख अभियंताओं की सहायता से उसने भविष्य में बाढ़ के प्रभावी प्रबंधन का प्रारूप तैयार कर, अधीनस्थों की बैठक में उसे पारित भी करा लिया. स्वीकृति तथा लागत की व्यवस्था के लिए प्रारूप को विभाग के मंत्री के पास भेज दिया गया.
प्रारूप ऐसा था कि वास्तव में यदि उस पर अमल किया जाए और निर्धारित गति से कार्य हो, तो पूरे प्रखंड को अगले चार माह के भीतर ही बाढ़ की आशंका से मुक्त किया जा सकता था.
मंत्री जी प्रभावित हुए. पूरी व्यवस्था में कहीं भी धन के दुरूपयोग की आशंका नहीं रख छोड़ी थी अविनाश ने.
मंत्री जी ने आनन-फानन में अविनाश को सम्मानित करने के लिए संवाददाता सम्मलेन बुला लिया. अविनाश को पदक और पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सम्मलेन के तुंरत बाद मंत्री जी ने अविनाश को अपने कार्यालय में बुलाया.
"आइये! अविनाश बाबु. भई आपने तो कमाल कर दिया! जो बाकि लोग पीढियों से सोचते आ रहे थे, आप तो महीनों में ही पूरा कर देंगे."मंत्री जी ने कहा.
"जी धन्यवाद. ये सब तो आपकी कृपा और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है." अविनाश ने नम्रता से आभार व्यक्त करते हुए कहा.
"अजी काहे का आशीर्वाद.....! अच्छा ये बताइए उमर कितनी है आपकी?"
"जी!?...जी वो...४२ साल."
"क्या लगता है, कितना उमर बाकी है अभी?"
"जी, मैं समझा नहीं!!."
"अरे! मतलब अभी ३०-४० साल तो और जियोगे ही.?"
"जी!!!"
"तो फिर काहे बद्दुआ ले रहे हैं लोगन की?"
"जी..!"
"अरे, बच्चा लोग बता रहे हैं, कि बड़ी ईमानदारी से खर्चा किया आपने!! पिछली साल बाढ़ का बोनस से बच्चा लोग गोवा में फ्लैट खरीद लिए थे, कौनो-कौनो तो अमेरिका में खरीद लिए थे..और ई बार...ससुरा आपने बोनस फिफ्टी परसेंट पर पहुंचा दिया...."
"जी.."
"का जी-जी?? ऊपर से ई माडल, बाढ़-रोको माडल.....यानि अगली साल से बाढ़ बोनस ख़त्म...! अब बाढ़ आएगी नहीं, तो लोगों को राहत कैसे देंगे? और बच्चा लोग जनसेवा का पुन्य कैसे कमाएंगे...?
और फिर इन लोगन को बोनस नहीं मिलेगा, तो इनके बीवी-बच्चों का क्या होगा?? बाढ़ नहीं आई तो इनके घर में सूखा मेवा कहाँ से आएगा???
कुछ समझे आप??"
"जी....."
"फिर से जी?? अभी बहुत उमर बचा है, कुछ कमा लीजिये. हम मैडल दे दिए हैं ना आपको....अब अपना ई बाढ़-रोको माडल भूल जाइए.."
"जी...ठीक है....चलता हूँ ....."
"आरे चाय तो पीते जाइए..."
"जी धन्यवाद.."
अगली सुबह अख़बार में अख़बार में छपा था:-" बाँध टूट गया- अविनाश बाबू का हृदयाघात से निधन."

