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सेज पर स्वामीनाथन का साज़..

Posted by VIJAYENDRA On 7/25/2009 08:48:00 PM


सेज पर किसानो की मौतें करवट बदल रही है. यह किसानो के लिए कोढ़ में खाज की तरह है. पहले से बदहाल किसान पर सेज की एक और मार? खेती तो इनकी बर्बाद थी ही अब खेत भी इनके हाथ से बाहर जाते दिख रही है.
मरता क्या ना करता! छित-पुट ही बवाल हुए पर किसानों के विद्रोह की स्थिति भयावह रही. संगीन पर माथा रखने के लिए तैयार यह किसान सिंगुर और नंदीग्राम के संघर्ष को नया अंजाम दिया, और टाटा को बोरिया बिस्तर समेटना भी पड़ा.
आज पुनः सरकार भूमि अधिग्रहण के लिए नया कानून लाने जा रही है. ममता अपनी ही सरकार के खिलाफ हो गई है. इसके विरोध में स्वयं संसद से बाहर रही और अपने सांसदों को भी नहीं जाने दी. आखिर ममता जिस सेज पर चढ़कर सांसदों की संख्या में इजाफा की. फिर उसके पक्ष में कैसे जायेगी?
मंहगाई चरम पर है. थाली से सब्जी और दाल गायब है. शरद पवार कह रहे हैं कि तेरह महीने तक पेट भरने के लिए अनाज है अभी भारत के पास. कृषिमंत्री का यह बयान बकवास है. वे तो क्रिकेट मंत्री हैं, कृषिमंत्री नहीं.इनके बयान पर किसान का विश्वास नहीं रहा.
इस आपाधापी के बीच आज स्वामीनाथन ने अपनी चुप्पी तोडी और उन्होंने कहा कि स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन(सेज) नहीं, स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन (साज़) बनाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सेज से देश बनेगा नहीं बर्बाद हो जायेगा आदि- आदि ......
खास यह है कि स्वामीनाथन हरित क्रांति के दुष्परिणामों को स्वीकारने लगे हैं. सत्य तो यही है कि अधिक उपज के नाम पर खेत बंजर हो गयी और खेती बाज़ार के हवाले हो गयी. बाज़ार आधारित खेती ने किसान को बेहाल किया. उत्पादन, भण्डारण और विपणन पर बाज़ार का आधिपत्य हो गया.
स्वामीनाथन पुनः उसी परंपरागत खेती की बात कर रहे हैं. उत्पादकता और उत्पाद पर भी उन्होंने सवाल उठाया है. वे कहते हैं कि उत्पादकता भी घटी है और उत्पाद की गुणवत्ता भी. आज स्वामीनाथन को ऑर्गनिक खेती की बातें सूझ रही हैं. ये बातें उनकी प्राथमिकता में पहले क्यों नहीं थी?
स्वामीनाथन जी इस बकवासवाद से स्वयं को मुक्त कीजिये और सरकार को आगाह कीजिये कि वह विकास की अवधारणा पर विमर्श करें. अंधी नकलबाजी का परिणाम सामने है कि साठ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. आधी आबादी को आधा पेट भोजन भी नसीब नहीं है. कारोनों लोग ऐसे हैं जिन्हें एक शाम के भोजन के बाद दूसरे शाम के भोजन की निश्चितता ही नहीं है.
भई! पॅकेज की पैंतरेबाजी से भारत की खेती तो बचेगी नहीं. लगातार घाटे के बाद किसान कब तक अपनी जमीन को बहुराष्ट्रीय गिद्धों से बचाए रख सकेगा?
सेज नहीं तो स्वामीनाथन का साज़ कैसा होगा, देश को बताएं तो?! अब किसी भी प्रकार कि सियासती लापरवाही देश के भविष्य को लील जायेगी. वक़्त है इस सवाल को मुखरित करने का? जागो, फिर एक बार और बुलंद हो नारा--
कृषि बचाओ, देश बचाओ..

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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