जौनपुर । महर्षि यमदग्नि की तपोस्थली व शर्की सल्तनत की राजधानी कहा जाने वाला प्राचीन काल से शैक्षिक व ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्धिशाली शिराजे हिन्द जौनपुर आज भी अपने ऐतिहासिक एवं नक्काशीदार इमारतों के कारण न केवल प्रदेश में बल्कि पूरे भारत वर्ष में अपना एक अलग वजूद रखता है। नगर में आज भी कई ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतें है जो इस बात का पुख्ता सबूत प्रस्तुत करती है कि यह नगर आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व एक पूर्ण सुसज्जित नगर रहा होगा। शासन की नजरे यदि इनायत हो और इसे पर्यटक स्थल घोषित कर दिया जाय तो स्वर्ग होने के साथ बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने का माद्दा इस शहर में आज भी है। नगर के ऐतिहासिक स्थलों में प्रमुख रूप से अटाला मस्जिद, शाही किला, शाही पुल, झंझरी मस्जिद, बड़ी मस्जिद, चार अंगुली मस्जिद, लाल दरवाजा, शीतला धाम चौकिया, महर्षि यमदग्नि तपोस्थल, जयचन्द्र के किले का भग्नावशेष आदि आज भी अपने ऐतिहासिक स्वरूप एवं सुन्दरता के साथ मौजूद है। इसके अलावा चार दर्जन से अधिक ऐतिहासिक इमारते यहां मौजूद है जिनमें से कुछ रखरखाव के अभाव में जर्जर हो गये है।
देश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रचलित काशी जनपद के निकट होने के कारण दूसरे प्रांतों के अलावा कभी-कभी विदेशी पर्यटक यहां आकर ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण कर यहां की संस्कृति की सराहना करने से नहीं चूकते लेकिन दूसरी तरफ शासन द्वारा पर्यटकों की सुविधा के मद्देनजर किसी भी प्रकार की स्तरीय व्यवस्था न किये जाने से उन्हे काफी परेशानी भी होती है।
हालांकि जनपद को पर्यटक स्थल के रूप में घोषित कराने का प्रयास कुछ राजनेताओं व जिलाधिकारियों द्वारा किया गया लेकिन वे प्रयास फिलहाल नाकाफी ही साबित हुये। एक बार फिर मुलायम सरकार के कार्यकाल में जौनपुर शहर को पर्यटक स्थल घोषित किये जाने सम्बन्धी बातें प्रकाश में आयी थी, जिसमें केन्द्रीय पर्यटन विभाग द्वारा अटाला मस्जिद, राजा साहब का पोखरा, शाही पुल व गोमती नदी के किनारे घाटों के सौर्न्दीयकरण हेतु लगभग पांच करोड़ रुपया भी आया था लेकिन काम जो भी चल रहा है वो जरुरत से ज्यादा धीमा रहा और वर्तमान में बंद हो गया। राजनेताओं द्वारा किये जाने वाले आधे-अधूरे प्रयास में यदि समय रहते पूरी रुचि दिखायी जाय तो संभवत: जौनपुर शहर को पर्यटक स्थल के रूप में घोषित किये जाने का स्वप्न साकार हो सकता है।
प्राचीन काल के जो भवन इस समय उत्तर भारत में विद्यमान है उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन अटाला मस्जिद शर्की शासनकाल के सुनहले इतिहास का आईना है। इसकी शानदार मिस्र के मंदिरों जैसी अत्यधिक भव्य मेहराबें तो देखने वालों के दिल को छू लेती है। इसका निर्माण सन् 1408 ई. में इब्राहिम शाह शर्की ने कराया था। सौ फिट से अधिक ऊंची यह मस्जिद हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली द्वारा निर्मित की गयी है जो विशिष्ट जौनपुरी निर्माण शैली का आदि प्रारूप और शर्कीकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। शर्कीकाल के इस अप्रतिम उदाहरण को यदि जौनपुर में अवस्थित मस्जिदों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व खूबसूरत कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इसी प्रकार जनपद की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक नगर में आदि गंगा गोमती के उत्तरावर्ती क्षेत्र में शाहगंज मार्ग पर अवस्थित बड़ी मस्जिद जो जामा मस्जिद के नाम से भी जानी जाती है, वह शर्की कालीन प्रमुख उपलब्धि के रूप में शुमार की जाती है। जिसकी ऊंचाई दो सौ फिट से भी ज्यादा बताई जाती है। इस मस्जिद की बुनियाद इब्राहिम शाह के जमाने में सन् 1438 ई. में उन्हीं के बनाये नक्शे के मुताबिक डाली गयी थी जो इस समय कतिपय कारणों से पूर्ण नहीं हो सकी। बाधाओं के बावजूद विभिन्न कालों और विभिन्न चरणों में इसका निर्माण कार्य चलता रहा तथा हुसेन शाह के शासनकाल में यह पूर्ण रूप से सन् 1478 में बनकर तैयार हो गया। इन ऐतिहासिक इमारतों के अनुरक्षण के साथ ही साथ बदलते समय के अनुसार आधुनिक सुविधा मुहैया कराकर इन्हे आकर्षक पर्यटक स्थल के रूप में तब्दील किया जा सकता है।