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समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार से, उनकी पार्टी का समर्थन वापसी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. संप्रग सरकार के पिछले कार्यकाल में संकट के समय उनकी पार्टी ने समर्थन देकर बहुत भारी भूल की थी. अमर सिंह ने एक टी.वी. चैनल के साथ बातचीत में कहा:-"कांग्रेस ने बड़ी चतुराई से अपना काम निकाल लिया. हमारी पार्टी को मूर्खता की सजा मिली है. जिस संप्रग सरकार को सपा ने बचाया, आज उसी के नेतृत्व-कर्ता कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया जी के पास सपा नेताओं से मिलने का समय नहीं है." उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में लालू चार सीटों पर सिमट कर रह गए, और रामविलास पूरी तरह से साफ हो गए.
ये जो कुछ भी है, वह सपा के दिल का दर्द है. और उसके अपने किये का परिणाम है. आखिर आज आप इतने दयनीय कैसे हो गए? क्या आपका और आपकी पार्टी का कद इतना छोटा हो गया कि आपको कोई महत्त्व ही नहीं दे रहा? आखिर क्यों मायावती के गैर जिम्मेदाराना शासन के बावजूद जनता ने सपा को मौका नहीं दिया?
पार्टी को समीक्षा की जरूरत है. आज सपा की ये हालत नहीं है कि वो मोलभाव करे. माननीय अमर जी सारी ताकत जनता की है, आमलोगों की है. वही आम लोग जिन्हें आप चूस कर फेंकते रहे अपनी सरकार के ज़माने में. काश आपने उस वक़्त कोई जमीनी और बुनियादी कदम उठाया होता, आम जनता के हित में, तो यह दुर्दिन न देखने पड़ते.
जे.पी. और लोहिया की विरासत के साथ जो खिलवाड़ आपने और लालू, पासवान ने किया है...जनता उसके लिए आपको माफ़ करे भी तो कैसे?
जल्दी ही आप सब भी कुकुरमुत्तों की तरह उग रही पार्टीयों की जमात में विलुप्त होते दिखाई देंगे..
वक़्त है, जनता को समझिये..क्योंकि जनता आपको समझ चुकी है. समाजवादी चरित्र को अपना मुख बनाइये, मुखौटा नहीं.....

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भारत जब तन ढंकने के लिए लंगोटी की मांग करता है, तब सरकार उसे टोपी भेंट करती है. बेबस, बीमार और बेकारों को सुरक्षित भविष्य देने के बजाय हम मंदिर-मस्जिद बनवाते रहे. कुतुब-मीनार और चार-मीनार खडा करते रहे. एक तरफ भुखमरी थी तो दूसरी और मीना-बाजार सजता था.
आज भी हम सामंतवादी चरित्र से मुक्त नहीं हुए हैं. उत्तर-प्रदेश इसका ताज़ा उदहारण है. बिहार की बर्बादी को हम देख चुके हैं. किस प्रकार पिछडों के मसीहा ने बिहार को पिछडा सूबा बना दिया.
जिसके प्रान्त के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हों, रोजी-रोजगार की संभावना शून्य हो रही हो, नौकरी पाने के लिए युवाओं को जान गंवाना पद रहा हो, वहां सैकडों करोड़ रूपया हाथी बनाने, पार्क सजाने और मूर्ती बनाने पर खर्च हो, वह बेहद अफसोसजनक और शर्मनाक है.
मायावती को पांच सौ करोड़ रुपये मूर्ती के लिए और ढाई सौ करोड़ रुपये सूखे से निबटने के लिए चाहिए. वाह रे माया का बजट?
उत्तर प्रदेश में पड़ा अकाल,
मायावती हो गयी माला माल .
इको पार्क के लिए १९९ करोड़, रमाबाई अम्बेडकर पार्क के लिए ५६ करोड़, कांशीराम स्मृति उपवन के लिए ५७ करोड़, कांशीराम स्मारक स्थल से जुड़ने वाली सड़क के लिए १९ करोड़...इसी प्रकार की "मूर्ति-पार्क" योजनायें मायावती की चल रही हैं..
दलित की बेटी का मुख्यमंत्री बनना एक गौरव की बात है. लेकिन दलित के नाम पर सूबे को लूटने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती. उत्तर प्रदेश के मन-मंदिर में माया की मूर्ति खंडित हो चुकी है, अश्रद्धा और घृणा बढती ही जा रही है मायावती के प्रति.
अम्बेडकर और कांशीराम को अपनी मूर्ति बनवाने की जरुरत नहीं पड़ी. वे दलित और वंचितों के ह्रदय में विराजमान हैं, पर माया अपनी मूर्तियाँ थोप रही हैं. माया जबरन सम्मान लूटना चाहती हैं.
गरीब की गोद में पल-बढ़कर अमीरी की गोद में जा बैठने में माया की बहादुरी नहीं है. गरीबी में पलकर अगर गरीबी मिटा देती तो शायद उसका व्यक्तित्व बड़प्पन के करीब होता.
दलित, माया के भरोसे अब नहीं हैं. माया अवश्य ही दलितों के भरोसे हैं. वक़्त बदल रहा है. दलितों के पास जुबान है, संघर्ष की शक्ति है......कम से कम किसी ब्राह्मणवाद की चपेट में तो दलित नहीं आएगा. ब्राह्मणवाद से खतरा अब कम है. सबसे ज्यादा खतरा तो मायावती के नव-ब्राह्मणवाद से है. दलित की दयनीयता के लिए माया ही जिम्मेदार होगी. किसी सतीश मिश्र पर दोष नहीं आएगा.
मैं मानने लगा हूँ कि सतीश मिश्र, मायावती से ज्यादा बुद्धिमान हैं. माया को मारकर, ब्राह्मणवाद क्यों किसी अपराधबोध में फंसे? मायावती अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार हो रही हैं.
मायावती के हाथी को अब चारा नहीं मिलेगा. शायद हाथी के पेट से माया का पेट बड़ा है, जो कभी भरता ही नहीं.
माया को जो मन्त्र दिया गया उससे माया स्वयं के लिए भष्मासुर बन गयी हैं. निस्सहाय और निस्तेज विपक्ष को माया ने जीवंत बना दिया.
यथास्थितिवादी शक्तियों ने बिहार के ताकतवर नेता लालू को भी जोकर बनाया, उनकी विकृति को सहलाया, और अब अंत कितना दर्दनाक हुआ लालू का, देश देख रहा है?! लालू के भीतर की आंचलिकता, भदेसपन, सादगी और सहजता राजनीति के लिए मानक बन सकती थी; पर ब्राह्मणवाद इतनी जल्दी लालू को इतिहास-पुरुष कैसे बनने देता?
अब तो कहा जायेगा कि सत्ता संभालने का स्वाभाविक गुण ही दलित-पिछडों के पास नहीं होता. मौका मिलते ही ये भ्रष्ट हो जाते हैं. बंगारू लक्ष्मण को भी भाजपा ने अध्यक्ष बनाया था, पर लाख रूपये के चक्कर में बंगारू बर्बाद हो गए. घोषित कर दिया गया कि दलित अध्यक्ष पद के योग्य होते ही नहीं.....बस, भाजपा से दलित का पत्ता साफ़.......!
माया की सत्ता भी जल्द ही ब्रह्मलीन होगी. माया का भ्रष्ट व्यक्तित्व ही दलित आन्दोलन का 'मानक' होगा. दलित राजनीति पुनः हासिये पर होगी., जिसकी जिम्मेवारी दलित मुख्यमंत्री मायावती की ही होगी. लालू, रामविलास, मुलायम आदि किनारे हो चुके हैं.
बस बारी मायावती की ही है, देखते रहिये.....

