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'सच का सामना' धारावाहिक के निर्माता और निर्देशक चर्चा में हैं. इस धारावाहिक को मैंने भी देखा . एक परित्यक्ता से हुए सवाल- जबाब का नमूना देखा, सामने में उसकी माँ और बहन भी बैठी थी. सवाल था- 'पति के बिना सेक्स का आनंद किस तरह उठाती हैं आप?' आदि...
फिर दूसरे दिन 'सच का सामना' देख रहा था जिसमें एक अधेड़ कुर्सी पर विराजमान हैं. उनसे सवाल था कि क्या अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के साथ सहवास किया है? वह झेंप जाते हैं , तभी मशीन उनका झूठ पकड़ लेती है. बेटी अपने बाप की स्थिति से हैरान होती है.
यह तो केवल नमूना भर है. इसी प्रकार के वाहियात सवालों का लम्बा सिलसिला टी.वी. पर चल रहा है. निःसंदेह चैनल की टी.आर.पी. तेजी से बढ़ रही है.
इस 'जलालत का सामना' आखिर देश क्यों करना चाह रहा है? शायद हो सकता है कि निर्माता अगली कड़ी में माँ और बाप का ब्लू फिल्म बनाये और बेटी -दामाद को दिखाकर यह पूछे कि दोनों के सेक्स आनंद में क्या अंतर है? दोनों के हनीमून का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए देश को मजबूर करें.
एकता कपूर के धारावाहिक का यह एक उत्तर-आधुनिक संस्करण है. उनके धारावाहिक में अवैध संबंध और संततियों की ही कहानी थी. आखिर आगे दिखाया भी जाए तो क्या? दर्शक भी मोनोटोनस का शिकार होने लगा था. कुछ नया तो करना था. मीडिया का भूत उतर गया है, भाग्य बेकार हो गया, और भगवान की भरमार है. भूत, भाग्य, भगवान और भांटगिरी के अलावा अब तो यही शेष रह गया था.
सेक्स ही सत्य है और इस सच के सिवा कुछ नहीं. सेक्स से जुड़े सवाल ही देश के प्रतिनिधि सवाल हैं. 'रामराज्य' तो नहीं आ सका है, 'सेक्स-राज्य' अवश्य आ गया है. जिधर देखो उधर सेक्स ही सेक्स है. हम 'सेक्स युग' में प्रवेश कर चुके हैं. मनुष्य की बोटी-बोटी से सेक्स निचोड़ा जा रहा है.
सरकार सेक्सी हो गयी है. सेक्स पर इनकी संवेदनशीलता देखने लायक है. असंख्य बुनियादी मामले कोर्ट में लंबित हैं, उन पर सुनवाई नहीं होती, गरीबों को समय पर न्याय नहीं मिलता; पर सेक्स के मामले में फैसला तुरत-फुरत हो रहा है.
गे, होमो-सेक्सुअलिटी, हेट्रो और ट्रांसजेंडर के मामलों को लेकर उच्च न्यायलय से लेकर उच्चतम न्यायलय तक की तत्परता गजब की है. सरकार भी बैकफुट पर आ गयी. समलैंगिकता सम्मानित हो गयी.
स्त्री-पुरुष को आग और फूस कहा जाता था कि कब चिंगारी भड़क जाए. यौन शुचिता के राख हो जाने का खतरा लगा रहता था. अब दो स्त्रियाँ भी एक जगह होगी तो यौवन में आग लग सकती है. बेलगाम सेक्स की अराजक दुनिया तैयार हो चुकी है.
'सच का सामना' आज देश कर रहा है. सत्य का साक्षात्कार तो हम करते ही थे. रामकृष्ण ने भी विवेकानंद को सत्य का साक्षात्कार कराया, गौतम बुद्ध ने भी सच का सामना किया और निर्वाण को उपलब्ध हुए.
यद्यपि हमारा समाज सेक्स-विरोधी कभी नहीं रहा. उस वक़्त सेक्स के लिए निवेदन अवश्य था परन्तु याचना नहीं थी. हम कुंठित नहीं थे. कोणार्क से लेकर एलोरा के गुफा तक में सेक्स मौजूद है, पर वह कतई अश्लील नहीं है.
