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हवाई अड्डा पर कलाम की जाँच की गई. जाँच करना जांचकर्ता का धर्म और कर्तव्य भी है. पर भारत में जांचकर्ता उतने संवेदनशील नहीं हैं कि किसी का कपडा उतरवा लें.
इधर हिलेरी क्लिंटन भारत आयीं; कोंडालीजा राईस का भी भारत आगमन हुआ पर हमारे जांबाज सुरक्षा अधिकारियों ने इनके कपडे नहीं उतरवाए. सुरक्षा की जितनी चिंता अमेरिका को है, उतनी ही चिंता भारत को भी है. अगर कलाम के भीतर कोई आतंकवाद पनप जाए तो अमेरिका की सुरक्षा तो खतरे में पड़ ही सकती है? यह स्थिति तो बुश के साथ भी हो सकती है. भारत के सुरक्षाकर्मी को सतर्क हो जाना चाहिए. अगर कलाम खतरनाक हो सकते हैं, तो मिसेज क्लिंटन भी खतरनाक हो सकती हैं.
मामला दरअसल दूसरा है. गाँव में कहावत है कि गरीब की लुगाई, पूरे गाँव की भौजाई होती है. अमेरिका ने भारत को निःसहाय और निर्धन देश समझ लिया है. और ऐसा हो भी क्यों नहीं? अमेरिका के इशारे पर हम नाचने लगते हैं, उसके स्वागत में बिछ जाने को तत्पर रहते हैं, तो भला वह हमें भाव क्यों दे?
राजग के शासन कल में रक्षामंत्री रहते, जोर्ज फर्नांडिस के कपडे उतरवाए गए. भारत का स्वाभिमान क्षत-विक्षत हो गया. वह शर्मनाक सूचना भारत को आहत कर गयी. वह देश के रक्षामंत्री थे न कि भारत के; परन्तु देश के रहनुमाओं ने आपत्ति तक दर्ज नहीं की.
बुश का भारत आगमन हुआ था. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात होनी थी. उन्होंने प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने के बजाय पीठ थपथपाया मानो उसका कोई जूनियर कर्मचारी हो. इतने बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का यह अपमान भी हम सह गए.
आज हम कलाम के अपमान पर चिंचिया रहे हैं. इन नेताओं के पास निजी शर्म नाम की कोई चीज पहले भी नहीं थी, अब तो राष्ट्रीय शर्म से भी शर्मसार नहीं होते.
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है. केवल भारत को अमेरिका की जरूरत नहीं है, बल्कि भारत के साथ जुड़े रहना अमेरिका की भी मजबूरी है. भारत ने अपना बाजार अगर अमेरिका के लिए बंद कर दिया तो अमेरिका को भारी मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं.
कब लौटेगा राष्ट्र-बोध हमारे आकाओं का?
कब तक बेइज्जत होते रहेंगे? +
अमेरिकी अधिकारियों का यह फूहड़ व्यवहार केवल विभागीय हिस्सा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सोच का हिस्सा है. हम अमेरिका के गुलाम नहीं हैं, न ही उसके भरोसे जिन्दा हैं.
भारतीय नेतृत्व इस मामले को गंभीरता से ले. कठोर आपत्ति दर्ज करे या नहीं तो जैसे को तैसा वाला जवाब देने के लिए तैयार होना चाहिए.
कलाम भारतीय अस्मिता के प्रतीक पुरुष हैं. यह अपमान उनका निजी अपमान नहीं है. इसके खिलाफ में हम आवाम को भी अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए.



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-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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