नगर के बीचोबीच गोमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित उत्थान-पतन का मूक गवाह 'शाही किला' आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। इस ऐतिहासिक किले का पुनर्निर्माण सन् 1362 ई. में फिरोजशाह तुगलक ने कराया। दिल्ली व बंगाल के मध्य स्थित होने के कारण यह किला प्रशासन संचालन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण था। इस शाही पड़ाव पर सैनिक आते-जाते समय रुकते थे। किले के मुख्य द्वार का निर्माण सन् 1567 ई. में सम्राट अकबर ने कराया था। राजभरों, तुगलक, शर्की, मुगलकाल व अंग्रेजों के शासनकाल के उत्थान पतन का मूक गवाह यह शाही किला वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में है। इस किले के अन्दर की सुरंग का रहस्य वर्तमान समय में बन्द होने के बावजूद बरकरार है। शाही किले को देखने प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक आते रहते है।
महाभारत काल में वर्णित महर्षि यमदग्नि की तपोस्थली जमैथा ग्राम जहां परशुराम ने धर्नुविद्या का प्रशिक्षण लिया था। गोमती नदी तट पर स्थित वह स्थल आज भी क्षेत्रवासियों के आस्था का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि उक्त स्थल के समुचित विकास को कौन कहे वहां तक आने-जाने की सुगम व्यवस्था आज तक नहीं की जा सकी है। झंझरी मस्जिद, चार अंगुली मस्जिद जैसी तमाम ऐतिहासिक अद्वितीय इमारतें है जो अतीत में अपना परचम फहराने में सफल रहीं परन्तु वर्तमान में इतिहास में रुचि रखने वालों के जिज्ञासा का कारण होते हुए भी शासन द्वारा उपेक्षित है।
मार्कण्डेय पुराण में उल्लिखित 'शीतले तु जगन्माता, शीतले तु जगत्पिता, शीतले तु जगद्धात्री-शीतलाय नमो नम:' से शीतला देवी की ऐतिहासिकता का पता चलता है। जो स्थानीय व दूरदराज क्षेत्रों से प्रतिवर्ष आने वाले हजारों श्रद्घालु पर्यटकों के अटूट आस्था व विश्वास का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। नवरात्र में तो यहां की भीड़ व गिनती का अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता है।
इस पवित्र धार्मिक स्थल के सौन्दर्यीकरण हेतु समय-समय पर स्थानीय नागरिकों द्वारा न केवल मांग की गयी बल्कि शासन द्वारा भी समय-समय पर आश्वासनों का घूंट पिलाया गया। पिछले कुछ वर्ष पूर्व एक जनप्रतिनिधि की पहल पर शीतला धाम चौकियां के समग्र विकास हेतु एक प्रोजेक्ट बनाकर शासन द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत कराने का प्रयास प्रकाश में आया था लेकिन पर्यटन विभाग की फाइलों में कैद उक्त महत्वाकांक्षी योजना न जाने किन कारणों के चलते अमली जामा नहीं पहन सकी। इस स्थल के सौन्दर्यीकरण के लिए पर्यटन विभाग द्वारा यदि अपेक्षित प्रयास किया जाय तो निश्चित ही बड़ी संख्या में यहां आने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों को जहां सुविधा होगी वहीं उनकी संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी तय है।
शिराज-ए-हिन्द जौनपुर की आन-बान-शान में चार चांद लगाने वाला मध्यकालीन अभियंत्रण कला का उत्कृष्ट नमूना 'शाही पुल' पिछली कई सदियों से स्थानीय व दूरदराज क्षेत्रों के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। भारत वर्ष के ऐतिहासिक निर्माण कार्यो में अपना अलग रुतबा रखने वाला यह पुल अपने आप में अद्वितीय है। वही खुद पयर्टकों का मानना है कि दुनिया में कोई दूसरा सड़क के समानान्तर ऐसा पुल देखने को नहीं मिलेगा।