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यही तो हमारे पुरुषार्थ के आधार थे. हमने ऋतू-चक्र को भी धर्म से जोड़ा और मासिक-धर्म कहा. काम भी शास्त्र से जुड़ा. वही काम-शास्त्र आज भी मानक है. सेक्स शास्त्र था मगर शस्त्र नहीं. हम काम की प्रकृति को समझते थे और इसकी बुनियादी जरूरत को पूरा करने में उत्साहित भी रहते थे; पर अराजकता हमारा अभीष्ट नहीं था.
'सच का सामना' सीरियल के निर्माता स्वतंत्रता और अराजकता के अंतर को नहीं समझ, बेवकूफी की बात कर रहे हैं. 'प्रगतिशील' होने का कतई अर्थ नहीं कि हम 'पतनशील' हो जाएँ.
सृष्टि की कोई भी रचना प्रकृति-विरोधी नहीं है. पशु-पक्षियों का भी अपना संसार है. समय के पूर्व सेक्स की उनकी कोई चाहत नहीं. नर-मादा भले ही साथ-साथ रहें.
आखिर मनुष्य इतना बेलगाम क्यों? इसीलिए कि उसके पास चेतना है, बुद्धि है. चेतना और बुद्धि का क्या केवल यही उपयोग है कि हम समाज को ही अराजकता में धकेल दें. कॉलेज कैम्पस, गेस्ट हॉउस हर जगह 'कंडोम-काउंटर' खुल रहे हैं. अब तो स्कूल-बैग में टिफिन के साथ कंडोम भी दिया जा रहा है कि कहीं इसकी जरूरत न पड़ जाए.
संस्कृति और परंपरा का मतलब केवल वर्जना नहीं होता. इसमें भी उदात्तता है, वैज्ञानिकता है. अतीत केवल कुंठा नहीं होता, वहां अनुभवों का संचय भी तो होता है.
आओ वीर्यहीन बनें.....!! महिलावादी भले ही पुरुषार्थ शब्द पर उलटी करें, पर यह तो बताओ कि 'स्त्रियार्थ' कैसा हो?
यह सच है कि झूठ और वर्जना की बुनियाद पर कोई संस्कृति दीर्घकाल तक नहीं टिकती. खिड़की और दरवाजा खोलना ही चाहिए. ताज़ा हवा भी आना चाहिए. पर यह 'सच का सामना' बाजारवाद का प्रतिउत्पाद है, लाभ का खेल है.
"यह तो केवल झांकी है, खेल अभी बाकी है.."
बाजारवाद दो पांवों पर खडा है- 'ब्रेड' और 'बेड'. इस कंडोम-कल्चर में 'सर्वायवल ऑफ़ द फिटेस्ट' ही जिन्दा रहेगा, फिर 'सर्वायवल ऑफ़ द विटेस्ट' का क्या होगा?
संस्कृति केवल निर्गुण अवधारणा नहीं है. यह जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है. यह सत्य है कि यह कल्चर हमारे परिवार को छिन्न-भिन्न कर देगा, तब क्या होगा? बूढे और बच्चे, विधवा और परित्यक्ता निःसहाय होंगे. वृद्धावस्था पेंशन देने का औकात तो है नहीं सरकार के पास, फिर कितना वृद्धाश्रम, अनाथालय और नारी-निकेतन बनायेंगे? पैसा कहाँ से आएगा! यह हमारे इकोनोमी को भी प्रभावित करेगा.
देश की तासीर, जन और जलवायु को देखकर भी नक़ल करनी चाहिए. वैसा ही बीज बोयें जैसी जमीन है. देश अभी 'पेज थ्री-कल्चर' में जीने की स्थिति में नहीं है.
'सच का सामना' के निर्माता बंधुओं! आपसे अपील है कि आपको क्लब ओर कंडोम कल्चर में जीना है तो जियें. पर यह देश क्लब और जुआ घर नहीं है.
यह हमारी मातृभूमि है कोई चकलाघर नहीं. आपका यह प्रयास फूहड़ता के अलावा कुछ भी नहीं.

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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