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स्त्री समानता--सच और भ्रम

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/14/2009 12:24:00 PM


विगत कुछ वर्षों से स्त्री समानता पर व्यापक बहस हो रही है, और वहीं ये विरोधी प्रश्न भी जन्म ले रहा है कि स्त्री समानता के प्रचार-प्रसार के बीच से स्त्री स्वच्छंदता पनप रही है, और यह स्वच्छंदता समाज को पतन की और ले जाने वाली है।परन्तु प्रश्न यह है कि हमारे देश में स्त्री समानता की अवधारणा का आधार क्या है? क्या हमारी सभ्यता, संस्कृति या शास्त्र कहीं भी स्त्री समानता का आधार तैयार करते दीखते हैं? कदापि नहीं।वरन इनमें तो सदा से ही स्त्री को सर्वोच्च सत्ता का अधिकारी स्वीकार जाता रहा है। इनमें तो यहाँ तक कहा गया कि "स्त्री होना ही सम्पूर्णता है।" और पूर्ण की समानता मात्र पूर्ण से ही हो सकती है।तब फ़िर आखिर स्त्री समानता जैसी अवधारणा का स्रोत कहाँ है?निःसंदेह कहा जा सकता है कि इसका स्रोत पाश्चात्य संस्कृति है, जहाँ प्रारम्भ से ही स्त्री को भोग की सामग्री समझा गया। स्त्री की पूर्णता को नष्ट करने का प्रयास किया गया। और जब लगातार भोगे जाते रहने से व्यथित होकर उस स्त्री की चेतना ने स्वजागरण का प्रयास प्रारम्भ किया, तब उसकी चेतना जाग्रति को दिशाविहीन करने के उद्देश्य से कुछ तथाकथित स्त्री-हितचिंतकों ने स्त्री-समानता का व्यापक भ्रमजाल तैयार कर दिया।

खेद इस बात का है कि स्वयं स्त्री इस भ्रम में खोकर स्वयं को भूल चुकी है। आज उसे भी सम्पूर्णता नहीं, समानता की इच्छा है। सर्वाधिक चिंताजनक पहलू ये है कि जिस स्त्री की सहनशीलता, सहजता, सौम्यता, शील और स्नेह उसकी पूर्णता के द्योतक थे, आज वही स्त्री इन गुणों को अपनी हीनता मानते हुए, तन,मन,धन से इस अधूरे पुरुष की समानता का प्रयास कर रही है। यह निश्चय ही समाज को पतन की ओर ले जाने वाला होगा।

स्त्री का पुरुष के समान होने का प्रयास पुरुषवाद को बढ़ावा देने जैसा ही है। पुरुषवादी मानसिकता का लक्ष्य ही स्त्री को पुरूष कर देना है। पुरूष उसके स्त्रीत्व की लक्ष्मणरेखा को छू सकने का सहस भी नहीं कर सकता; परन्तु जब स्त्री स्वयं उस लक्ष्मणरेखा को पार करके पुरूष बनने का प्रयास करने लगती है तब वह उस पुरूष के लिए सहज प्राप्य हो जाती है। पहले पुरूष छल से स्त्री को उस रेखा से बाहर लाने का प्रयास करता था, परन्तु अब स्त्री अनजाने ही स्वयं को छलकर, अपने भीतर के स्त्रीत्व को मारकर उस रेखा के बाहर आ रही है।

मामला सिर्फ़ स्त्री के साथ होने वाले बलात्कार का नहीं है, उसे जींस-टॉप पहनाकर पुरूष समाज द्वारा उसके साथ किए जा रहे इस छ्लात्कार का भी है। समानता के इस छद्म अभियान से पुरुषवाद की समाप्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जिसकी नकल की जाती है वह स्वयं मानक बन जाता है।

पुरुषवाद को समाप्त करने के लिए स्त्री का पुरूष होना आवश्यक नहीं है, वरन स्त्री का स्त्री हो जाना ही पुरुषवाद को सच्ची चुनौती है।

-- Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

Reactions: 

8 Response to "स्त्री समानता--सच और भ्रम"

  1. ashi Said,

    i like the article

    liken aap ne kaha hum apni astitvata khote ja rahe hai hala ki hum apne jivan mai jo kuch karte hai khud ko sabit karne ke liye karte hai agar ek admi ghar ka kaam samahalta hai too ushe badhi bat kaha jata hai wahi ek stri ye kaam kare too woo too ush ka kaam hai woo ye aram se kar sakti hai
    apni sampurnta ya samanta sabit karne ke liye hum apne jeevan mai kai katdnaiya sahte hai man dominant jagah par hum apne astitav ko dhundna hi hota hai nai too jo chizze aaj sab ko pata chalti hai wo kahi kisi band kothari mai dham tood deti ar wo stri jise aap sampurn kahte hai wo wahi kho jati

    aaj hum iss bare mai jante hai ar un purushwadi logo ko apni samprnta ka ahsas dila rahe hai

     

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