शहर को उत्तरी व दक्षिणी दो भागों में बांटने वाले इस पुल का निर्माण मध्यकाल में मुगल सम्राट अकबर के आदेशानुसार मुनइम खानखाना ने सन् 1564 ई. में आरम्भ कराया था जो 4 वर्ष बाद सन् 1568 ई. में बनकर तैयार हुआ। सम्पूर्ण शाही पुल 654 फिट लम्बा तथा 26 फिट चौड़ा है, जिसमें 15 मेहराबें है, जिनके संधिस्थल पर गुमटियां निर्मित है। बारावफात, दुर्गापूजा व दशहरा आदि अवसरों पर सजी-धजी गुमटियों वाले इस सम्पूर्ण शाही पुल की अनुपम छटा देखते ही बनती है।
इस ऐतिहासिक पुल में वैज्ञानिक कला का समावेश किया गया है। स्नानागृह से आसन्न दूसरे ताखे के वृत्त पर दो मछलियां बनी हुई है। यदि इन मछलियों को दाहिने से अवलोकन किया जाय तो बायीं ओर की मछली सेहरेदार कुछ सफेदी लिये हुए दृष्टिगोचर होती है किन्तु दाहिने तरफ की बिल्कुल सपाट और हलकी गुलाबी रंग की दिखाई पड़ती है। यदि इन मछलियों को बायीं ओर से देखा जाय तो दाहिने ओर की मछली सेहरेदार तथा बाई ओर की सपाट दिखाई पड़ती है। इस पुल की महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कला की यह विशेषता अत्यन्त दुर्लभ है।
साभार :- जागरण
‘‘एड्स का प्रभावी प्रबंध-सम्बंध जीवनसाथी के संग’’
ये पंक्तियां एक सरकारी विज्ञापन में देखकर मेरे अन्तर्मन में सहसा ये विचार आया कि एड्स नामक महामारी मनुष्य स्वच्छंदता एवं चरित्रहीनता पर लगाम लगाने का एक जरिया है। हमारे पुराणों के अनुसार सृष्टि की रचना के साथ ही भगवान ने अर्थात अदृश्य शक्ति ने मनुष्य की रचना की तथा उसे अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति बनायी। मनुष्यों में स्त्री तथा पुरूष को एक दूसरे का पूरक बनाया, जिनके बीच मानसिक एवं शारीरिक सम्बंधों की नींव रखी, ताकि वे आपसी सम्बंधों द्वारा अपने वंश का संचालन कर सके। इस सबके साथ ही साथ प्रदान की सोचने की शक्ति। अपनी इसी शक्ति का प्रयोग करके मानव ने आग से लेकर हवाई जहाज तक के अविष्कार किये, परन्तु इसी सोच का नकारात्मक पहलू उसकी इच्छाओं का भण्डार तथा विघ्वंशक सोच थी। इन्हीं इच्छाओं में छिपी थी वासना की भावना, जिसने प्रारंभ में मनुष्य को अपना वंश बढ़ाने का माध्यम दिया परन्तु कालान्तर में जब जनसंख्या चरम पर आने लगी, परन्तु वासना की भावना भी उत्कर्ष पर थी, तब प्रारंभ हुआ वेश्यावृत्ति एवं अवैध सम्बन्धों का दौर। मनुष्य के चरित्र-पतन की इस सीढ़ी ने कई सोपान तय किये और जब ये चारित्रिक-पतन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा तब एड्स का प्रवेश हुआ एक महामारी के रूप में। एक महामारी, जो दबे पांव आई और ना जाने कितनों को आगोश में ले लिया।
एड्स के तमाम जगरूकता अभियानों के बावजूद ना एड्स के मामले नियंत्रित हो पा रहे हैं ना ही इसके प्रति सामाजिक सोच में कोई परिवर्तन लाने में सफलता मिल सकी है।
भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान (नाको) के एक सर्वेक्षण के अनुसार आज तक भी समाज का एक बड़ा वर्ग एच.आई.वी. पोजीटिव लोगों को हेय दृष्टि से देखता है। इनमें भी पुरूषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा अपमान और कंलक के साथ जीना पड़ता है। समाज के इस रवैये का कारण लोगों में एड्स को लेकर जागरुकता का अभाव है।
अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देंखे तो एड्स एक विषाणु जनित रोग है, इसका विषाणु ‘मानव प्रतिरक्षा अपूर्णता विषाणु’ (Human Immunodeficiency virus) है। इसका सबसे पहला मामला 1981 में कैलिफोर्निया में प्रकाश में आया था, तथा भारत में पहला मामला 1986 में चेन्नई में प्रकाश में आया था। बस अपने दो-ढाई दशकों के इतिहास में इसने पूरी दुनिया को हिला दिया। इसका विषाणु हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करके रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा देता है, जिससे रोगी क्षयरोग, कैंसर आदि बिमारियों का शिकार हो जाता है और धीरे-धीरे मौत के आगोश में चला जाता है और इसका दुखद पहलू ये है कि भगवान का रुप माना जाने वाला चिकित्सक भी असहाय सा रोगी की इस घुटन भरी खत्म होती जिन्दगी को देखता रह जाता है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले ये बिमारी कुछ समलैंगिकों में देखी गयी और समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध उठाया गया कदम है। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि प्रकृति की इस चेतावनी को भी हम मनुष्यों ने नजरअंदाज कर दिया और इसका परिणाम कई बेकसूरों को भुगतना पड़ा जो अनजाने ही, बिना किसी गलती के इसका शिकार होते चले गये। प्रकृति की इस चेतावनी को हमें सुनना ही होगा।
आंकड़े यह बात स्पष्ट करते हैं कि समलैंगिक संबंधो के कारण 5 से 10 प्रतिशत एड्स के मामले सामने आये हैं। स्वास्थ्य संबधी असुरक्षा के कारण 5 से 10 प्रतिशत जबकि लगभग 11 प्रतिशत मामले संक्रमित माता या पिता से उनकी संतानों को तथा शेष दो तिहाई के लगभग संक्रमण असुरक्षित यौन सम्बंधों के कारण से फैलता है।
UNAIDS के सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 31.3 मिलियन वयस्क और 2.1 मिलियन बच्चे 2008 के अन्त तक एड्स से पीड़ित थे। अकेले सन् 2008 में ही एड्स के 2.7 मिलियन नये मामले प्रकाश में आये। सन् 2008 में ही लगभग 2 मिलियन लोगों की मृत्यु एड्स के कारण हुई। एड्स से ग्रस्त लोगों में ज्यादातर लोग 20 से 25 साल की उम्र के हैं। "Global patterns of mortality in young people- a systematic analysis of population health" के अनुसार 20 से 25 वर्ष की उम्र में होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण एड्स ही होता है। 2007 के अन्त तक 18 वर्ष से कम उम्र के लगभग 15 मिलियन बच्चे एड्स के कारण अनाथ हो चुके थे। सन् 2008 तक 14 वर्ष या उससे कम उम्र के लगभग 4 करोंड़ बच्चे एड्स से ग्रस्त हो चुके थे।
हालांकि सरकार विभिन्न संचार के माध्यमों के इस्तेमाल करके लोगों को एच आई वी एड्स के बारे में सही जानकारी दे रही है। बावजूद भी ज्यादातर लोग इसे छुआछूत की बीमारी मानते हैं। एड्स फैलने की मुख्य वजह है असुरक्षित यौन सम्बंध। एच आई वी के ज्यादातर मामले असुरक्षित यौन संबधो के कारण ही होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से यौन संबंध के समय पुरूषों को कॉण्डोम का इस्तेमाल करना चाहिए। इसी मुद्दे पर समाज की नैतिकता आड़े आ जाती है। लोग इस पर बात करना बंद कर देते है। इससे उन्हें लगता है कि समाज में अश्लीलता पैदा होती है। इसलिए जब भी स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देने की बात उठती है, हंगामा खड़ा हो जाता है । यही वजह है कि एड्स का शिकार बनने वालों में किशोरों की संख्या बहुत ज्यादा है।
नाको ( NACO) की रिपोर्ट के मुताबिक एड्स के मामले में करीब एक तिहाई 15 से 19 साल के किशोर हैं। यह बात बेहद खतरनाक हैं। लगभग यही हाल महिलाओं का भी है, कम उम्र में शादी, अज्ञानता और समाजिक गैर बराबरी के चलते महिलाओं एवं लड़कियों में एच आई वी के संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है। हालात यह है कि हर 5 में से एक महिला एच आई वी के रोग से पीड़ित है। इसकी वजह केवल असुरक्षित यौन संबंध ही नहीं है, बल्कि संक्रमित खून या अन्य स्वास्थ्य संबंधी लापरवाहियों से भी एच आई वी एड्स के फैलने की संभावना रहती है। अगर हम थोड़ी सी सावधानी बरतें तो इस भयानक बीमारी से बच सकते हैं । यह सभी देशों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसके बचाव का एक ही तरीका है सही और सटीक जानकारी व उचित सावधानियां बरतनी चाहिए । एच आई वी एड्स के खिलाफ जोरदार मुहिम के साथ - साथ लोगों में भी इसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करनी होगी। संयम और सदाचरण ही वो अस्त्र है जिसके समक्ष एड्स रुपी दानव बेबस और असहाय हो जाता है। एक कवि ने सत्य ही लिखा है -
आज का दौर,
एड्स का दौर है,
एक ही शोर है
एड्स से बचने के लिये
