खेद इस बात का है कि स्वयं स्त्री इस भ्रम में खोकर स्वयं को भूल चुकी है। आज उसे भी सम्पूर्णता नहीं, समानता की इच्छा है। सर्वाधिक चिंताजनक पहलू ये है कि जिस स्त्री की सहनशीलता, सहजता, सौम्यता, शील और स्नेह उसकी पूर्णता के द्योतक थे, आज वही स्त्री इन गुणों को अपनी हीनता मानते हुए, तन,मन,धन से इस अधूरे पुरुष की समानता का प्रयास कर रही है। यह निश्चय ही समाज को पतन की ओर ले जाने वाला होगा।
स्त्री का पुरुष के समान होने का प्रयास पुरुषवाद को बढ़ावा देने जैसा ही है। पुरुषवादी मानसिकता का लक्ष्य ही स्त्री को पुरूष कर देना है। पुरूष उसके स्त्रीत्व की लक्ष्मणरेखा को छू सकने का सहस भी नहीं कर सकता; परन्तु जब स्त्री स्वयं उस लक्ष्मणरेखा को पार करके पुरूष बनने का प्रयास करने लगती है तब वह उस पुरूष के लिए सहज प्राप्य हो जाती है। पहले पुरूष छल से स्त्री को उस रेखा से बाहर लाने का प्रयास करता था, परन्तु अब स्त्री अनजाने ही स्वयं को छलकर, अपने भीतर के स्त्रीत्व को मारकर उस रेखा के बाहर आ रही है।
मामला सिर्फ़ स्त्री के साथ होने वाले बलात्कार का नहीं है, उसे जींस-टॉप पहनाकर पुरूष समाज द्वारा उसके साथ किए जा रहे इस छ्लात्कार का भी है। समानता के इस छद्म अभियान से पुरुषवाद की समाप्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जिसकी नकल की जाती है वह स्वयं मानक बन जाता है।
पुरुषवाद को समाप्त करने के लिए स्त्री का पुरूष होना आवश्यक नहीं है, वरन स्त्री का स्त्री हो जाना ही पुरुषवाद को सच्ची चुनौती है।
-- Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.
ममता बनर्जी ने रेल बजट पास किया। बजट में ममता का ममत्व छलक रहा है, ऐसा मीडिया का भी कहना है।
हर बजट सुविधा और थोडी असुविधा लेकर आता है। हर बजट मिश्रित प्रतिक्रिया बटोरता है। इस बार भी पक्ष ने बजट को जनोन्मुखी बताया, तो विपक्ष ने जनविरोधी कहा।
बजट में क्षेत्रीय संतुलन की अपेक्षा खंडित होती रही है। ललित नाथ मिश्र, राम विलास पासवान, दिग्विजय सिंह, नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव बिहार से जुड़े रहे है, इन्होने अपने बजट में बिहार का विशेष ख्याल रखा। उनके कार्यकाल में अन्य प्रान्तों की उपेक्षा का सवाल उभरा।
निःसंदेह ममता बनर्जी का व्यक्तित्व बेदाग है। अन्य मंत्रियों की तरह किसी गबन का आरोप नहीं है। न ही रेलवे में ठेकेदारी या अन्य खरीदारी पर पैसा वसूलने का आरोप। पर बंगाल में आसन्न चुनाव का भूत अवश्य इस रेल बजट पर सवार रहा है। ममता बनर्जी के रेल मंत्री बनने और बनाने के कई निहितार्थ हैं। सिंगूर, नंदीग्राम और फ़िर लालगढ़ के संघर्ष से वामपंथ की मिट्टी पलीद हो रही है। वामपंथ की सरकार लगातार हारती जा रही है। लोकसभा चुनाव में वामपंथ की अर्थी निकली ही, रही सही कसर स्थानीय निकाय के चुनाव में निकल गई।
बंगाल वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है। कांग्रेस एवं अन्य पार्टियाँ हासिये पर रही हैं। ममता बनर्जी ने लोहा लिया, तृणमूल कांग्रेस वास्तव में ग्रास रूट की पार्टी बन गई। वहां हवाई राजनीति चल भी नहीं सकती थी। केवल लफ्फाजी एवं भावनात्मक मुद्दों पर बंगाल को घेरना मुश्किल था। ममता बंगाल के आगामी चुनाव की चिंता में हैं। वामपंथ के ताबूत में अन्तिम कील ठोकने के लिए ममता तैयार हैं। इस कारण इस रेल बजट में अगर चुनावी आहट सुनाई पड़ रही है, तो स्वाभाविक ही है।
