'रंग दे बसंती चोला' से 'चोली के पीछे क्या है' तक......(1)
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फांसी के कुछ दिन पहले सरदार भगत सिंह और उनके साथियों ने दया प्रार्थना के लिए इनकार करते हुए पंजाब गवर्नर को लिखा था- "अंत में हम केवल यह कहना चाहते हैं कि आपकी अदालत के फैसले के अनुसार हम सम्राट के विरुद्ध युद्ध करने का अभियोग लगाया गया है और इस प्रकार हम युद्ध के शाही कैदी हैं. अतएव हमें फंसी पर न लटका कर गोली से उदय जाना चाहिए. इसका निर्णय अब आपके ही ऊपर है कि जो कुछ अदालत ने निर्णय किया है इसके अनुसार आप कार्य करेंगे या नहीं. हमारी आपसे विनम्र प्रार्थना है और हमें पूर्ण आशा है कि आप कृपा कर फौजी महकमे को आज्ञा देकर हमारे प्राण-दंड के लिए एक फौज या पलटन के कुछ जवान बुलवा लेंगे."
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विज्ञापन में क्या दिखाने का प्रयास किया जा रहा है?
क्या कहने का प्रयास हो रहा है?क्या आदमी कुत्ते से भी गयतर हो चुका है, कि उसे पता ही नहीं कब, क्या हो जाए? कहते हैं कि कुत्ते का भी एक मौसम होता है, मगर लगता है कि आदमी बारहमासी कुत्ता हो चुका है!फिर हम हल्ला मचाते हैं एड्स का. अरे ऐसे में एड्स नहीं तो क्या प्यार फैलेगा??!आखिर हम किस संस्कृति की और बढ़ने के प्रयास में हैं? एड्स का हौव्वा है क्या?सच तो ये है कि यहाँ नाको(राष्ट्रिय एड्स नियंत्रण संस्थान) के माध्यम से एड्स को रोका नहीं फैलाया जाता है!!! एड्स को रोकने का ये कैसा प्रयास है जो सरकार 'कंडोम' के रिंगटोन के जरिये करने का प्रयास कर रही है?
जितनी बार सरकार 'कंडोम-कंडोम' चिल्ला रही है अगर उतनी बार 'हरिओम' कहा होता तो शायद ज्यादा फायदा हो जाता!!
बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक जाल फैलाकर एड्स का विज्ञापन कर रही हैं और हम इस सुखद भ्रम में खोये हुए हैं कि ये सब एड्स को रोकने के लिए है. ८० प्रतिशत कंडोम के विज्ञापनों से यह स्पष्ट है कि ये सब मात्र उनके विज्ञापन का, और यौनिक स्वच्छंदता को बढ़ावा देने का प्रयास है. इन सभी विज्ञापनों में इसे एक आनंद प्राप्ति का साधन बताया जाता है, एड्स की रोकथाम या और इस जैसी बातें तो कहीं पीछे छूट जाती हैं, और यही कारन है कि कम पढ़े लिखे लोगों का बड़ा वर्ग इसे उसी रूप में जानता और समझता है, और उसकी उपलब्धता न होने पर उस जैसे और विकल्पों की तलाश करता है. यही तलाश कारन बन जाती है एड्स या उस जैसी गंभीर बीमारी का.
समझ नहीं आता सरकार एड्स रोक रही है या कंडोम की मार्केटिंग कर रही है? जनसत्ता, १९ जुलाई के अंक में एक समाचार पढने को मिला कि अब सरकार राजमार्गों के पेट्रोल पम्पों पर भी कंडोम की वेंडिंग मशीने लगाने जा रही है,,आश्चर्य.... ये क्या है?
क्या ऐसे ही एड्स रुकेगा?
भारत कभी एड्स का देश नहीं रहा है, क्योंकि यहाँ यौन स्वच्छंदता की आदत नहीं रही है. मगर अब लग रहा है कि हम एड्स के मामले में भी शीर्ष पर पहुंचना चाहते हैं.