यह करो वह करो
पर कोई नहीं कहता
चरित्र ऊंचा करो।
- Shahnaz Ansari
NIRMAN SAMVAD
(तस्वीर गूगल सर्च से साभार)
जिस प्रकार अफ्रीकी देशों जांम्बिया, कांगो, नाईजीरिया, सिएरा, लीयॉन, अंगोला, लाईबेरिया में प्राकृतिक खनिज संपदा से भरपूर होने के बावजूद भी विकास की रोशनी नहीं दिखाई देती, जिस प्रकार नाइजीरिया में दुनियाँ का दसवाँ सबसे बड़ा तेल भंडार होने के बाद भी ‘नाइजर डेल्टा’ के नागरिक आदिम युग में जी रहे हैं, उसी प्रकार भारत की सारी खनिज संपदा का चालीस प्रतिशत भाग अपने गर्भ में संजोये हुए झारखंड विकसित राज्य की श्रेणी से कोसों दूर विकासशील राज्यों की सच्चाई से भी अभी बहुत दूर है। चिंता की बात यह है कि प्रतिवर्ष 6 हजार करोड़ रुपये का खनिज उत्पादन करने वाला यह राज्य गरीबी, भूखमरी एवं बेरोजगारी से तंग आकर नक्सलियों के चपेट में बुरी तरह फंस गया है। क्योंकि नार्वे जो दुनियाँ का तीसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है और बोत्सवाना जो हीरे जैसी सम्पदा से भरपूर है, के ईमानदार नेताओं जैसा झारखंड को नेता नहीं मिला, जो ईमानदारी एवं अपनी दूर दृष्टि से नार्वे और बोत्सवाना जैसी तरक्की जैसी ऊँचाई बुलंद करता। मधु कोड़ा ही नहीं बल्कि दूरसंचार मंत्री ए राजा के ऊपर 2 जी स्पेक्ट्रम में अरबों रुपये घोटाला करने का आरोप लगा और सी बी आई का मंत्रालय के मुख्यालय पर छापा पड़ा तो उन्होंने अपना ठीकरा राजग पर फोड़ते हुए पलटवार किया कि ‘‘भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार ने खास-खास कंपनियों को निशुल्क स्पेक्ट्रम आवंटित किया, जिसके फलस्वरूप सरकारी खजाने को एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।’’ ज्ञातव्य हो कि ए राजा ने 2007 में संचार मंत्री के रूप में 2001 की कीमत पर 2 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया था, जिससे कुछ कंपनियों ने अपनी हिस्सेदारी का कुछ प्रतिशत बेच कर हजारों करोड़ रुपये कमाया।
मधु कोड़ा के आय से अधिक संपत्ति के मामलें में 31 अक्टूबर 2009 को आयकर विभाग के 400 अधिकारियों के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी ने झारखंड के अलावे दूसरे राज्यों के 8 शहरों स्थित 70 ठिकानों पर एक साथ छापा मारकर उनके विदेशों में अरबों रुपये की संपत्ति का दस्तावेज हाथ लगने का दावा किया है। जहाँ एक तरफ देश के अंदर कोड़ा की संपति का पता लगाने के लिए आयकर विभाग की वाराणसी, मेरठ, इलाहाबाद, गोरखपुर, लखनऊ, आगरा एवं राँची की टीमों ने संयुक्त रूप से 19 नवम्बर 2009 को 18 जगहों पर एक साथ छापा मारा तो दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय विदेशों में उनकी अकूत संपति के सबूत जुटाने के लिए एड़ी चोटी एक किए हुए है। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार लाईबेरिया, दुबई और कंबोडिया जैसे देशों को मधु कोड़ा के संपति के बारे में विस्तृत जानकारी देने हेतु अनुरोध पत्र भेजा जा रहा है। लेकिन मधु कोड़ा खुले आम चुनाव प्रचार के दौरान यह कहा ‘‘मैं निर्दोष हूँ’’। यही नहीं उन्होंने यहाँ तक कहा है कि हवाला के माध्यम से अगर विदेशों में पैसे जमा कराये गए तो उसमें नेताओं की लंबी सूची है। आखिर जनता यह चूहा-बिल्ली का खेल कबतक देखती रहेगी ? क्या लोग कभी भी सच्चाई को सामने पा सकेगें ? मधु कोड़ा द्वारा दिये गए बयान में जिन नेताओं की ओर इशारा है, क्या उनकी पूरी सच्चाई जनता के सामने आ सकेगी ? या फिर अन्य घोटालों की तरह इस घोटाले को भी रफा-दफा कर दिया जाएगा ? दूरसंचार मंत्री को भारत के प्रधान मंत्री क्लीन चिट दे रहें हो और वित्त मंत्री सफाई देते नजर आ रहे हों तो मधु कोड़ा द्वारा बयान ‘‘मै निर्दोष हू’’ सच न भी हो तो जनता जानना जरूर चाहेगी कि आखिर दोषी कौन है ? राज्य और देश को दीमक की भांति चाटने वाले भ्रष्ट नेतागण, चोर पदाधिकारी एवं बेईमान व्यापारी आखिर कानून की पकड़ से कबतक आँख मिचैली करते रहेंगे ?