अच्छी-अच्छी घोषणाएं तो हर रेल बजट में होती रही हैं, पर परिणाम क्या आया ये रेल और रेल स्टेशनों को देखकर लगाया जा सकता है। बजट में पैसा कितना बढ़ा या कम हुआ ये मायने नहीं रखता, मायना ये रखता है कि हर बजट के बाद परिणाम क्या आया? वाजिब पैसा देने के बाद भी व्यक्ति भेड़-बकरी की तरह यात्रा कर रहे हैं। भाई! यह कौन सा बिज़नस है कि होटल में पैसा दें और खाना भी न मिले। यदि यात्री से पैसा लेने के बाद भी आपके पास जगह नहीं है तो बेहतर है कि आप पैसा लें ही न। स्लीपर का किराया लेने के बाद भी यात्री को सीट न देना, यह घोर अन्याय और अपराध है रेलवे का।
लालू रेल-मुनाफा का ढिंढोरा तो पीटते रहे, मगर किसकी कीमत पर? पैसेंजर के साथ जानवर सा सलूक करके!ममता को बजट में ममता दिखाने की जरूरत नहीं है, पैसेंजर उनकी दया का पात्र नहीं है। वह वाजिब पैसा देता है, उससे उचित सुविधा पाने का अधिकार है।
हर रेल मंत्री अच्छी छवि के लिए अच्छी घोषणाएं करता है। मगर छवि का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता। रेल अपने मानकों पर खरी हो, यह किसी भी रेल बजट का जरूरी हिस्सा है। वोट बैंक बनाना भी राजनीति की जरूरी जरूरत है, पर देश को समग्रता में देखना भी उतना ही जरूरी है।
ममता बनर्जी बंगाल की नेता जरूर हैं, मगर बंगाल की रेलमंत्री नहीं! आशा है अगले बजट में ममता पूरे देश का रेल बजट पेश करेंगी न की सिर्फ बंगाल का।
--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.
रेल बजट पास हुआ । आम बजट भी पास हुआ। दोनों बजट में बिहार की घोर उपेक्षा हुई । बिहार केन्द्र के व्यव्हार से दुखी है । पिछले साल की बाढ़ की तबाही जगजाहिर है । आज तक केन्द्र ने पैकेज नही दिया, जो दिया वह वापस मांगने के लिए बेचैन है ।
इस नाइंसाफी के खिलाफ एकजूट होने के बजाय नेता एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे है । नीतीश, ममता बनर्जी के सुर में सुर मिलाकर बिहार का क्या भला करेंगे? नीतीश ,लालू और रामविलास तीनो ही रेलमंत्री रह चुके है । सबों का काम जनता के सामने है ,व्हाइट पेपर निकाल कर ही बिहार को क्या मिल जाने वाला है ।
इस बकबास के बजाय बिहार के व्यापक भविष्य के साझा संघर्ष का कार्यक्रम बनाना चाहिए । सूबा प्यारा है कि सत्ता प्यारी है? इस स्थिति में इन नेताओं का चरित्र उजागर हो जाएगा । नीतीश को इस दिशा में पहल करनी चाहिए । सी.एम्. के नाते उनका यह दायित्व भी बनता है । नीतीश लालू को ही जवाब देने के लिए पैदा नही हुए है , उन्हें तो बिहार की जनता को जवाब देना है । लालू को भी कांग्रेस की गुलामी करने के बजाय अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। वरना वक्त इनको हासिये पर कर देगा। "रहा न कुल कोई रोवन हारा", सभी लोग इनका साथ छोड़ ही रहे हैं कल कोई भी साथ नही होगा । बस पति पत्नी मिल कर पार्टी चलाते रहेंगे ।