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जॉर्ज बुझे हुए कारतूस हैं....

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 8/06/2009 05:18:00 pm 0 comments


बूढे, कूड़े नहीं होते, वे विरासत होते है. विरासत को सजोना-संवारना जरूरी होता है। नीतीश ने, जॉर्ज जैसे बूढे समाजवादी को सांसद बना कर जो सम्मान दिया, उसका अपना एक राजनीतिक निहितार्थ है। जार्ज फर्नाडीज लगातार नीतीश के खिलाफ आग उगलते रहे। सम्बन्ध में इतना खटास आ गया कि नीतीश ने जार्ज को अध्यक्ष तक नहीं बनने दिया . नीतीश ने सफाई देते हुए कहा था कि जार्ज बूढे हो चुके है , स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया गया . सवाल उठता है कि अगर पार्टी काम के लिए जार्ज अयोग्य हैं, तो देश के कार्य के लिए कैसे योग्य हो गए ? नीतीश के लिए दल का हित समझ में आता है, देश का हित समझ में नहीं आता. जार्ज को सम्मानित करने का केवल यही तरीका है कि उन्हें सांसद बना दिया जाय? अगर जॉर्ज को संसद ही भेजना था, तो मुजफ्फरपुर में ही क्यों हरा दिया गया?स्थिति साफ़ है कि नीतीश बिना किसी राजनीतिक मकसद का कोई काम नहीं करते ।

