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यूँ ही नहीं भड़का था १८५७ का ग़दर!!!

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/30/2009 07:15:00 PM


"भारत में अनेक साम्राज्य बने बिगडे. अनेक सल्तनतें खड़ी हुईं और गर्क भी हुईं. तत्कालीन इतिहास लेखकों ने अपने-अपने बादशाहों या राजाओं का बढा-चढा कर वर्णन किया. बहुत सी ऐतिहासिक सामग्री समय के साथ नष्ट हो गयी. इस कारन हमारे देश का इतिहास परस्पर विरोधी विवरणों से इतना भर गया कि सत्य क्या है, इसका पता लगाना बहुत कठिन हो गया,..."
गो कि भारत में जंगे-आजादी की शुरुआत १८५७ के ग़दर को माना जाता है और बिहार में जिसकी अगुआई का श्रेय बाबु कुंवर सिंह को जाता है, लेकिन हकीकत यह भी है कि १८५७ का ग़दर अचानक नहीं भड़का था, बल्कि सौ सालों से हर दिल में सुलग रही चिंगारी ने उसे एक धधकती ज्वाला का स्वरुप प्रदान किया. तथ्य बताते हैं कि १७६३ से १८५६ के बीच देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ चालीस बड़े विद्रोह हो चुके थे. सच तो यह है कि जिस दिन से अंग्रेजों ने हिंदुस्तान में हुकूमत संभाली. लोगों के अन्दर विद्रोह की चिंगारी सुलगने लगी थी, कहना गलत नहीं होगा कि ब्रितानी हुकूमत के प्रचार-प्रसार ने समाज के तकरीबन हर तबके को आक्रोशित ही किया. सत्ता छिन जाने से अगर राजा और नवाब नाराज हुए तो यही नाराजगी भूस्वामियों के अन्दर जमीन छिन जाने से उत्पन्न हुई. उसी प्रकार पारम्परिक दस्तकारी पर आघात से अगर दस्तकार नाराज हुए, तो कमरतोड़ लगान के बोझ से किसानों की नाराजगी भी परवान चढी, जिसका मिला-जुला असर यह हुआ कि अंग्रेजों के खिलाफ अन्दर ही अन्दर एक ज्वालामुखी धधकने लगा.
इतिहास साक्षी है कि उस समय तक इस देश के आदिवासी खुद को समाज से अलग-थलग मानते थे. तथ्यों से यह भी जाहिर है कि अंग्रेजों ने न केवल उनका आर्थिक शोषण किया, बल्कि उनकी आदिम सभ्यता और संस्कृति पर कुठाराघात भी किया. सात समंदर पार से आये उन गोरे शासकों की काली करतूतों के खिलाफ आदिवासी समाज में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई, जिसके नतीजे में वे बगावत पर उतर आये. यह बात दीगर है कि बिलकुल स्थानीय परिस्थितियों की कोख से जन्मे वे आन्दोलन हथियारबंद अंग्रेजों के सामने टिक नहीं पाए हों, लेकिन उनकी छापामार लड़ाईयां लगातार पराजय के बावजूद जारी रही. सच यह भी है कि बार-बार पराजय का दंश झेलने के क्रम में जब-तब वे संगठित भी हुए और अत्यंत जुझारू संघर्ष भी किया. जवाबी करवाई के रूप में अंग्रेजों ने उनका दमन करने में क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ दीं, और उन पर पाशविक अत्याचार भी किये. कहना गलत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार और अत्याचार के हथियारों से लैस औपनिवेशिक शासन ने जब आदिवासियों के इलाके में घुसपैठ की तो इसकी तीखी प्रतिक्रिया देखने में आई और वे आक्रोश से भर उठे, जिसकी परिणति आन्दोलनों की शक्ल में हुई.
आमतौर पर आदिवासी शेष समाज से स्वयं को अलग-थलग रखते थे, लेकिन ब्रिटिश राज ने उन्हें औपनिवेशिक घेरे के अन्दर खींच लिया. 'फूट डालो, राज करो' की नीति पर अमल करते हुए हुकूमत ने आदिवासी कबीलों के सरदारों को जमीदारों का दर्जा दिया और लगान की नयी प्रणाली लागू की.जो तात्कालिक लाभ के लोभ में फंस गए, वे हुकूमत के प्रिय पात्र बन गए, लेकिन जिन्होंने रोटी के उस टुकड़े को नकार दिया, उन पर कहर बरपा हुआ. यही नहीं, हुकूमत की दलाली करने वाले अपने ही समुदाय के लोगों के खिलाफ भी समाज में जबरदस्त हलचल हुई..
इसकी वजह यह थी कि हुकूमत की नीतियाँ ये ही दलाल आदिवासी समाज में लागू करते-करवाते थे. मसलन, आदिवासियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं पर जो नए प्रकार के कर लगाये गए, उसकी वसूली ये कथित जमींदार ही करते थे. इसके साथ ही उनके बीच महाजनों, व्यापारियों और लगान वसूलने वाले ऐसे वर्ग को भी उन पर लादा गया, जो बिचौलिए का काम करते थे. वे बाहरी बिचौलिए धीरे-धीरे आदिवासियों की जमीन पर कब्जा जमाते चले गए और सीधे-सादे आदिवासियों को कर्ज के जटिल जाल में उलझा-फंसा दिया. अंग्रेजों द्वारा बोया गया वह बीज आज भी आदिवासी समाज खासकर पहाडों पर आबाद पहाडिया गांवों में फलते फूलते देखी जा सकती है.
प्रसिद्द इतिहासकार विपिन चन्द्र के मुताबिक औपनिवेशिक घुसपैठ और व्यापारियों, महाजनों व लगान वसूलने वालों के तिहरे शासन ने सम्पूर्ण आदिवासी समाज की लय और ताल ही तोड़कर रख दी.
नतीजा यह हुआ कि आम आदिवासी के साथ-साथ उनके सरदार और मुखिया भी विदेशियों को खदेड़ भागने के लिए एकजुट हो गए.
१८५४ के आते-आते बहरहाल, संताल भी कसमसाने लगे. ३० जून, १८५५ को भागनाडीह में चार सौ संताल आदिवासी गाँवों के करीब ६ हजार प्रतिनिधि इकठ्ठा हुए, सभा में एक स्वर में विदेशी राज का खत्म कर न्याय-धर्म का अपना राज स्थापित करने के लिए खुले विद्रोह का फैसला लिया गया.
अलग बात है कि बिहार में १८५५ का संताल-हूल इतिहास में प्रसिद्द हो गया और विद्रोह का लम्बा सिलसिला जारी रखने के बावजूद पहाडिया आन्दोलन चीखती सुर्खियों में दर्ज नहीं हो पाया.
वीरता और कुर्बानी की उस चीखती मिसाल को सिर्फ कार्ल मार्क्स ने समझा और उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम जनक्रांति कहा, जबकि भारतीय इतिहासकारों ने मूले के सुर में सुर मिलाते हुए उसे 'हुल' कहकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली.


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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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