सवाल झारखंड के पूर्व मुख्य मंत्री या भारत के दूरसंचार मंत्री के द्वारा किए गए घोटाले का नहीं बल्कि सच्चाई सामने आने का है और कोड़ा के अनुसार अगर और लोग इस घोटाले में शामिल हैं, तो सरकार को उन सभी को कानूनी शिकंजे में लाना चाहिए। फिर दूरसंचार मंत्री का आरोप कि राजग सरकार के निशुल्क बाँटे गए स्पेक्ट्रम से सरकारी खजाने को हुए एक लाख साठ हजार करोड़ के नुकसान की भी उच्चस्तरीय जाँच होनी चाहिए और दोषी को अवश्य सजा मिलनी चाहिए क्योंकि सरकारी उपक्रम मंत्रियों, नेताओं या नौकरशाहों की बपौती संपति नहीं जिसे जैसे चाहे, जब चाहे उसे निलाम कर दें या बेच डालें।
वस्तुतः सरकारी उपक्रम जनता की धरोहर है, जिसकी रक्षा करना नेताओं या नौकरशाहों का परम् दायित्व है लेकिन आजकल सरकारी उपक्रम को सरकार उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के नाम पर धड़ल्ले से जिस प्रकार औने-पौने दाम पर बेच रही है, स्पेक्ट्रम इसका एक उदाहरण मात्र है। इससे प्रतीत होता है कि जनता की संपत्ति की ये लोग ट्रस्टी के रूप में रक्षा नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी संपति की तरह उपयोग कर रहे हैं। यही नहीं दूसरे पर गलती थोपकर अपनी गलती से किसी को वरी नहीं किया जा सकता। लगता है भारतीय भ्रष्ट नेताओं, बेईमान पदाधिकारियों एवं चोर व्यापारियों के लालच एवं बेशर्मी से तंग आकर स्विस बैंको के एसोसिएशन के प्रमुख पैट्रिक ओडियर ने भी अपना सर शर्म से झुका लिया और कहा कि स्विटजरलैंड के बैंको में अब जमा करने वाले विदेशियों के बारें में विदेश में व्यक्तिगत कर संबंधी दायित्वों की सूचना मांगने के बारे में विचार किया जा रहा है, लेकिन स्विटजरलैंड सरकार के साथ जिस सरकार का द्विपक्षीय समझौता होगा, उसपर ही यह नियम लागू होगा।
- Arvind Panjiyara
NIRMAN SAMVAD
जब भारत जैसे देश को चावल - चीनी का आयात करने की आवश्यकता पड़ जाये। जब एक कृषि प्रधान देश में आत्महत्या करने वाले किसानों का आंकड़ा बढ़कर लाखों में पहुँच जाये। जब एक ओर बुंदेलखंड जैसे तमाम हिस्सों में भुखमरी का दौर चल रहा हो और दूसरी जगह कहा जाए कि यह हमारी सामयिक समस्यायें हैं जिन्हें सुलझा लिया जायेगा। क्या स्थिति इतनी ही सहज और सरल है?
किसानों की आत्महत्या का क्रम बरकरार है। खेती किसान के लिए घाटे का सौदा बन रही है। वह खेती करता है, क्योंकि वह कुछ और नहीं कर सकता है। वह जिन्दा है, क्योंकि मरा नहीं है। किसान उत्पाद का वाज़िब दाम न मिलने के कारण बहाल और सामान्य निम्नवर्गीय जनसंख्या खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्यों के चलते भुखमरी के कगार पर खड़ी है। खेती बिचौलियों के लिए लाभ का माध्यम बन गयी है। उच्चवर्ग तमाम प्रश्नों और समस्याओं से बेखबर। एक ओर सकल घरेलु उत्पाद में कृषि का कम होता योगदान और दूसरी ओर भुखमरी की विकराल होती समस्या।
समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। भूख एक वैश्विक प्रश्न बन गया है। सयुंक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट में वर्तमान वैश्विक खाद्य समस्या को भूख की एक शान्त सुनामी का नाम दिया है। रिपार्ट के अनुसार खाद्य समस्या के कारण लगभग 40 मीलियन लोगों को अपना भोजन कम करना पड़ रहा है तथा विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग छठवां हिस्सा भुखमरी की चपेट में है।
तीसरी दुनिया के तमाम देश भुखमरी की हृदय विदारक स्थिति में जीने के लिए अभिशप्त हैं।
जहां एक ओर दुनिया की लगभग 17 फीसदी आबादी भूखी है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की समस्या-समाधान के नाम पर चीन आदि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैव ईधन का शिगूफा छेड़े हुए हैं। गरीब देशों की आबादी भूखी सोने के लिए विवश है और अमीर देशों की जमात अपने आराम के लिए जैव ईंधन के उत्पाद के लिए लाखों टन खाद्यान्न को जला डाल रही है। रोज लाखों टन मक्के का इस्तेमाल जैव ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है।