बिहार का आगामी चुनाव नीतीश के लिए चुनौती भरा है. अपने ही सीनियर नेता दिग्विजय सिंह को नीतीश बर्दास्त नहीं कर सके . टिकट तक नहीं दिया . दिग्विजय सिंह अपने क्षेत्र में विकासपुरुष के रूप में चर्चित है . उनके टिकट को काट कर दामोदर महतो को उनके खिलाफ उतारना किसी राजनीतिक चरित्र का मानदंड नहीं. दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत कर अपनी लोकप्रियता का डंका बजाया. दिग्विजय, लालू , रामविलाश और वामपंथ की लामबंदी नीतीश के लिए भारी पड़ सकती है. जार्ज, विरोध का केंद्र बन सकते थे। देह ही न उनकी कमजोर हुई है, पर नाम तो आज भी उतना ही वजनदार है. जॉर्ज को खेमे से बाहर निकालना जरूरी था. सांप्रदायिक शक्तियों के साथ गठजोड़, नीतीश की समाजवादी छवि को कमजोर करता है । जॉर्ज को सांसद बनाना,समाजवादी धारा में अपने को बनाये रखने का राजनीतिक उपक्रम भर है . नीतीश ने समाजवाद का सम्मान किया है, जॉर्ज का नहीं, ऐसा कह कर अपने फैसले को सैद्धांतिक आधार प्रदान करेंगे. बांका उपचुनाव के दौरान जॉर्ज के साथ कुछ समय मैंने भी बिताया. उनके भाषण का मैं भी दीवाना बना रहा.क्या डाटा होता था उनके भाषणों में. व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की आग को लहकते देखता था. जॉर्ज युवाओं के माडल की तरह थे. जब से भाजपा के हनुमान बने, मुझ जैसों के लिए जॉर्ज उसी दिन मर गए थे. राजग का एक से एक देश को बेचने वाला फैसला आया, पर यह समाजवादी खामोश बना रहा. गुजरात का दंगा हुआ चुप रहा. बाबरी मस्जिद गिराने वाले के पक्ष में बोलते रहे. जॉर्ज का मतलब संसद में होने या ना होने से नहीं था. जॉर्ज का मायने जंग था व्यवस्था के खिलाफ, नाइंसाफी के खिलाफ.......जॉर्ज यानि मजदूरों का मसीहा ...जॉर्ज यानि बरौदा डायनामाईट कांड..... जॉर्ज यानि कट्टर समाजवादी. अंतिम, जॉर्ज का अफसोसजनक है. सत्ता के खिलाफ जेहाद करने वाले जॉर्ज हार गए. सत्ता और संसाधन के सामने जॉर्ज नतमस्तक हो गए. पूंजीवाद के अंत का एक सुखद सपना टूटकर बिखर गया। पूंजी जीवन के केंद्र में आ गयी. समाजवादी लक्ष्य गायब हो गए. समाजवाद बबुआ धीरे -धीरे आयी,पर कब तक आयी?यह धीरे -धीरे कब पूरा होई? जॉर्ज ने धैर्य खो दिया. चीन, पोलैंड,हंगरी जैसे देश पूंजी की शरण में पहले ही आ गए. विश्वव्यापार संघ का लगातार विरोध हुआ. पर दीर्घकाल तक पूँजीवाद के खिलाफ ये राष्ट्र नहीं लड़ सके और अंत में बाजार के सामने समर्पण किया. साम्यवादी और समाजवादियों की चीन ने बोलती बंद कर दी. आखिर किस मुह से ये पूंजीवाद का विरोध करते? जॉर्ज समय को पहचान लिए. वक्त रहते वे समाजवादी धारा से पलायन कर गए. बाजार ने समाजवादी मूल्यों की धज्जी उडा दिया. समाजवादियों के बीच एका नहीं रह पाई. "दिल के टुकड़े हजार हुए, कुछ यहाँ गिरे, कुछ वहां गिरे." समाजवादी छिन्न-भिन्न हो गए. एक समाजवादी, देश को नाच सिखा रहे हैं, दुसरे समाजवादी, देश को हँसाने में लगे है; और जो शेष है, उन्हें पार्टी बदलने से फुर्सत ही कहाँ है? समाजवादियों के नाजायज वारिसों को सत्ता चाहिए. समाजवाद से इनका लेना देना ही क्या है? मृत समाजवादी धारा को जीवंत किया जा सकता है. यह भूमिका नीतीश निभा सकते है. केवल जॉर्ज को सांसद बना देने भर से काम नहीं चलेगा. इस बुझे हुए कारतूस से समाजवादी जंग नहीं लड़ा जा सकता.ये केवल खबर है, इन ख़बरों का क्या? जॉर्ज के बजाय किसी अन्य नेता को सदन भेजते तो दल और देश दोनों का भला होता. काम करने वाले नेता का मनोवल भी बढ़ता. यह केवल नीतीश का काकावाद है. काका सहलाने का कौशल आखिर नीतीश ने सीख ही लिया. चर्चिल के साथ जो हुआ, वही जॉर्ज के साथ होना चाहिए. थे तब तीसमार खान, अब आपकी क्या जरूरत है? जार्ज को अवसरवाद के लिए ही याद किया जाएगा. लोहिया और कर्पूरी ने तो कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया।
नीतीश, नेता के बजाय नीतियों को आगे बढायें तो अच्छा है....
-जॉर्ज बुझे हुए कारतूस हैं....