भाजपा की हार जितनी चर्चा में नहीं है, उस से ज्यादा चर्चा भाजपा की हार की समीक्षा की हो रही है। विगत लोकसभा चुनाव में पार्टी ने चुनाव जीतने के बजाय जनता को भड़ास निकालने का मौका शायद ज्यादा दिया। जनता ने भड़ास निकाला। पार्टी के चुनाव जीतने के सपने टूटकर बिखर गए। अब पार्टी अपने नेताओं को अपनी भड़ास निकालने का मंच मुहैया करा रही। आक्रोश नेताओं का इतना गहरा है कि इस मंच से भी नेताओं को संतोष नहीं मिल रहा है। मंच के बाहर भी मीडिया में अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं। यशवंत सिन्हा ने तो इतना पत्र लिखा कि पार्टी बौखला गई। विनय कटियार, जसवंत सिंह, नकवी और शाहनवाज के मौन पिघल रहे हैं। भला पार्टी की कमान सँभालने वाले संघ के आलाकमान कैसे चुप रहते? उन्होंने धमकी दे दी कि पार्टी की हिम्मत है तो हिंदुत्व छोड़कर दिखाए। पार्टी न तो संघ की विश्वासी बन पा रही है, और न ही नेता और जनता की। पार्टी की दशा कटी पतंग जैसी हो गई है।
यशवंत सिन्हा कह रहे हैं कि पार्टी अपने लक्ष्य को स्पष्ट करे। सेकुलर बनना है तो सेकुलर बन जाए या धार्मिक पार्टी बनना है तो वो भी तय हो जाए। दो नावों की सवारी में पार्टी का डूबना तय है।
वे कह रहे हैं कि जिनकी रणनीतियां बेकार हुई हैं, तो फ़िर ऐसे नाकारा नेता को पुनः सम्मान क्यों मिल रहा है?
नकवी और शाहनवाज, वरुण गाँधी के बयान को पार्टी की हार का कारण बता रहे हैं। वरुण गाँधी के बयान से पार्टी कबड्डी खेलती रही। जनता ने तत्काल भाजपा की ड्रामेबाजी को भांप लिया और पार्टी को औकात बता दी।
राम के नाम पर वोट लूटते रहे, कभी 'राम-मन्दिर' तो कभी 'राम-सेतु'। मेरा तो मानना है कि हिंदुत्व की जितनी क्षति गजनी और गौरी ने नहीं की उस से ज्यादा तो भाजपा ने कर दिया। हिंदुत्व अगर मजाक बन रहा है तो उसकी सारी जिम्मेदारी भाजपा की है। गजनी और गौरी मन्दिर तोड़कर संसाधन लूटते रहे तो भाजपा मन्दिर बनाकर सत्ता लूटना चाहती है। गजनी और वरुण गाँधी में चरित्रगत कोई अंतर नहीं है। मुसलमानों के बिना भाजपा कहाँ ठहरेगी? जहाँ-जहाँ मुस्लिम आतंक बढ़ा, वहां-वहां भाजपा मजबूत होती गई। यानी इनके तेज़ विस्तार के लिए मुस्लिम आतंक जरूरी है। गजनी और गौरी ना सही, उनकी औलाद पाकिस्तान ही आतंक फैलाता रहे यहाँ।
मुंबई पर आतंकी हमले के बाद मैंने एक रिक्शाचालक को कहते सुना 'इस आतंकवादी घटना से भाजपा को चुनावी फायदा होगा।' उस बात को समझने कि कोशिश में मुझे लगा कि क्या भाजपा की वृद्धि के लिए आतंकी हमले जरूरी हैं?
पार्टी को भी पता है और उसके नेता को भी कि भड़ास निकले या ना निकले, पार्टी वही सब करेगी जो संघ चाहेगा।
महाभारत में कृष्ण, अर्जुन को समझा रहे हैं "किस को मार रहे हो? यहाँ तो सब पहले से ही मरे हुए हैं."यहाँ भी संघ अपना विराट रूप वक्त-वक्त पर दिखाता रहता है कि भड़ास निकालने से क्या होगा? होगा वही जो संघ चाहेगा।
संघ ने भाजपा रुपी घोड़े को छोड़ा है, मगर लगाम अभी भी उसके हाथ में है।
--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.
जूली की जिगर की आग से इश्क की बीड़ीयां तो जल सकती हैं, पर इस दौर-ए-सियासत का अँधेरा नहीं मिट सकता....

मटुकनाथ को आप जानते होंगे? पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर!! ये गुरु जी ऐसे निकले कि अपनी चेली 'जूली' के प्रेम में जज्बाती होकर उस से ब्याह रचा लिया. ब्याह के बाद 'गुरु' जी लुव-गुरु' बन गए. नई पीढी में काफी लोकप्रिय भी हुए . सबों ने खूब मजा भी लिया. न्यूज़ चैनल के वो मानों सेलेब्रिटी बन गए.