यह तस्वीर आखिर क्या बयान करती है। यही नहीं तस्वीर के और भी रुख हैं। भारत के प्रख्यात रिसर्चर और लेखक देवेन्द्र शर्मा ने एक बातचीत के दरम्यान स्थिति को स्पष्ट करते हुए तस्वीर के ऐसे ही एक रुख की ओर इशारा किया था। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि विश्व में किसी भी प्रकार से अनाज की कमी नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी 6.7 अरब है, जबकि विश्व में कुल मिलाकर लगभग 11.5 अरब लोगों की जरूरत का अनाज पैदा हो रहा है। सच यह है कि विश्व का एक भाग अधिक खाद्यान्न का इस्तेमाल कर रहा है, यहां तक की खाद्यान्न का इस्तेमाल जैव ईंधन तक बनाने में कर रहा है, जबकि दूसरी ओर एक बड़ा हिस्सा खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। कमी खाद्यान्न की नहीं है बल्कि वितरण प्रणाली में कमी है। खाद्यान्न का विश्व में सही वितरण नहीं है। वैश्विक भुखमरी की समस्या से लड़ रहे तमाम वैश्विक संगठनों को यह सत्य स्वीकार करना होगा। खाद्यान्न वितरण पर कारपोरेट जगत तथा उच्च वर्ग के नियंत्रण को कम कर करके यदि खाद्यान्नों का पूरे विश्व में सही वितरण किया जाये तो भूख से यह जंग जीती जा सकती है।
-Amit Tiwari
News Editor
NIRMAN SAMVAD
शाम ढलते ही शमा जल उठती. परवाना शनैः-शनैः महफिल की ओर सरकता. घुंघरूं की बोलों में आमंत्रण होता. शमा-ए- महफिल के कद्रदानों की कमी नहीं होती. कोठों पर कद्र भी खूब था. ना लूट, ना खसोट.. बख्शिशों का सिलसिला थमता नहीं जब तक बलखाती वारांगना की कमर लचकती. अदा और अदावत का संगम बेहतरीन बनता. इन नाजनीनों का नखरा, श्रृंगार में तब्दील होता. सुरों में शाश्त्रीय संगीत का रस होता. सत्य था कि संगीत कंठों से निकलकर कोठों पर पहुँच गया. बावजूद सामवेद की ऋचाएं यूँ ही समझ की हद में आती.
पर आज सब कुछ बदला-बदला सा नजर आता है. कोठों से अब घुंघरू की आवाज सुनाई नहीं पड़ती. अब वहां से चीखें सुनाई पड़ती हैं.. लहूलुहान जिंदगी का आर्तनाद.. बदनाम गली की इस अँधेरी गुफा में मासूमों और बेसहारों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता...
मैं जी.बी. रोड पर इफ्तखार खान की चाय पी रहा हूँ. सामने खड़ी होती है सकीना. आगंतुक के इंतजार में थकी-थकी सी. जबरदस्ती प्रश्न करने के लिए मैं खड़ा था. . जी. बी. रोड के चहल पहल और कमाई के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा,‘‘यह भीड़ मेरे लिए नहीं है. इतनी दुकानें खुल गयी हैं. यहाँ मैं ही नहीं बिकती हूँ, यहाँ मोटर पार्ट्स और मशीनें भी बिकती हैं और जो ये तक-झांक वाले हैं, ये बिल्कुल ही छिछोरे हैं.
बेरोजगारी की स्थिति में ऐयाशी के लिए पैसा कहाँ? और जिनके पास पैसा है, वह यहाँ क्यों आयेंगे? हर गली-मोहल्ले में देह हाजिर है. घर ही कोठा हो गया. प्रोफेशनल को अब शारीरिक रिश्ते बनाने से परहेज कहाँ.
घरों में भी घुँघरू बजेंगे तो यहाँ कोई क्यों बीमारी खरीदे..’’
कोठा नं. 38 से 71 तक बासी जिंदगी पसरी हुई है. पहले पहाड़गंज के लक्कर बाजार में यह सब होता था. वहां का रेडलाईट एरिया अब कार्पोरेट एरिया में तब्दील हो गया है. जी. बी. रोड भी धीरे-धीरे बदनाम हुआ. शुरुआत में शहतारा गली के दादाओं की दादागिरी थी. उनकी मनमानी चलती थी. बगल में एक कॉलेज भी था. वहां के लड़के बहुत बदमाशी करते.
राजस्थान से लायी गयी पूनम बड़ी मुश्किल से बात करने के लिए तैयार होती है. वह बताती है कि,‘मात्र 10कोठों के पास लाइसेंस है, वो भी सिर्फ मुजरा के लिए. मुजरा तो केवल बहाना है. यहाँ वही होता है, जो अवैध है. कोई भी संगीत प्रेमी नहीं, सब शरीर प्रेमी हैं. मजबूरी में संगीत को साइड करके शरीर को सेल पर लगाती हूँ..’
