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अगर बात शहीदों की हो तो शायद ही कोई हिन्दुस्तानी हो जिसे भारत-चीन और भारत-पाक के बीच हुए युद्धों में मारे गए शहीदों की याद ना आये। उसी याद को ताजा करते हुए पिछले दिनों विजय दिवस मनाया गया। जो भी हो लेकिन यह एक कटु सत्य है कि सरकार बेशक विजय-दिवस मनाती है, लेकिन क्या युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं और उनके बच्चों को उचित सम्मान मिल पाता है? निश्चय ही इसका उत्तर मिलेगा, नहीं.!
ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं, संसद भवन पर हुए आतंकी हमले के शहीदों की स्थिति को ही देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। आरोपी अभी भी आराम की जिंदगी जी रहा है। शहीदों के परिजनों की मांग थी कि आरोपी को फांसी की सजा दी जाए, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। इस विरोध के चलते शहीदों की विधवाओं ने अपने पदक राष्ट्रपति को वापस कर दिए। क्या यही है भारत सरकार का विजय दिवस? सीमा पर कार्यरत एक सैनिक से ये प्रश्न करने पर कि क्या वो सरकार की नीतियों से संतुष्ट हैं? उसने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि शायद ही कोई मंत्री या बड़ा अफसर हो जो जम्मू-कश्मीर आता हो, क्योंकि उन्हें पता है कि सेना में कितनी आग है, और वह डर के मारे जम्मू-कश्मीर नहीं आते। उसने आगे कहा कि इस देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं नेता, जो एक ओर तो सेना को सीमा पर रखते हैं, और दूसरी ओर अगर कोई आतंकी पकड़ा जाता है तो उसे छोड़ देने की वकालत करते दिखाई देते हैं।
पिछले दिनों इंडिया गेट पर विजय दिवस का नजारा देखने को मिला। नेता जी आये, सलामी हुई और चलते बने। आखिर किसी नेता का बेटा सेना में क्यों नहीं जाता? सेना कब तक इन अन्दर के दुश्मनों का शिकार होती रहेगी? जंग बाहरी दुश्मनों से ज्यादा तो इन अन्दर के दुश्मनों से है।
पिछले साल होटल ताज और नरीमन हाउस पर जो आतंकी हमले हुए, उसके शहीदों के परिजनों को क्या मिला अब तक? कहा जाता है कि बुलेट प्रूफ जैकेटों में कमी थी। आखिर इस बात की जांच क्यों नहीं करवाना चाहती सरकार? किसी नेता को गोली लगी होती तो मौत होने से पहले सी. बी. आई. जांच शुरू हो गई होती। मुंबई हमले की घटना की जाँच क्यों नहीं उजागर की जा रही है?
जब तक इस देश के भ्रष्ट नेताओं की जमात शासन पर काबिज रहेगी ऐसा ही होता रहेगा। एक ओर विजय दिवस मनाया जायेगा और दूसरी ओर आतंकी को दामाद बनाकर रखा जायेगा। शहीद करकरे की पत्नी और उनके परिवार को आजतक न्याय नहीं मिल पाया। दूसरी तरफ कसाब करोंड़ों के सरकारी खर्च पर आराम फरमा रहा है, हर रोज नए-नए बहानों के साथ।
आजादी के शहीदों के साथ भी तो यही होता रहा है, 15 अगस्त और 26जनवरी के अलावा कभी याद नहीं आती हमें उनकी।
यदि बातें यही तक समाप्त हो जातीं तो भी शायद कुछ बेहतर ही होता, हद तो तब हो जाती है जब शहीदों को भी जाति-पांति के नाम पर बांटा जाने लगता है। अब शहीद भी प्रदेशों और जातियों की धरोहर बना दिए गए हैं।
झूठ लगती है ये पंक्ति -‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा’, अब कुछ नहीं बचा है शहीदों की शहादत के नाम पर।
शहीद किसी पैसे की उम्मीद में शहीद नहीं होते हैं। वो शहीद होते हैं सिर्फ देश और देशप्रेम के नाम पर। अगर शहीदों के नाम पर भी इसी तरह राजनीति होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब युवाओं में देश को लेकर जज्बा खत्म हो जायेगा।
-आषीश, सहरसा
निर्माण संवाद (वर्ष 3, अंक 42)

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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