नाम क्या हुआ कि उन्होंने अपनी पार्टी ही बना ली और पार्टी का नाम दिया- प्रेम पार्टी. इसी पार्टी के बैनर पर मटुकनाथ लोकसभा चुनाव में पटना से चुनाव भी लड़े. उनकी प्रेम पार्टी हार गयी.
हाल ही में दैनिक जागरण में छपी खबर से पता चला कि वे पार्टी के विस्तार के लिए गतिविधि तेज़ कर रहे हैं.
मटुकनाथ शायद हिंदी के प्रोफेसर हैं. अपने किए को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए अपने तर्क तो तलाशते हैं और अपने पक्ष में तरासते भी हैं.
प्रेम के नाम पर जो कुछ वे कह रहे हैं या कर रहे हैं, वह समझ से परे है. मेरी समझ में प्रेम किसी व्यवस्था का नाम नहीं है. तरकीब से तंत्र का निर्माण हो सकता है, प्रेम का नहीं.
दांपत्य जीवन एक व्यवस्था है, समझौता है. दांपत्य जीवन एक तंत्र है, प्रेम का मन्त्र नहीं. मटुकनाथ का प्रेम उसी दिन मर गया जिस दिन उन्होंने शादी की. व्यवस्था प्रदान की. व्यवस्था गुलाम बनाती है, बांधती है,मुक्त नहीं करती. गुलामी चाहे सम्बन्ध की हो या स्वर्ग की, गुलामी तो गुलामी ही है.
जिस बिस्तर पर व्यवस्था या विचार पलता हो, वह बिस्तर,बिस्तर नहीं अर्थी बन जाता है. अर्थी श्मशान जाने के लिए होती है, घर में सजाने के लिये नहीं. अर्थी को जला डालना होता है और श्मशान की लपटें मशालें नहीं बना करतीं.
बुद्धि या विचार से दुनिया में व्यवस्था बन सकती है, पर विश्वास नहीं. विश्वास का माहौल तो भावना से ही तैयार होगा. समाज खड़ा होगा भाव और विश्वास के बल पर, बुद्धि के बल पर नहीं.
मटुकनाथ को प्रेम से कोई लेना-देना नहीं, ना ही इसकी गरिमा को वे समझ पा रहे हैं. वे तो भोगवाद को ही सम्बन्धवाद की संज्ञा दे रहे हैं.
मटुकनाथ ने प्रेम के नाम पर प्रेम-पार्टी बना ली है. चर्चित ही होना था तो पार्टी का नाम गे-पार्टी हो सकता था. अखिल भारतीय होमोसेक्सुअल पार्टी भी नाम हो सकता था. बने बनाये कार्यकर्ताओं का समूह भी मिल जाता. जंतर-मंतर पर भीड़ का जुगाड़ यूँ ही हो जाता. तालियाँ भी खूब मिलतीं.
मैं मटुक नाथ जी का मजाक नहीं उड़ना चाहता. लोग मुझपर दुत्कारेंगे कि मैं ऐसे प्रेम पुजारी को क्यों लताड़ रहा हूँ? मगर मटुकनाथ जी "प्रेम न बारी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय" ये पंक्ति आपने भी पढाई होगी जुली समेत कई शिष्यों को, फिर राजनीति की मण्डी में प्रेम को क्यों बेचना चाहते हैं?
यौवन के उतार में घटित प्रेम, आपकी दमित वासना नहीं तो और क्या है? साथ-साथ रहने से पैदा हुई भावना को प्रेम कहना ठीक नहीं. मटुकनाथ की वासना समाज की प्रार्थना कैसे बनेगी?किसी बड़े कारन के लिए ये विरह या बनवास झेलते तो शायद उनकी विरह की अग्नि में तपी-गली वासना समाज के लिए प्रार्थना बन जाती!