हरिश्चंद्र कोठा की पहचान छीना-झपटी की नहीं है. वहां हाई प्रोफाइल लड़कियां हैं. आज यहाँ दलालों का मेला है. ग्राहक कम, दलाल ज्यादा है. पहले ग्राहक दलाल को खोजते थे, अब दलाल ग्राहक को खोजते हैं. कोई रिक्शा या अनजान आदमी जी.बी. रोड पर आया कि सब घेर लेते हैं.
यही रोज का किस्सा है.
-Vijayendra
Editor
Nirman Samvad
‘बड़े भाग मानुष तन पावा’ में गोस्वामी तुलसीदास देह की महिमा का बखान करते हैं. इस दुर्लभ देह के लिए देवता भी लालायित रहते हैं. तुलसीदास किसी स्त्री-देह या अन्य देह की बात नहीं कर रहे हैं. इस देह की दुर्लभता पर तुलसीदास ही नहीं बल्कि व्यापार भी कई अर्थगीत लेकर सामने आया. पहले दैहिक सुखों के लिए बाजार आवश्यक था, अब बाजार के लिए देह आवश्यक हो गयी है.
अब देह, बाजार में है. बाजार देह का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा है. विज्ञापनों में, स्वागत में, हर ओर देह ही देह है. देह के बिना ना कोई विज्ञापन आगे बढ़ रहा है, ना ही तकनीक. आज हम देह-युग में जीने को अभिशप्त हैं. इसी देह-बोध से यह युग-धर्म संचालित है. धर्म हो या अर्थ, देह के बिना ना तो कोई मोक्ष देखता है, ना ही कोई दिखाता है.
देह को लेकर सदियों से संघर्ष होता आ रहा है. जमीन कम, जोरू के लिए ज्यादा ही जंग लड़े गए इस जगत में.
मेरे इस देह-गीत का लय केवल स्त्री-देह से जुड़ा हुआ नहीं है. आज देह-व्यापार का मायना बदल गया है. वेश्या यानि सिर्फ स्त्री नहीं, अब तो पुरुषों ने भी इस क्षेत्र में दखल दे दिया है. पुरुष वेश्या या वेश्या...
देह-व्यापार पुनः नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध के विमर्श से बाहर निकल, एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है.
इसी देह-बल पर साम्राज्यवाद आगे बढ़ा. साम्राज्य और संसाधन का विस्तार बाहु-बल के बिना कैसे संभव था? भौगोलिक साम्राज्यवाद के विस्तार का आधार था ही देह-बल. इसे नकारना तब भी संभव नहीं था.
आज आर्थिक साम्राज्यवाद का दौर है. इस दौड़ ने अराजक-भोग की ओर मानवी सभ्यता को धकेल दिया. यह मानवी-सभ्यता अनैतिकता और अवैधानिकता की दीवार तोड़ डालने की स्थिति में पहुँच गयी है. वेश्या, स्त्री हो या पुरुष सभी देह बेच रहे हैं. केवल बिपाशा ही नहीं सलमान, जॉन और अन्य खान की भी देह उघड़ रही है. इनकी नंगी होती छाती बाजार को बल प्रदान करने में लगी है. सौन्दर्य बेंचें या शरीर, सभी वेश्यावृत्ति का ही हिस्सा तो है. जिस द्रौपदी को दुशासन निर्वस्त्र नहीं कर सका, वह काम तो महज एक साबुन की टिकिया ‘लिरिल’ कर दे रहा है.
सोचना यही है कि इस देह का क्या करना है? इसे बाबु जी की सेवा में लगाया जाय, बाबा की भक्ति में झोंका जाए, बाजार के हवाले किया जाय या फिर विज्ञापन की उघड़ती दुनिया के वश में कर दिया जाय?
वैसे संस्कृति, सभ्यता, समाज, परिवार के नाम पर देह का खुदरा व्यापार तो हो ही रहा है. निजाम कल का हो या आज का, इनका इंतजाम बिना स्त्री-देह के कैसे पूरा हो सकता है? चाहे नाम जो हो, देह का इस्तेमाल जारी है. तवायफ का डायलॉग याद है ना? घोषित और अघोषित, हर स्त्री वेश्या की ही तरह है. असुरक्षा और मजबूरियों के बीच स्त्री की इच्छा और अनिच्छा का स्पेस ही कहाँ है?
बाजार में पुरुष दर पुरुष की यात्रा में लहूलुहान जिंदगी के भीतर की दास्ताँ क्या है? कौन इसे पढ़ना चाहेगा? कौन इनके जख्मों को सहलाएगा?
शायद कोई नहीं.....
-Vijayendra
Editor
Nirman Samvad