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लोक सभा का चुनाव समाप्त हुआ । बिहार का भविष्य इस चुनाव से जुडा था। लालू भी हारे और नीतीश भी । दोनों नेता का केन्द्र में हस्तक्षेप नही है । नीतीश प्रधानमंत्री के पाइपलाइन से बाहर ही नही निकल पाये और इधर लालू कांग्रेस में बेगाने हो गए । इन्हे कोई घास ही नही डाल रहा है । बिहार की बात करने वाला कोई अब है नही । रामविलास खोई राजनितिक जमीन तैयार करने में ही लगे है । मीरा कुमार की अपनी एक सीमा है ।
रेल बजट पास हुआ । आम बजट भी पास हुआ। दोनों बजट में बिहार की घोर उपेक्षा हुई । बिहार केन्द्र के व्यव्हार से दुखी है । पिछले साल की बाढ़ की तबाही जगजाहिर है । आज तक केन्द्र ने पैकेज नही दिया, जो दिया वह वापस मांगने के लिए बेचैन है ।
इस नाइंसाफी के खिलाफ एकजूट होने के बजाय नेता एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे है । नीतीश, ममता बनर्जी के सुर में सुर मिलाकर बिहार का क्या भला करेंगे? नीतीश ,लालू और रामविलास तीनो ही रेलमंत्री रह चुके है । सबों का काम जनता के सामने है ,व्हाइट पेपर निकाल कर ही बिहार को क्या मिल जाने वाला है ।
इस बकबास के बजाय बिहार के व्यापक भविष्य के साझा संघर्ष का कार्यक्रम बनाना चाहिए । सूबा प्यारा है कि सत्ता प्यारी है? इस स्थिति में इन नेताओं का चरित्र उजागर हो जाएगा । नीतीश को इस दिशा में पहल करनी चाहिए । सी.एम्. के नाते उनका यह दायित्व भी बनता है । नीतीश लालू को ही जवाब देने के लिए पैदा नही हुए है , उन्हें तो बिहार की जनता को जवाब देना है । लालू को भी कांग्रेस की गुलामी करने के बजाय अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। वरना वक्त इनको हासिये पर कर देगा। "रहा न कुल कोई रोवन हारा", सभी लोग इनका साथ छोड़ ही रहे हैं कल कोई भी साथ नही होगा । बस पति पत्नी मिल कर पार्टी चलाते रहेंगे ।

बिहार विद्रोही चेतना का सूबा है । बहुत बर्दास्त करने की स्थिति में बिहार नही है । समय रहते नेता सावधान हो जाएँ ।

--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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