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क्या होगा-(३)???

Posted by VIJAYENDRA On 7/26/2009 01:01:00 PM



जैसे ही उसे चिंकी की खट्टी-मीठी गोलियों का राज़ और उस तथाकथित पुजारी के सच का पता चला, उसने मन ही मन अपना फैसला कर लिया, और मौका मिलते ही पत्थरों के जरिये अपना न्याय कर दिया. लेकिन अपने न्याय के कारणों को बताने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे, इसीलिए उस रात उसे पिता के दो-चार थप्पडों के साथ ही भूखा ही सोना पड़ा.
ऐसी बहुत सी घटनाएं शशि के साथ अक्सर होती रहती थीं. गलत और अन्यायपूर्ण कृत्य देखना उसे पसंद नहीं था.
और सही?! सही तो शायद कहीं होता ही नहीं! कहानियों में अक्सर सुनती थी कि कहीं स्वर्ग है, जहाँ सब कुछ सही होता है, वहां सिर्फ अच्छे लोग होते हैं....! और अक्सर वो उस स्वर्ग कि कल्पना में खो जाया करती थी.
जब कहीं नारी समता की बातें पढ़ती तो उसे अपना गाँव मानो नरक लगने लगता था. बहुत जिद के बाद उसे शहर में आगे पढ़ने की इजाजत मिल पायी थी. मगर ये क्या!!! यहाँ भी तो उसका गाँव ही दिखाई दे रहा था चारो तरफ...थोडा रंग-बिरंगे शालीन कपडों में. यहाँ भी समता की वो ऊँची-ऊँची बातें सिर्फ बातों में ही थी, व्यवहार में नहीं. बड़ी मुश्किल से सामंजस्य बिठा पा रही थी वो. कभी-कभी सोचती थी कि या तो ये दुनिया गलत है या फिर वो गलत दुनिया में आ गयी है!!
बड़ी दीदी की शादी में उसने विरोध करने की कोशिश की भी, लड़का शराबी था, अनपढ़ और गंवार भी.
"लड़की हो लड़की की तरह जीना सीख लो, उतना ही बोलो जितना पूछा जाये."पिता ने सख्त लहजे में कहा. वो चुप हो गयी.
इस बार छुट्टियों में घर पहुंची तो बड़ी दीदी को आया देखा, रो रहीं थीं, माँ ने समझाते हुए दीदी को कहा था:-"बेटी कुछ भी हो जाए, ससुराल से लड़की की अर्थी ही उठती है. कैसे भी करके वहीँ रह लेना, नहीं रह पाओ तो आग लगा कर जल जाना, मगर मायके की ओर मत देखना." दीदी चली गयी.
मगर वो पूरी रात नहीं सो पायी, उसे लगा कि वो शायद सच में इस दुनिया के लायक नहीं है. फिर वो चिरनिद्रा में सो गयी,. अब वो स्वर्ग में है..जहाँ सब कुछ अच्छा है. वो शायद उसी दुनिया के लिए बनी थी, क्योंकि इस दुनिया में तो हमने उसे कभी चैन से सोने ही नहीं दिया, जब तक वो सो नहीं गयी.
आखिर हम कब जागेंगे? अभी और कितनी 'शशियाँ' चिरनिद्रा में सोने के लिए मजबूर की जाती रहेंगी?

-Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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