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देह व्यापार को वैधानिक बना देने की बात करते हुए न्याय-मूर्ति दलवीर भंडारी और न्याय-मूर्ति ए.के. पटनायक की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से कहा -‘जब आप कहते हैं कि वेश्यावृत्ति दुनिया का प्राचीनतम पेशा है, इस पर कोई पाबन्दी नहीं लगा सकते तो फिर इसे वैध क्यों नहीं बना देते?’
भारत सरकार इस विषय पर लगातार सोचती, विचारती और सुधार की दिशा में निरंतर आगे बढती रही है. वेश्या को सेक्स-वर्कर कहना इसी प्रयास की एक कड़ी है. वेश्यावृत्ति को वैधानिक स्वरुप दिया जाय या नहीं, विमर्श जारी है.
वेश्यावृत्ति का इतिहास पुराना है. आम्रपाली, वैशाली की नगरवधू थी. नगरवधू यानि पूरे नगर की वधू. सदासुहागन के रूप में भी जानी जाती थी. सदासुहागन का अर्थ ‘जिसका सुहाग कभी नहीं मरता हो.’ आचार्य चतुरसेन की किताब ‘वैशाली की नगरवधू’ में कई बातें उभरकर सामने आती हैं. वसंतसेन से ‘रेम्पुल प्रोस्टिट्यूशन’ की जानकारी मिलती है. बंगाल की ‘विनोदिनी दासी’ की कहानी हम सब पढ़ चुके है. कालांतर में विनोदिनी रंगमंच की अदाकारा के रूप में सामने आती है.
गोवा में पुर्तगालियों ने कई देशों से लड़कियों को आयात किया और इस पेशे में धकेला. खासकर जापान से तो बड़े पैमाने पर लड़कियां लायी गई.
‘ईस्ट इण्डिया कंपनी’ ने भी कई देशों की लड़कियों को ‘ब्रिटिश भारत’ आयात किया. इन लडकियों का काम ना केवल कंपनियों के सिपाहियों को सुख देने के लिए था बल्कि भारतीयों को भी लुत्फ उठाने का मौका दिया.
आजादी के बाद वेश्यावृत्ति जीवन दलदल की तरह था. इस नारकीय जीवन के खिलाफ आवाजें उठ रही थी.
वेश्यावृत्ति को वैश्विक, आर्थिक और राजनीतिक कारण भी प्रभावित कर रहा है.
भारत आज 15 करोड़ वेश्याओं का देश बन गया है. इसमें एक लाख से ज्यादा तो केवल मुंबई शहर में ही हैं. बाल-वेश्यावृत्ति के लिए भारत, पाकिस्तान और मध्यपूर्व के देश हमेशा ही कुख्यात रहे हैं. बाल वेश्यावृत्ति मध्यमवर्ग से जुडी थी. इनकी मजबूरियां और महत्वाकांक्षाएं ज्यादा ही प्रभावित कर रही हैं. युवा वेश्यावृत्ति को गायिकी, नृत्य और काल सेंटर में लगी लड़कियां बढ़ावा दे रही हैं. धार्मिक वेश्यावृत्ति को देवदासियां गति प्रदान कर रही हैं. ‘देवी चेलम्मा’ के नाम पर ये देवदासियां भी वेश्यावृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं.
1956 में भारत सरकार SITA क्ट लाती है. यह SITA एक्ट इस धंधे को रोकने के लिए लाया गया था, जिसमें केवल मनोरंजन, गीत, गायिकी के लिए लाइसेंस दिया गया था, देह बेचना शामिल नहीं था.
बाद में SITA के बाद PITA एक्ट (THE IMMORAL TRAFIC PREVENTION ACT) आया. सरकार ने थोड़ी संवेदनशीलता दिखाई. इसी संवेदनशीलता का परिणाम वेश्याओं की मंडी ‘सोनागाछी’ को उपहार के रूप में मिला. वेश्याओं का बीमा किया गया.
PITA (पिता) एक्ट में सेक्स के सार्वजानिक उपयोग को अवैध कहा गया. कालगर्ल टेलीफोन नंबर डिस्प्ले नहीं कर सकती. पब्लिक प्लेस के दो सौ गज के अन्दर की जाने वाली वेश्यावृत्ति अवैध है. 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध तथा वेश्या के साथ सहजीवन भी अवैध घोषित कर दिया गया. जो लड़की या औरत वेश्यावृत्ति से मुक्त होना चाहती है, सरकार उसके पुनर्वास की व्यवस्था करेगी तथा अन्य आर्थिक मदद करेगी. वेश्या के बच्चों को सामाजिक प्रतिष्ठा, पहचान और शिक्षण के लिए सरकार सगुण प्रयास करेगी.
PITA ( पिता) कानून ने वेश्याओं को आत्मविश्वास प्रदान किया कि उन्हें भी जीवन जीने का हक है.
मुंबई का कमाठीपुरा, दिल्ली का जी.बी. रोड, ग्वालियर का रेशमपुरा, पुणे का बुधवार पैठ, वाराणसी का दालमंडी, सहारनपुर का नक्काशी बाजार, मुजफरपुर का चतुर्भुज चैक, भुवनेश्वर का मालिसः, आन्ध्र का पद्देपुरम, भागलपुर का जोगसर (अब उजड़ा चमन), बंगाल का सोनागाछी और नियामतपुर आदि बदनाम गलियां SITA (सीता) और PITA (पिता) एक्ट के बाद भी बजबजाती जिंदगी ही बयां कर रही हैं.
2007 में 2.8 करोड़ वेश्या थी, आज यह संख्या दुगुनी हो गयी है. 2010 के कॉमनवेल्थ गेम लाखों और कम्फर्ट गर्ल को बाजार में उतारेंगे. दिल्ली में होने वाला कॉमनवेल्थ गेम ना केवल खेलों को लेकर चर्चा में रहेगा, बल्कि सेक्स-टूरिज्म भी उफान पर होगा.
इस दिशा में काम करने वालों में 76 प्रतिशत स्त्री-दलाल, 24प्रतिशत पुरुष-दलाल लग चुके हैं. इस नयी शब्दावली (कम्फर्ट गर्ल) को सांस्थानिक ढांचा देने में लगी है सरकार. अकूत संसाधन झोंका जायेगा इस सेक्स टूरिज्म पर. 2 लाख वेश्याओं की खेप तो भारत लायी जा चुकी है और 1 लाख आने की तैयारी में है. दलालों के अलावा इस धंधे में लड़कियों को झोकने में 80 प्रतिशत भूमिका उनके अपने रिश्तेदार निभाते हैं.
बाजार तैयार है. माल तैयार किया जा रहा है. इस मंडी के लिए आपको ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा...


-Vijayendra
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Nirman Samvad

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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