यहाँ एड्स के रोकथाम का प्रयास नहीं बल्कि एड्स के इलाज का प्रयास ज्यादा हो रहा है. और कोई भी इलाज तभी कारगर है जब बीमारी हो. और इसीलिए बीमारी को बढ़ाने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.एड्स किसी कंडोम के इस्तेमाल से नहीं रुक सकता, न ही ए.आर.टी. के इस्तेमाल से.एड्स को ख़त्म करना है तो जरूरी है कि सरकार ये हवाई विज्ञापन बंद कर के कुछ जमीनी कदम उठाये जो भारत की तासीर के हिसाब से हो.इस सम्बन्ध में यह पंक्तियाँ बहुत ही प्रासंगिक हैं--'हर तरफ शोर है, एड्स का दौर है,कोई कहता है ये करो, कोई कहता है वो करो,कोई कहता है ऐसे करो, कोई कहता है वैसे करो,मगर आश्चर्य ....कोई ये नहीं कहता कि चरित्र ऊँचा करो...'शायद यह ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है एड्स से बचने का.
--Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.
कॉलेज में कदम रखा. कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी. आजादी के वक़्त हर नेता पढ़े लिखे थे. क्रांति के लिए केवल भावना ही नहीं विचार की भी जरूरत होती है. कौन सा मार्ग बेहतर है, के चयन में परेशानी थी. जो मिलता वही आकर्षक हो जाता.कैम्पस में कई बैनरों पर बहसें मौजूद थीं. नक्सलवादी आन्दोलन, ७४ का आन्दोलन, बोधगया का भूमि आन्दोलन, गंगा मुक्ति आन्दोलन, आजादी बचाओ आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, स्त्री मुक्ति, बीज, पानी, जल, जंगल को बचाने के नाम पर आन्दोलन जैसे चिपको आन्दोलन......
बस, इसी खेल में डॉ. विवेकानंद से मुलाकात हुई. उन्होंने सुझाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो लिया जाये. खोजते-खोजते संघ कार्यालय पहुँच गया. जन्माया बेटा और बना-बनाया कार्यकर्त्ता भाग्य से ही किसी को मिलता है. मेरी औकात जल्द ही बढ़ गयी. नगर से लेकर प्रान्त तक का मैं आदमी बन गया.
बयानबाजी खूब करता. अख़बार में खबरें भी दनादन छपतीं. सूची बनाना, संपर्क करना, एकत्रीकरण ये शब्द ही आन्दोलन का पर्याय बन गया. महत्वकांक्षी बड़ी थी. जिस संगठन में बुलाया जाता, वहां राष्ट्रीय दायित्व ही संभालने का जी करता. शुक्र है कि मैं कोई नया संघ बनाकर सरसंघचालक नहीं बना!!
क्या करने आया था, क्या करने लगा? पता ही नहीं चल पा रहा था- "आये थे हरी भजन को, ओटन लगे कपास...". प्रतिक्रांतिकारी होने का सारा नाटक शुरू कर दिया.
एक बार एक बड़े नेता को भागलपुर आना था. स्वागत के फूल खरीद लिए थे. यद्यपि उनका व्यक्तित्व कथित तौर पर राजनीतिक साधक के रूप में चर्चित था. स्टेशन पर आते ही फूल माला से लादकर उन्हें गदगद कर दिया। उन्होने अपने गले से माला उतारा और मेरे हाथ में सौप दिया और मुझे कान मे फुस्फुसाये कि उसी माला
को अगले चौक पर पहना दें।ताकि जगह-जगह उनके स्वागत की खबर बन सके। धुरफ़न्दी का हमारा नया पाठ पढ़ना शुरु हो गया। सवेरे-सवेरे खबर आयी। अखबार को देख-पढ़ मुझे सामाजिक जीवन के पाखण्ड का एह्सास तो हुआ, मगर वह धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा।
महिला कार्यकर्त्ता का झुकाव मेरी ओर बढ़ गया. वैसे संघ की 'मातृशक्ति' शाखा से अलग रखी जाती थी. स्वयंसेवक के भटक जाने का भय था.
स्त्रियों का मातृशक्ति के रूप में बहुत आदर था. मैं भी स्त्रियों को खोज-खोजकर आदर देने लग गया. स्त्रियों को आदर देने का मेरा छिटपुट कार्यक्रम जारी रहा. आदर देने में हमसे भी बड़े-बड़े अधिकारी मौजूद थे वहां. संघ की अंकुरबाडी में मौजूद बड़े-बड़े महंत के सामने मुझ जैसे पिद्दी महंत का टिके रहने मुश्किल था. बस क्या था, संघ का मैं तन-खातैया घोषित हो गया.
बहुत अफ़सोस हुआ संघ से बाहर होने का. बड़ा सुख था वहां आन्दोलन करने में. सारी सुख-सुविधा मौजूद थी. किस्मत में कुत्ता पेशाब कर दिया कि मैं समाजवादियों के बीच आ गया. हलुआ मलाई के बाद सूखी रोटी खाना मुश्किल था. बदबूदार देह, बजबजाती जिंदगी और बोरा-चट्टी पर मीटिंग.
