

आदमी जन्मना शुद्र होता है. सभी के आने का मार्ग तो एक ही है...
प्रश्न यह है कि हम कर्मना क्या बन रहे हैं?
कृष्ण का जन्म किसी देवकी से नहीं हो सकता, न ही राम का जन्म किसी कौशल्या के गर्भ से होता है.
"यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे"
हर पिंड का अपने हिस्से का ब्रह्माण्ड होता है. यह पंक्ति सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सद्धान्तिक और व्यवहारिक सभी रूपों से सत्य है.
हर व्यक्ति के अंदर एक कृष्ण है, एक राम है, एक चोर नेता भी है और एक भरा पूरा बाज़ार भी...
बाहर की हर अभिव्यक्ति हमारे भीतर ही मौजूद है.
बाज़ार को मारना है, तो अपने भीतर के बाज़ार को ख़त्म करना होगा. जब तक हम अपने भीतर के बाज़ार से नहीं लड़ सकते, बाहर के इस छलिया बाज़ार से लड़ने की कल्पना भी निरर्थक है.
परदे पर यदि हमें मल्लिका उत्तेजित कर रही है तो इसका सच यही है कि वह कहीं गहरे में हमारे मन के अंदर बसी हुई है. बाहर कोई मल्लिका नहीं है उस परदे पर, वहां तो सिर्फ रौशनी का खेल है.
यही खेल बाज़ार का भी है. हमारे भीतर एक भरा पूरा बाज़ार बसा हुआ है, किसी के अंदर गाँव के मेले जितना बड़ा बाज़ार है तो किसी के अंदर फाइव स्टार मॉल जैसा बाज़ार. मगर है सब कुछ सबके भीतर ही.
नेता तो लाखों-करोणों लोगों का मसीहा बनता है, अगर उसने इसके लिए पांच दस लोंगो को मार दिया तो क्या गलत किया? बल्कि मैं तो कहता हूँ हमारे अपराध को देखते हुए तो उसके सौ खून भी माफ़ हैं!
जब तक हमारे भीतर का चोर नेता नहीं मर जाता हमें करोणों लोगों के उस नायक को गाली देने का कोई अधिकार नहीं है.
जब तक हमारे भीतर का साम्राज्यवाद नहीं मरता, तब तक अमेरिका के साम्राज्यवाद के विरुद्ध बोलना बेकार है.
जब तक हमारे भीतर जाति जिन्दा है, राष्ट्रभक्ति की बात संभव ही नहीं है.
तमाम बाहर की बुराइयों से जंग लड़ने से बेहतर है कि हम अपने भीतर की गन्दगी को साफ़ कर लें.
मैं कोई विज्ञापन नहीं कर रहा हूँ..यह एक प्रख्यात कंडोम कम्पनी द्वारा दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे एक विज्ञापन की पञ्च लाइन है. मैं आश्चर्य में हूँ कि आखिर इस पंक्ति का अर्थ क्या है?
क्या आदमी कुत्ते से भी गयतर हो चुका है, कि उसे पता ही नहीं कब, क्या हो जाए? कहते हैं कि कुत्ते का भी एक मौसम होता है, मगर लगता है कि आदमी बारहमासी कुत्ता हो चुका है!
फिर हम हल्ला मचाते हैं एड्स का. अरे ऐसे में एड्स नहीं तो क्या प्यार फैलेगा??!
आखिर हम किस संस्कृति की और बढ़ने के प्रयास में हैं? एड्स का हौव्वा है क्या?
सच तो ये है कि यहाँ नाको(राष्ट्रिय एड्स नियंत्रण संस्थान) के माध्यम से एड्स को रोका नहीं फैलाया जाता है!!! एड्स को रोकने का ये कैसा प्रयास है जो सरकार 'कंडोम' के रिंगटोन के जरिये करने का प्रयास कर रही है?
एड्स किसी कंडोम के इस्तेमाल से नहीं रुक सकता, न ही ए.आर.टी. के इस्तेमाल से.
एड्स को ख़त्म करना है तो जरूरी है कि सरकार ये हवाई विज्ञापन बंद कर के कुछ जमीनी कदम उठाये जो भारत की तासीर के हिसाब से हो.
इस सम्बन्ध में यह पंक्तियाँ बहुत ही प्रासंगिक हैं--
'हर तरफ शोर है, एड्स का दौर है,
कोई कहता है ये करो, कोई कहता है वो करो,
कोई कहता है ऐसे करो, कोई कहता है वैसे करो,
मगर आश्चर्य ....
कोई ये नहीं कहता कि चरित्र ऊँचा करो...'
शायद यह ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है एड्स से बचने का.

यह भी कुछ हद तक सुखद है, परन्तु यदि सदन में बनने वाली सरकार की बात हो तो स्थिति और भी शोचनीय हो जाती है. ५४३ सीटों की लोकसभा में २७२ सीटों अर्थात २७२ विजयी उम्मीदवारों द्वारा समर्थित दल की सरकार बनती है, अर्थात यदि सरकार को औसत रूप में मिले कुल मतों को देखा जाए तो यह स्वतः सिद्ध है कि कुल वयस्क मतों का लगभग मात्र ९.५% मतों द्वारा समर्थित दल की सरकार बनती है और हम आश्चर्यजनक रूप से उस सरकार को बहुमत की सरकार कहते हैं.
परन्तु फिर भी कहा जाता रहा है कि समस्या कोई भी हो उसका समाधान हो सकता है. आज संविधान की शल्यक्रिया करके उसे फिर से एक जीवित लोकतंत्र को पैदा कर सकने और उसे पाल सकने लायक बनाना होगा.आखिर क्यों संविधान में संशोधन करके राजनीतिक क्षेत्रों में द्विदलीय प्रणाली को लागू नहीं किया जा सकता? दलों और संगठनों का निर्माण तो हो मगर उनकी भूमिका स्वस्थ दबाव समूहों की तरह हो, वर्तमान की भांति लोकतंत्र की लाश को नोचने वाले कौओं की तरह नहीं!
इस स्थिति में भी हल है, जनता को खुद आगे बढ़कर इन कौओं के बीच से कोयलों को छाँट कर आगे लाना होगा, जिनकी सहायता से नए जीवित लोकतंत्र का जन्म हो सके. लोकतंत्र निर्माण के इस यज्ञ में हम सब को अपने हिस्से कि समिधा डालनी होगी. इसका सबसे अच्छा विकल्प है अपने मत का प्रयोग.
हमें सोचना होगा कि 'मत' सिर्फ दान करने के लिए नहीं होता, इस से देश का, लोकतंत्र का भविष्य जुड़ा हुआ है. हमें अपने मत का उचित और अनिवार्य प्रयोग करना होगा, जिस से कि हम आने वाली पीढी को एक स्वस्थ और जीवित लोकतंत्र दे सकें.
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