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अत्यंत सम्माननीय महात्मा जी,
आजकल के नए समाचारों से मालूम होता है कि आपने संधि-चर्चा के बाद से क्रांतिकारियों के नाम कई अपीलें निकाली हैं जिनमे आपने उनसे कम से कम वर्तमान समय के लिए अपने क्रन्तिकारी आन्दोलन रोक देने के लिए कहा है. वास्तविक बात यह है कि किसी आन्दोलन को रोक देने का काम कोई सैद्धांतिक या अपने वश की बात नहीं है. समय-समय की आवश्यकताओं का विचार करके आन्दोलन के नेता अपना और अपनी नीति का परिवर्तन किया करते हैं.
हमारा अनुमान है, कि संधि के वार्तालाप के समय आप एक क्षण के लिए भी यह बात न भूले होंगे, कि यह समझौता कोई अंतिम समझौता नहीं हो सकता. मेरे ख्याल से इतना तो सभी समझदार व्यक्तियों ने समझ लिया होगा, कि आपके सब सुधारों के मान लिए जाने पर भी देश का अंतिम लक्ष्य पूरा न हो जायेगा. कांग्रेस, लाहौर कांग्रेस के प्रश्नानुसार स्वतंत्रता का युद्ध तब तक लगातार जारी रखने के लिए बाध्य है, जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये. बीच-बीच की संधियों और समझौते क्षणिक विराम मात्र है. उपरोक्त सिद्धांत पर ही किसी प्रकार का समझौता या विराम-संधि की कल्पना की जा सकती है.
समझौते के लिए उपयुक्त अवसर का तथा शर्तों का विचार करना नेताओं का काम है. यद्यपि लाहौर के पूर्ण स्वाधीनता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आन्दोलन स्थगित कर दिया है, फिर भी वह प्रस्ताव ज्यों का त्यों बना हुआ है. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के क्रांतिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित करना है. इस ध्येय संशोधन के लिए जरा भी गुंजाईश नहीं है. वे तो अपना संग्राम, जब तक कि ध्येय न प्राप्त हो जाए और आदर्श की पूर्ण स्थापना न हो जाए, तब तक जारी रखने के लिए बाध्य है. परन्तु वे परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ-साथ अपनी युद्ध-नीति भी बदलते रहना जानते हैं. क्रांतिकारियों का युद्ध भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न स्वरुप धारण कर लेता है.
कभी वह प्रकट रूप रखता है, कभी गुप्त धारण कर लेता है., कभी केवल आन्दोलन के रूप में हो जाता है और कभी जीवन और मृत्यु का भयानक संग्राम करने लग जाता जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में क्रांतिकारियों के सामने आन्दोलन रोक देने के लिए कुछ विशेष कारणों का होना तो आवश्यक ही है. परन्तु आपने हम लोगों के सामने ऐसा कोई निश्चित कारन उपस्थित नहीं किया, जिस पर विचार करके हम अपना आन्दोलन रोक दें.
केवल भावुक अपीलें क्रांतिकारियों के संग्राम में कोई प्रभाव नहीं पैदा कर सकतीं. समझौता करके आपने अपना आन्दोलन स्थगित कर दिया है, जिसके फलस्वरूप आपके आन्दोलन के सब बंदी छूट गए हैं. परन्तु क्रन्तिकारी बंदियों के विषय में आप क्या कहते हैं? सन १९१५ के ग़दर पार्टी वाले राजबंदी अब भी जेलों में सड़ रहे हैं., यद्यपि उनकी सजाएं पूरी हो चुकी हैं. लोदियों मार्शल-ला के बंदी अब भी जीवित ही कब्रों में गडे हुए हैं. इसी प्रकार दर्जनों बब्बर अकाली कैदी जेल यातना भोग रहे हैं. देवगढ, काकोरी, मछुआ बाजार और लाहौर षड़यंत्र केस लाहौर, दिल्ली, चटगांव, बम्बई, कलकत्ता आदि स्थानों में चल रहे हैं. दर्जनों क्रांतिकारी फरार हैं. जिनमें बहुत सी तो स्त्रियाँ हैं. आधे दर्जन से अधिक कैदी अपनी फांसियों की बाट जोह रहे हैं. इस सबके विषय में आप क्या कहते हैं? लाहौर षड़यंत्र के केस के तीन राजबंदी, जिन्हें फांसी देने का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश देश में बहुत बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली है, क्रांतिकारी दल के सब कुछ नहीं हैं. दल के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीं है. वास्तव में इनकी सजाओं के बदल देने से देश का उतना कल्याण न होगा, जितना कि इन्हें फांसी पर चढा देने से होगा. परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी आप इनसे अपना आन्दोलन खींच लेने की सार्वजानिक अपीलें कर रहे है. वे अपना आन्दोलन क्यों रोक लें, इसका कोई निश्चित कारन नहीं बतलाया? ऐसी स्थिति में आपकी इन अपीलों के निकालने का मतलब तो यही है कि आप क्रांतिकारियों के आन्दोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हैं. आप इन अपीलों के द्वारा स्वयं क्रांतिकारी दल में विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे हैं. अगर यह बात न होती, तो आपके लिए सबसे अच्छा उपाय यह था कि आप कुछ प्रमुख क्रांतिकारियों से मिलकर इस विषय की सम्पूर्ण बातचीत कर लेते. आपको उन्हें आन्दोलन खींच लेने की सलाह देने से पहले अपने तर्कों को समझाने का प्रयत्न करना चाहिए था. मेरा ख्याल है, कि साधारण जन-समुदाय की तरह आपकी भी यह धरना न होगी कि क्रन्तिकारी तर्कहीन होते है और उन्हें केवल विनाशकारी कार्यों में ही आनंद आता है. हम आपको बतला देना चाहते है कि, यथार्थ में बात इसके बिलकुल विपरीत है. वे प्रत्येक कदम आगे बढ़ने के पहले अपनी चतुर्दिक परिस्थितियों का विचार कर लेते हैं. उन्हें अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान हर समय बना रहता है. वे अपने क्रांतिकारी विधान में रचनात्मक अंश की उपयोगिता को मुख्य स्थान देते हैं, यद्यपि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें केवल विनाशात्मक अंश की ओर ध्यान देना पड़ा है.
गवर्नमेंट क्रांतिकारियों के प्रति पैदा हो गयी सार्वजानिक सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी तरह से उन्हें कुचल डालना चाहती है. अकेले में वे सहज ही कुचल दिए जा सकते हैं. ऐसी हालत में किसी प्रकार की भावुक अपील निकाल कर उनमे विश्वासघात और फ़ुट पैदा करना, बहुत ही अनुचित और क्रांति-विरोधी कार्य होगा. इसके द्वारा गवर्नमेंट को, उन्हें कुचल डालने में प्रत्यक्ष सहायता मिलती है. इसलिए आपसे हमारी प्रार्थना है, कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओं से, जो कि जेलों में हैं, इस विषय में कोई बातचीत करके कुछ निर्णय कर लीजिये या फिर अपनी अपीलें बंद कर दीजिये. कृपा करके उपरोक्त दो मार्गों में से किसी एक का अनुसरण कीजिये. अगर आप उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो कृपा करके उन पर रहम कीजिये. और उन्हें अकेला छोड़ दीजिये. वे अपनी रक्षा अपने आप कर लेंगे. वे अच्छी तरह से जानते हैं, कि भविष्य के राजनितिक युद्ध में उनका नायकत्व निश्चित है. जनसमुदाय उनकी ओर बराबर बढ़ता आ रहा है और वह दिन दूर नहीं है, जबकि उनके नेतृत्व और उनके झंडे के नीचे जनसमुदाय उनके सोशलिस्ट प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखाई पड़ेगा.
या, यदि आप सचमुच उनकी सहायता करना चाहते हैं, तो उनका दृष्टिकोण समझने के लिए उनसे बातचीत कीजिये और सम्पूर्ण समस्या पर विस्तार के साथ विचार कर लीजिये.
आशा है, आप उपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेंगे ओर अपनी राय सर्व-साधारण के सामने प्रकट कर देंगे.

आपका,
'अनेकों में से एक'



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-प्रस्तुति - Swaraj T.V. Desk

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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