'हिंदुत्व' सवाल नहीं, समाधान है। 'जीव', 'जगत' और 'जगदीश' को जीने और उनके अंतर्संबंधों को समझने का नाम है 'हिंदुत्व'। 'हिंदुत्व' मात्र मनुष्य केंद्रित अवधारणा नहीं है, इसमें संपूर्ण चराचर जगत का हित समाया हुआ है। हाँ, भाजपा का कथित हिंदुत्व एक सवाल अवश्य है। हिंदू- समाज के भीतर के अंतर्विरोधों को समाप्त करने के लिए कोई संगठन या पार्टी आगे आए तो स्वागत करना चाहिए। परन्तु यदि 'हिंदुत्व' को कोई सत्ता प्राप्ति का औजार बनाये, तो दुर्भाग्य है। भाजपा के लिए हिंदू एक वोटर लिस्ट भर है।' राम-भरोसे ' पार्टी के लिए ' राम-सेतु' सिर्फ़ 'वोट-हेतू' है। हिंदू-समाज को भरमाने का यह खेल समाप्त होना चाहिए और अब तो जनता ने भी हिंदू-ड्रामा को नकार दिया है। सत्य यही है कि भाजपा न ' जिन्ना' का हो सकी ना ' जगदीश ' का ।
--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

बाज़ार सुन्दर होता है। दूध सी धुली चांदनी बाज़ार को आकर्षक बनाती है। बाज़ार की सुन्दर सजावट का सम्मान मैं भी करता हूँ, निश्चय ही आप भी करते होंगे। बदसूरत होकर बाज़ार कोई नहीं जाना चाहता। बाज़ार के सौंदर्य का सम्मान हो, इसके लिए आधुनिक और अत्याधुनिक परिधानों में सजकर जाते हैं लोग वहां। होंठों पर कैसी- कैसी मुस्कुराहटें और उनके कैसे-कैसे रंग......!!
हाँ, तो मैं कबीर की चर्चा कर रहा था। कबीर क्यों बाज़ार गए हैं? क्या खरीदने गए हैं? उन्हें जो चाहिए वो हाट में उपलब्ध नहीं है; "प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय....." कबीर बाज़ार गए हैं मशाल लेकर... वे कह रहे हैं -"कबीरा खडा बाज़ार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारो आपनों चलो हमारे साथ..."
कबीर की विचित्रता भी बड़ी विचित्र है। क्रांति करने के लिए कुरुक्षेत्र जाते, कनाट प्लेस क्यों आ गये? मशाल तो वे कहीं भी जला सकते थे!! और कोई जगह नहीं मिली उन्हें?!! 'ठगनी तू क्या नैन चमकावे..... ।' ठग , ठठेरा और उसका मुनाफा.... भ्रम ही भ्रम...!कबीर को भरमाने वाली हर चीज बेकार साबित हुई। कबीर के सामने जाकर वे चीजें स्वयं में बिखरती चली गयीं।
याद, बचपन में अगर कोई किसी को बाजारू कह दे, तो वह व्यक्ति अपमानित महसूस करता था। बाज़ार स्वयं में एक गाली थी। बाज़ार प्रीति, मैत्रीभाव और संवेदना बटोरने और बिखेरने के लिए नहीं खडा होता। भगवान का महत्त्व इतना भर रहा बाज़ार में, कि -'साल भर तौल कम, सावन में बोल बम।' अध्यात्म और बाज़ार का सम्बन्ध ३६ का रहा; भले ही धर्म आज अपने आप में उद्योग बन गया हो और बाबा कारपोरेट बन गए हों।
भारत बाज़ार प्रधान देश नहीं, धर्म प्रधान देश था। बाज़ार था, पर धर्म से नियंत्रित। "साईं इतना दीजिये....." का सयाना आज जैसा तो कम से कम नहीं ही था। आज सयाना वही जो दोनों हाथों से लूट रहा हो।
शुभ-लाभ.... । हमें लाभ चाहिए था, पर शुभ पहले था। 'शुभ' लाभ के केंद्र में था। 'शुभ' और 'श्रम' का सम्मान तो कबीर भी करते थे। आज के पेटलद्धे साधू की तरह स्वादू नहीं थे वे। 'त्येन त्यक्तेन भुंजीथा' की बात तो करते हैं, पर वे अभिव्यक्ति से बहार नहीं निकल पाते। आज बाज़ार केवल आर्थिक अभिव्यक्ति ही नहीं रहा, अपितु जीवन के समग्र क्षेत्र को यह प्रभावित कर रहा है। साहित्य, सम्बन्ध और संवेदना सब बाज़ार नियंत्रित हो गए हैं। इस उफनते बाजारवाद पर लगाम लगाना आसान नहीं है। हर मनुष्य के भीतर में एक बाज़ार स्थापित है, फिर बाहर के बाज़ार को कैसे हराना संभव होगा? बाहर की चमकती दुनिया मनुष्य के भीतर की ही अभिव्यक्ति है।
भागवत अंतःकरण की आवश्यकता पर कबीर जोर देते हैं। तमाम दुखों के मूल में मनुष्य की अपनी ही चेतना और चिन्तन हैं। सदियों पहले कबीर बाज़ार जाते हैं। संसार की नश्वरता पर बात करते हैं। 'रहना नहीं देश वीराना है, यह जीवन कागद की पुड़िया, बूँद पड़े गल जाना है...' ईश्वर की इस बेहतरीन दुनिया को कबीर बनाये रखना चाहते हैं। अपनी चुनर में दाग वह नहीं लगने देना चाहते हैं। 'जस की तस धर दीन्हीं चदरिया....' की बात दुहराते हैं। कबीर बाज़ार में भागवत कर रहे हैं, मगर भागवत का बाज़ार नहीं चला रहे। कबीर बाज़ार जाकर क्रांति की परिभाषा गढ़ आये। '....जो घर जारो आपनो, चलो हमारे साथ...' परिवर्तन की शुरुआत प्रथम पुरुष एकवचन से ही होती है। बाजारवाद के हाथों नीलाम जगत शायद जाग्रत हो जाये!!