वर्षों वहां गुजरा. आन्दोलन खडा कर देने को मैं उतावला था. आत्म-मुग्धता असीम थी. राष्ट्रपति और भंगी की संतान को समाजवाद मुहैय्या कराने का ठेका मानो मुझपर ही था. एक से एक गीत गाता. नारा लगाता. संघ का 'बंधुवर' यहाँ 'साथी' में तब्दील हो गया.
हर घाट का पानी पीते-पीते अल्ट्रा-लेफ्ट के पास आ गया. हार्डकोर और मुलायम कोर यहाँ समझ में ही नहीं आया. विरोध के लिए विरोध था. यहाँ मेरा चरित्र अंतर्राष्ट्रीय हो गया. मेरा वैश्विक व्यक्तित्व आकर्षक था. विश्व स्तर के प्रश्न होते थे मेरे पास. इजराएल, अमेरिका, इराक और इरान, न्यूक्लिएर डील और पूँजी वाद पर बोलना तो शगल हो गया था. विखंडनवाद, इतिहास का अंत, सभ्यता का संघर्ष, उत्तर आधुनिकता, ९/११ के बाद, ऐसे प्यारे-प्यारे शब्द थे मेरे पास. ये सारी बातें सुनने के लिए बेवकूफ भी कम नहीं थे.
दलित घाट पर भी गया. नव-ब्राह्मणवाद का पूरा नजारा. खूब मनुआद को कोसता. दलित, वंचित, शोषित, पीड़ित अकलियत और पसमांदा पर बोलता. देश का उत्थान मैं दलितों के उत्थान में देखता. श्रमण, 'बहुजन' और फिर 'सर्वजन' में उलझते-सुलझते, मैं यहाँ हूँ.
कोई कद आदमकद नहीं लगा. हर प्रक्रिया, निष्पत्तियां शून्य लगीं. फंडे और डंडे का रंग एक जैसा था. सिद्धांतों और दर्शनों का कोई भेद नहीं. "जो जाये लंका, वही हो जाये रावन." सत्ता सबों के लिए सुंदरी थी पर गणिका की तरह, वह एकांत में प्रिय थी और सार्वजनिक जगह पर गाली. जो सत्ता तक नहीं पहुँच पाए सत्ता उनके लिए गाली थी, मौकाविहीन ब्रह्मचारी की तरह.
चतुर्दिक खामोशी है. कांग्रेस का रामराज्य, राहुल-राज्य में बदल गया है. देश हँसता-मुस्कुराता नजर आ रहा है. जन्तर-मंतर खाली है, आन्दोलन बचाने का खेल जारी है.
मेरे जैसे कईयों ने आन्दोलन-आन्दोलन खेला. नयी पीढी को अब आन्दोलन ना सिखाएं. आन्दोलन का व्याकरण उसे स्वयं गढ़ने दें. मैं अपनी प्रतिक्रान्तिकारिता के लिए नयी पीढी से माफ़ी मांगता हूँ, अब मेरे अंदर उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं है
'आओ आन्दोलन-आन्दोलन खेलें..'
--Amit Tiwari 'Sangharsh', SwarajT.V.
