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चलो गांव की ओर

Posted by Avinash On 4/20/2010 01:40:00 AM

आजादी के बाद किसानों की आस थी कि अब किसानों के दिन सुधरेगें। जो कुछ किसान के पास था अपना पुराना कृषि यन्त्र, हल, पुरानी खेती के तौर तरीके पुराने देशी नस्ल के गाय बैल, भैंस, बकरी व अन्य पालतू पशु-पक्षी, सादगी रहन-सहन और आपस में भाई-चारा व प्रेम व्यवहार। हर रोज शाम को खाना खाने से पहले सब लोग एक जगह एकट्ठा होकर अंदर में हाल चाल के बाद एक दूसरे के दुख को बांटने व सहयोग के लिए हर समय तैयार रहते थे। गांव का हर सदस्य चाहे लोहार, कुम्हार, धोबी, नाई, किसान, मजदूर सब एक दूसरे के पूरक थे। सब का आपस में प्रेम व्यवहार था। चाहे गरीब हो या सामान्य किस्म के लोग शादी विवाह जैसे अन्य रस्म आसानी से निपट जाते थे। गांव की बनावट, शुद्ध आबो- हवा, तालाब, पेड़-पौधों का दृश्य जो बयां करता था कि - ‘‘चारों ओर ताल तलैया, घर बगिया की छांव हो, स्वर्ण सा सुन्दर लागे भइया आपन गांव-गिराव हो।’’ वर्ष के सारे त्योहार सभी लोग बड़ी धूम-धाम से मनाते थे। क्या उमंग, क्या जोश था। पेडों पर चढ़ने से लेकर तालाब में तैरने के खेल, कुश्ती, दंगल आदि खेलों को खेलकर गांव के लोग तन्दरुस्त व खुशहाल रहते थे। बड़े तहजीब के साथ लोग एक दूसरे का सम्मान करते थे। बड़ों और छोटों का एक अजीब रिश्ता था। एक दूसरे के विचारों से सहमत होकर सहयोग के साथ बड़े से बड़े कार्यों को पूरा करते थे। आजकल जैसे सबके पास आने जाने के साधन नहीं थे, फिर भी पैदल चल कर साल में कई बार सभी रिश्तों में अपनी हाजिरी दर्ज करा देते थे।
एक बार सभी की बागडोर एक गांव के छोटे कद के आदमी जो आज हमारे बीच नहीं है, स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री के हाथ लगी और उस समय हमारे देश में आबादी के अनुसार अनाज की पैदावार कम हुई। शास्त्री जी ने गांव और गांव के किसान का नारा बुलन्द किया और खेती ने विकास की पटरी पर चलना आरम्भ कर दिया; विज्ञान के सहयोग से नई तकनीक, उन्नत बीज तथा किसानों को प्रशिक्षण पर जोर दिया गया। देश का दुर्भाग्य था कि दिल का दौरा पड़ने से वे इस दुनियां से चले गए। किसानों की आशा निराशा में बदल गई। फिर कुछ समय बाद किसानों के मसीहा के रूप में चौधरी चरण सिंह उभरे और समय-समय पर किसानों की वकालत की और कहा कि देश की खुशहाली का रास्ता गांव के खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है। और आज उनके बाद इस विशाल आबादी वाले कृषि प्रधान देश में किसान काफी चिन्तित है। आज विकसित देशों की तुलना में भारत में कृषि अनुदान मात्र 17.8 डालर प्रति हेक्टेयर है, वहीं जापान 6915 डालर, यूरोपीय संघ 1016 डालर, न्यूजीलैण्ड 317 डालर, अमेरिका 184 डालर, कनाडा 167 डालर प्रति हेक्टयेर अनुदान दे रहा है। भारत में विकास की अवधारणा को रोजगारोन्मुखी करना जरूरी है क्योंकि उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण ने विषमता को बढ़ाया है। और लोगों को रोजगार विहीन किया है। कृषि रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है, इसलिए कृषि क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की जरूरत है। कृषि शोध में विस्तार को पिछले दो दशक से नजर अंदाज़ किया गया है। राष्ट्रीय किसान आयोग की पहली रपट में कृषि संकट के पांच आधारभूत कारक बताए गए है। भूमिसुधार का अपूर्ण कार्यवृत, जल की मात्रा गुणवत्ता में कमी, समुचित प्रौद्योगिक विकास न होना, जल का समय पर न मिलना और सुनिश्चित लाभदायक बाजारीकरण के अवसर न होना। इस कृषि संकट की मार सीधे किसानों पर पड़ती है।
आज देश का किसान चिन्तित है। देश की सबसे बड़ी आबादी गांव में बसती है। गांव के लोगों का रोजगार कृषि से जुड़ा हुआ है। हर छोटे गरीब किसान का सहारा खेती है। हर चीज इंतजार कर सकती है, मगर खेती नहीं। भारत की खेती मौसम और स्थानीय जलवायु पर निर्भर करती है। देश का काफी भू-भाग वर्षा पर निर्भर है। बहुत कम ऐसे क्षेत्र है जहां सिचाई के संसाधन उपलब्ध है।
यही नहीं दुर्भाग्यवश खेती को निवेश के मामले में भी वह प्राथमिकता भारत में नहीं मिली जिसकी वह हकदार रही है। अब भी 70 फीसदी भारतीय, कृषि पर निर्भर हैं। खाद्यान्न के सुरक्षित भण्डारण के लिए राष्ट्र , प्रदेश, जिला, तहसील स्तर पर पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। सरकार किसानों को सब्सिडी देने पर विचार कर रही है। लेकिन ठोस नीति नहीं बना पा रही है।
भ्रष्टाचार को देखते हुए सरकार किसानों को सीधे बैंक खाते में सब्सिडी देने का प्रावधान करे। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई की समुचित व्यवस्था करे। सरकार को बैंकों पर कड़ी नजर रखनी होगी, ग्रामीण क्षेत्र के बैंक बदनाम हो चुके हैं कमीशनखोरी के लिए। जहां किसान को कर्ज लेने पर भी कमीशन देना हो, उस किसान के लिए गए कर्ज पर ब्याज का प्रतिशत क्या होगा यह जांच से पता चल पाएगा। इसके लिए सरकार एक जांच कमेटी बनाए और वहां स्थानीय कृषकों के सहयोग एवं भागीदारी से जांच रिपोर्ट तैयार कराई जाए तभी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है। ऐसा करने पर ही किसान खुशहाल हो पायेगा।

वंश बहादुर पुजारी

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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