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जलमेवममृतम्, इदम जलमौषधम्

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/24/2010 07:05:00 PM


‘‘जलमेवममृतम्, इदम जलमौषधम्।।’’ कहकर जल की महत्ता और उसकी उपादेयता को श्रेष्‍ ठता प्रदान करने वाला देश, सभी प्रकार के जलस्त्रोतों, जल-संग्रह स्थलों तथा जलों को पूज्य मानने वाले देश में, जल के देवता श्री वरूण देव की प्रसन्नता हेतु सदैव जलस्थलों, जल के आसपास के क्षेत्र तथा जलों को पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर रखने का अभ्यासी जन समुदाय वास करता रहा है। राज्य और प्रजाजन सभी जलों का समादर करते रहे हैं। इस हेतु के राजकीय, सामाजिक, सामुदायिक, साम्प्रदायिक, धार्मिक और व्यक्तिगत आचरण तथा आचार संहिता भी प्रयोज्य थी।
किन्तु आज राज्य से लेकर व्यक्ति और व्यावसायिक समूहों तक सभी उसी अमृतमय जल को, उसी औषधिमय जल को विषमय करने के उपादानों में दिनरात लगे हैं। शहरों के मलमूत्र से लेकर कारखानों के रासायनिक विषैले पानी के नाले और चमड़े के पानी के नाले पवित्र जलों को बरबाद कर चुके हैं।
आज जब संपूर्ण विश्‍व और स्वयं भारत तथा इसके समस्त महानगर जल संकट के मुहाने पर खड़े हैं, उस समय भी दृष्टिहीन मानवजाति कितनी भयावह गति से जलों के विनाश पर डटी हुई है। आने वाले समय में निश्चित ही यह स्थिति इससे भी विकट होगी। आज गंदे नालों का पानी अपेक्षाकृत साफ और महानगरीय प्राकृतिक नदियों का पानी अधिक गंदा दिखता है। जिनका चुल्लू भर जल पीकर मानव प्राण तृप्त कर लेता था, उन सरिताओं के चुल्लू भर जल को जनगण आज तरसता है।
यह सभ्यता, यह विकास अपनी ही समूल हानि का प्रयास है, जो एक दिन अवश्‍य ही हमारे अपने लिए ही चुक जाने का कारण बनने वाला है। यह प्रदुषण जल, वायु, अग्नि, आकाश, पर्यावरण सर्वत्र ही तो फैला हुआ है। आखिर क्या होगी इसकी अन्तिम परिणति ?
ऐसा नहीं कि नदियों, जलों के संरक्षण की योजनाएं नहीं चल रही हैं। अब तक केवल भारतवर्ष में ही सैकड़ों अरब रुपये इस हेतु व्यय हो चुके हैं। किन्तु विचारणीय यह है कि इस दिशा में हमारी उपलब्धि क्या है ? क्या इतने व्यय के बाद भी हम देश की एक भी नदी को पवित्रता या शुद्धता के स्तर तक वापस ले जा सके हैं ? नहीं!!
प्रश्‍न यही है कि आखिर ये नाले, नदियों में ही क्यों गिराए जाते हैं ? इनके लिए कोई अन्य विसर्जन स्थल क्यों नहीं तैयार किया जा रहा है ? नदियों को पूर्ण प्राकृतिक अवस्था में ही क्यों नहीं बहने दिया जा रहा है।


- Dr. Kamlesh Pandey



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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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