दिल्ली दुनिया से अलग नहीं है, खासकर अमेरिका से तो बिलकुल नहीं। अमेरिका में गे, लेस्बियन, बाई- सेक्सुअल और ट्रांस-जेंडर से जुड़े लोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की है कि उनकी समलैंगिकता को कानूनी आधिकार मिले। समलैंगिक शादी को सामाजिक स्वीकृति मिले।
१९६९ से यह आवाज़ सुनाई पड़ने लग गई थी। आज यह कानून सीनेट से पास होने की स्थिति में भी है। अमेरिका का लोबीईंग और दबाव समूह इस दिशा में सक्रिय है।
कल यानी २८ जून २००९ को दिल्ली में गे-मानसून ने दस्तक दी। टोलस्टोय मार्ग से जंतर-मंतर तक मार्च निकला। नारा था: होमो-हेट्रो भाई-भाई, दुनिया के लेस्बियन एक हों।
खूंटे से खुली गाय की तरह स्त्री-पुरुष वर्जना विरोधी नारे लगा रहे थे। खबरिया चैनलों और अख़बार के लिए इससे बड़ी खबर क्या हो सकती है? कई प्रकार की उत्सुकता लिए मैं टी.वी. से चिपका। गर्मी से तर-ब-तर होने के बावजूद भी मैंने अखबार का पन्ना निचोड़ डाला।
सभी धर्मों के धर्माचार्य इसके विरोध में एकजुट हो गए हैं। पंडित और मुल्ला के स्वर एक हो गए। बहुत मुश्किल से ये लोग एक सुर में बोलते हैं। इन समलैंगिकों व लेस्बिअनों ने धर्माचार्यों के बीच एकता स्थापित करा दी।
समलैंगिकों की जय हो!!।
पहले स्त्रियाँ प्रताडित थीं, मर्दों के प्रति गुस्सा था। इस कारण मर्दों से मुक्ति के लिए दो स्त्रियाँ ही आपस में रहने लगीं। शायद पति-पत्नी की तरह।यानी पतिवाद जिन्दा रहा। इधर पत्नी से आजिज पतियों ने भी समलैंगिक संबंधों को बढ़ावा दिया। एक समलैंगिक संस्कृति का विकास शनैः शनैः पटल पर आने लगा। नव-उदारवाद ने अगर सबसे ज्यादा गति दी तो वह है स्त्री मुक्ति, सहजीवन, सरोगेट मदर, किराये की बीवी, बहन-बेटियों से यौनिक सम्बन्ध। गे, लेस्बियन, बाई-सेक्सुअल ट्रांस जेंडर, वाइफ स्वेपिंग आदि-आदि शब्द भी इसी नव-उदारवाद का प्रति- उत्पाद हैं।
बेड और ब्रेड, इन्हीं दो पावों पर खड़े बाज़ार का लक्ष्य है कि दुनिया को किचेन और कमोडिटीज में परिवर्तित कर दिया जाये। भोग-भाग का योग है, भोग सको तो भोगो। भोग के खिलाफ में कोई प्रवचन सुनने को तैयार नहीं ।
आज का विमर्श है, ''समलैंगिक संस्कृति बनाम सनातन संस्कृति''। सनातन संस्कृति की चासनी में वर्जनाओं की कोई घुट्टी नयी पीढी को नहीं पिलाई जा सकती है। संस्कृति के नाम पर दमन, यह भला कब तक चलता। वक़्त रहते सनातनी खुद को संभाल नहीं पाए। हम जंजीर दिखाते रहे कि हमारे पूर्वजों के पास हाथी था। परिवर्तन आहिस्ते-आहिस्ते बेडरूम तक पहुँच गया। कुंठा की बाढ़ ने सनातनी बांध को तोड़ दिया। कुंठा का बहाव अराजक हो गया। मर्दवाद की फसलों को बहा ले जा रहा है, इस टूटे बांध का पानी।
वक़्त के साथ न बदलने की मूढ़ता लील गयी है मूल्यों की बातों को। स्वर्गीय माइकल जब भारत आये थे, तो संस्कृतिप्रेमियों ने इससे संस्कृति पर हमला बताया। भारत की संस्कृति माइकल के आने से ख़त्म होने लगी। भला राम, कृष्ण, कपिल, कणाद, बुद्ध,महावीर की बनायीं संस्कृति को माइकल ने हिला दिया। राम!!!.राम!!! मेरी दृष्टि में माइकल इन धुरंधरों से ज्यादा बलशाली साबित हुए। अगर दो कौड़ी का नचनिया सनातन संस्कृति को नचाने लग जाये तो निश्चित ही वह नाच प्यारा होगा।
दुर्बलों की कोई संस्कृति नहीं होती। वह शक्तिशालियों की संस्कृति का केवल अनुसरण भर करते हैं। भारत की संस्कृति का भी दुनिया में डंका बजा करता था जब भारत के पास आर्थिक संप्रभुता थी।
मामला गे या लेस्बियन से डरने का नहीं है। कोई भी संस्कृति पराभूत होती है अपने आन्तरिक कारणों से। संस्कृति के भीतर का अन्तर्विरोध ही किसी संस्कृति को निर्बल बनाता है। भारतीय संस्कृति का खिड़की-दरवाजा खोलना होगा। ताज़ा हवा को आने देना होगा। संस्कृति और परम्परा के नाम पर दमन होगा, तो गे सोसाइटी का जन्म तो अवश्यम्भावी हो जायेगा।
--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.
"जुल्मों-सितम की आग लगी है यहाँ वहां, पानी से नहीं आग से इसको बुझाइए."