आइये खोजें, 'कबीर बाज़ार में कहाँ खडा है'??!!
-- Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

सरयू बह रही है। सृजन के संगीत का स्वर इसकी कल-कल धारा से सुनाई नहीं पड़ता। इसके किनारे किसी राम के जन्म की किलकारियां नहीं गूंजती। सरयू में अब विध्वंस का शोर है। कभी मन्दिर टूटने का, तो कभी मस्जिद टूटने का। सामासिक संस्कृति की जलती चिता का धुआं ही चारों ओर दिख रहा है। राख में तब्दील हो रही गंगा-जमुनी संस्कृति के विलाप को देख-सुन, सरयू विवश है.....।
अली और बली के दुश्मनों ने मन्दिर तोड़ा, फ़िर मस्जिद तोड़ा। हिंदू और मुसलमानों के लहू से लाल होता रहा सरयू का पानी .......।
इधर राम का मुद्दा पुनः १७ बरस बाद राजनीतिक वनवास से वापस लौटा है।राम वोट दिलाऊ हैं या नहीं? विचार होने लगा। राम को छोड़ दें या पकडें? यह चर्चा शुरू हो गई। मंदिर छोड़ महासेतु की ओर बढ़ गए। रामधारी पार्टी के नेता जिन्ना के यहाँ भी हो आये । रामरथ पर सवार पार्टी सत्ता तक नहीं, सत्ता के करीब तक तो पहुँची मगर राम के किस काम का? पार्टी राम-मंदिर के नाम पर सहमति तक नहीं बना पाई। इस दिशा में कहीं कोई प्रयास नहीं हुआ।
अब लिब्राहन समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक होने को है। रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी जा चुकी है। फिर से सरयू के पानी में उबाल आने वाला है। अख़बार के पन्ने रंगने लग गए हैं। मरा हुआ हर तंत्र जिन्दा होने लग गया है
इधर सरयू का पानी बहुत बह चुका है, परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। कारसेवकों के दुलारे कल्याण वर्तमान में मुल्ला-मुलायम के साथ हो लिए। उमा-गोविन्द का रामधुन अलग चल रहा है। ऋतंभरा का चिल्लाना बंद हो गया है। वह अपने धर्म उद्योग में लग गयी हैं। महावीर मोदी, राम पर भारी पड़ रहे हैं। तोगडिया का त्रिशूल अब कोई पकड़ नहीं रहा है। कटियार भड़ास निकाल रहे हैं। निठल्ले साधू उदास बैठे है।
पर अब राम मंदिर निर्माण का दूसरा अध्याय शुरू होने वाला है। मामला केवल कमंडल या त्रिशूल चमकाने का नहीं है, बल्कि मंदिर विरोधी नेता को भी अपनी खोई जमीन हासिल होगी। कांग्रेस का जनाधार बढेगा; मुस्लिम महत्वपूर्ण हो जायेंगे। लालू, भाजपा को लेकर नीतीश को घेरेंगे। अगर भाजपा नेता जेल गए,तो भाजपा जीवित हो जायेगी; और भाजपा-विरोधी की स्थिति भी सुधर जायेगी। खेल अब भाजपा और कांग्रेस के बीच है। क्षेत्रीय दल यूँ ही हासिये पर जायेंगे। कांग्रेस अगर लिब्राहन समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने में ईमानदार नहीं रही तो बेशक भाजपा मजबूत होगी। फिर देश साम्प्रदायिकता की अग्नि में झुलस जायेगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस की होगी।
अमेरिका पञ्च बनने के लिए इंतजार कर रहा है। आतंकवाद के नाम पर एशिया में दखल बढ़ी ही है; अब भारत भी उसके निशाने पर है।
-- Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