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कूटनीतिक पहल का अपना चरित्र होता है. उसकी एक सीमा भी होती है. पाकिस्तान को स्वाभाविक मित्र मान लेना एक बड़ी राजनितिक भूल है. पाकिस्तान का जन्म ही अस्वाभाविक रूप से हुआ है. इस कारण पाकिस्तान के साथ आपसी सम्बन्ध को लेकर आत्मविश्वासी हो जाना, भारत की एकता और अखंडता के लिए आत्मघाती कदम होगा. भारत, इतिहास की शोकांतिका को भूलना चाहता है। पाकिस्तान द्वारा दिए गए जख्मो को हरा बनाना ठीक नहीं है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भावुकता में साझा बयान दिया। निश्चित रूप से वह बयान देश को कमजोर करने वाला है. पाकिस्तान की बातो पर जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए. दोमुहे सांप की तरह वह कब किस मुंह से डस लेगा कहना कठिन है. साझा बयान के बाद मुंबई हमले के मास्टर माइंद हाफिज सईद को पाकिस्तानी अदालत ने क्लीनचिट दे दिया. अब वह उन्ही हरकतों को अंजाम देगा जिससे भारत लगातार परेशान रहा है. भारत के विपक्षी दल और संप्रंग के भी घटक दल मनमोहन की इस नासमझी भरे कदम के खिलाफ हो गए है. भाजपा पहले ही तेवर दिखा चुकी है. अब सरकार के घटक दल राजद और समाजवादी पार्टी ने भी कड़ा विरोध जताया है।

भाजपा के यशवंत सिन्हा ने सदन में कहा कि पाकिस्तान का इरादा पाक नहीं है. पाक को बहाना चाहिए. किसी न किसी बहाने को आधार बनाकर आतंकवादी को छोड़ता रहता है. सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह ने कहा कि सदन में प्रधानमंत्री के बयान का पर्दाफाश हो गया है. शिवसेना के अनंत गीते का विरोध जबरदस्त था. आडवाणी ने कहा कि प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के बयान में विरोधाभास है, प्रधानमंत्री कुछ बोल रहे है और विदेश मंत्री कुछ. खुद कांग्रेस भी मनमोहन सिंह को लेकर पशोपेश में है. सरकार पार्टी की नहीं, देश की है. दल से बड़ा देश है. देश के हित में किये गए फैसले का स्वागत होना चाहिए. राष्ट्रविरोधी कार्य की मुखालफत होना जरुरी है, जो आज सदन और सदन के बाहर हो रहा है. मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान को लेकर देश एकजुट हो गया था; जिसे मनमोहन के साझा बयान ने छिन्न-भिन्न कर दिया. लाज बचाने के बजाय सरकार को अपनी भूल स्वीकार करनी चाहिए.
पाकिस्तान पहली दफा लड़ा तो हार गया. दूसरी बार टूट गया, अगर इस बार युद्ध हुआ तो पाकिस्तान नाम का देश नहीं बचेगा, विश्व के मानचित्र पर. देश की भूखी जनता की कीमत पर कुल बजट का साठ प्रतिशत रक्षा पर खर्च करते है. क्या इस प्रकार की लापरवाही देश और देश की जनता के खिलाफ नहीं है? कारगिल युद्ध, कश्मीर में लगातार घुसपैठ, मुंबई में आतंकी हमला, फिर भी सबूत चाहिए? यह निहायत एक थेथरई है। सईद को क्लीन चिट देकर पाकिस्तान ने भारत को अपना औकात बता दिया है. युद्ध समाधान नहीं है, लेकिन अब तो निन्यानवे गाली पूरी हो चुकी है। अब युद्ध से पलायन एक कायरता होगी. हे मनमोहन! अब तो सुदर्शन-चक्र चलाने की तैयारी करो.

मादरे-वतन की रक्षा के लिए पूरा मुल्क मुस्तैद है. मुस्लिम जमात भी इस ज़ंग में ताकत लगाने के लिए बेचैन है. संवाद चलाएँ, सम्बन्ध बनाए, कोई दिक्कत नहीं है, पर जब पाकिस्तान के मुंह में राम हो और आचरण में भी राम हो।

भारत के खिलाफ आतंकवादी को प्रश्रय भी देंगे और दोस्ती की भी बात करेंगे; यह नहीं चलेगा। भारत को पाकिस्तान के इस दोगले चरित्र के खिलाफ विश्व-मंच पर प्रभावी हस्तक्षेप करना चाहिए. ढुलमुल रवैये से पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियाँ रुकने वाली नही है. आइये! देश साथ है. फिर पाक को मुकम्मल सबक दिया जाए।


-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.


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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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