बुद्ध, कबीर और अम्बेडकर मूर्ति पूजा के खिलाफ थे। मूर्ति पूजा मनुवाद को स्थापित करता है; धर्म के मूल तत्व से समाज को दूर करता है; पाखंड को पैदा करता है ;आदि- आदि बातों को स्थापित करने में जीवन पर्यंत लगे रहे। इसी विचार- रथ पर सवार होकर कालान्तर में कांशीराम ने दलितों और वंचितों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। सुश्री मायावती उन्हीं पूर्व वर्ती चिंतकों का नाम भुनाकर सत्ता प्राप्त करती रहीं। इस बार यूपी विजय ने उसकी महत्वाकांक्षा को और ही हवा दी। माया का हाथी दिल्ली की ओर चल पड़ा। पर क्या हुआ? इस हाथी को न तो दिल्ली ने चारा दिया और न ही अन्य किसी प्रान्त ने। यहाँ तक की राजस्थान ने भी हाथी को नकार दिया। राजस्थान विधानसभा पहुंचे बहुजन विधायक ने हाथी की सवारी छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया। पूरी की पूरी पलटन ही साफ़ हो गई। बहुजन समाज पार्टी मनहूस ही नहीं जनहूस भी हो गई।
उत्तर प्रदेश में भी जनाधार निरंतर खिसकता जा रहा है। माया का दलित प्रेम राहुल गाँधी के दलित प्रेम के सामने बौना पड़ता दिख रहा है। माया लाख चिल्लाये की "राहुल दलित के हाथ का पानी पीने के बाद रात को स्नान करता है, राहुल का दलित प्रेम छलावा है, आदि-आदि...."। पर दलितों ने माया की बात अनसुनी कर दी और कांग्रेस को मजबूती प्रदान की।
कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने दलितों को उचित सम्मान भी दिया, पर मायावती ने बगल में किसी दलित को बैठने तक नहीं दिया। माया का सारा व्यवहार किसी सामंत से कम नहीं रहा। मायावती नव-ब्राह्मणवाद की अवतार बन चुकी हैं। माया की नगरी में लूट का तांडव मचा है। मायावती अब चंदावती में तब्दील हो गई हैं। किस लिए चंदा चाहिए? स्कूल खोलने के लिए या अस्पताल खोलने के लिए? दलित कल्याण के लिए अगर चंदा बटोरती तो हर पाप क्षम्य भी था।
पैसा बटोर कर या तो मूर्ति बना रहीं हैं या पार्क बना रहीं हैं। पुराने राजे-राजवाडे जिस तरह से राजकोष का दुरुपयोग मीनार बनाने में, मीना बाज़ार सजाने में करते थे; वैसा ही काम दलितों की महारानी माया कर रही हैं।
माया या अम्बेडकर की मूर्ति लेकर दलित क्या करेगा? माया की मूर्ति चाट कर दलितों का पेट भरने वाला नहीं है। मूर्ति ही बनवानी है तो अयोध्या में राम की मूर्ति बनवा दें। अभी तो सतीश मिश्रा ही खुश हैं , इसके बाद तो पूरा ब्रह्मण कुनबा ही साथ हो चलेगा।
माया का यह नाटक मूलतः बुद्ध और अम्बेडकर के खिलाफ है। इस मूर्ति के पीछे पैसा बटोरना और अपने नाकारा और निठल्लेपन को छिपाना भी है।
लालू,राम विलास ने जिस तरह पिछडे और दलितों के नाम पर अपनी सुविधा का ख्याल किया, जनता ने इन्हे अपनी औकात बता दी। इस माया से मुक्ति बहुजन समाज को लेना ही पड़ेगा। ध्यान रहे की यह समाज मूर्ति भंजकों का भी रहा है।
--Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.



