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भारत स्वतंत्रता-दिवस की तैय्यारी में जुट गया है. आमजनों का उत्साह कहीं नज़र तो नहीं आ रहा, पर जगह-जगह पुलिस बैरिकेट, आ़ने-जाने वालों की तलाशी लेती पुलिस, होटलों में छापामारी से पता चलता है कि १५ अगस्त निकट है. सुरक्षा एजेंसी की सक्रियता और ही इस राष्ट्रीय पर्व को गंभीर बना देती है.
आजादी साठ की उम्र पार कर चुकी है. स्वतंत्रता सठियाय गयी है या परिपक्व हुई है, विवेचना जरूरी है.
हाजरों वर्षों की गुलामी, विदेशी आक्रमणों को झेलते भारत १९४७ को आजाद हुआ. बेइंतेहा त्याग और बलिदान के बाद मिली वह आजादी खंडित थी. भारत तीन टुकडों में बंट चुका था.
भारत की गुलामी में जो कारन थे आजादी के समय भी वही कारन मौजूद थे. सत्ता के लोभ में हमने अंग्रेजों को बुलाया और इसी लोभ में अंग्रेजों को भगाया भी. वही दीमक स्वतंत्रता को चाट रहा है. आज आजादी जर्जर हो चुकी है. आमजनों के लिए आजादी के मायने बदल गए हैं.
आजाद भारत का मैंने भी ४५ बरस भोग किया. मुझसे भी पड़ोस का हिंदुस्तान लूटा गया, बर्बाद हुआ. ईमानदारी से स्वीकारने में मुझे शर्म नहीं.
२६ जनवरी और १५ अगस्त के आते ही मेरा बचपन गतिविधियों से भर जाता था. झंडा फहराने के लिए बड़ा-बड़ा सरकट खोजता. रंग खरीदता. कागज पर झंडा बनाता. अशोक चक्र बनाने में भूलें होती तो फिर दूसरा झंडा रंगता...! भाषण रटता. देशभक्ति के गीतों की किताब खोजता... प्रभात फेरी में पूज्य बापू अमर रहे, चाचा नेहरु अमर रहे का नारा लगा-लगा कर निहाल होता. बीच में भगत सिंह जिंदाबाद का भी नारा लगा देता...बहुत दिनों से 'भारत माता की जय' नहीं बोल पाया हूँ. वर्षभर तो भारत माता नाम की कोई चीज जेहन में आती नहीं. हाँ, २६ जनवरी और १५ अगस्त को जरूर जयकारा कर भारत माता को याद करते. अब वह भी बंद है. लाल किला में कब तिरंगा फहरा, मुझे पता नहीं होता. जन-गन-मन सुनकर बहुत दिनों से सावधान नहीं हुआ हूँ मैं.
मेरे भीतर पड़ताल जारी है. आखिर मेरे दैनंदिन से देश क्यों गायब होता जा रहा है. मैं व्यस्तता, बेरोजगारी, बेहाली को बहाना बनाऊं तो बात पचेगी नहीं. आखिर १९४७ से पहले भारत में कौन सी खुशहाली थी कि हम देश के लिए मर मिट रहे थे.
आज हमारे पास संचार के तमाम साधन मौजूद हैं, फिर भी हमारी देशभक्ति क्यों नहीं घटित हो रही है? क्या देश के बुनियादी सवाल उत्तरित हो गए हैं?
हकीकत कुछ और है. आज देश की स्थिति १९४७ से भी बदतर है. बीमारी, महामारी, भुखमरी थी, पर हमारा समाज आत्महंता नहीं था. भारत के ऊपर एक रुपया भी विदेशी कर्ज नहीं था, तमाम लूट के बावजूद. १९४७ तक भारत कर्ज-मुक्त देश था. भारत के पास अपार मीठा जल था. सदानीरा नदी थी. घने जंगल थे. ऊँचे पहाड़ थे. खेतों में हरियाली थी. आज से बेहतर स्वास्थ्य था. बेहतर समाज था. दरवाजे पर दुधारू जानवर थे. शेर की दहाडें थी, गीदडों की भभकी थी. क्या नहीं था हमारे पास?
गीत थे, संगीत थे. नृत्य और उत्सव थे. मंदिरों में घंटी की आवाज थी तो मस्जिदों में मौजूं था अजान. कश्मीर कि क्यारियों में केशर की महक थी. पूरब कि सात बहनों का प्रेम था. आप इसे असीम आत्ममुग्धता में डूबने की बात कहें तो भी मुझे गर्व ही होगा.
आजादी के इतने वर्षों बाद हमने क्या खोया, क्या पाया? क्यों नहीं हिसाब करते हैं? आने वाली पीढी के लिए कौन सी विरासत छोड़कर जायेंगे?
अदम गोंदवी ने कहा था-
"सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद हैं,
दिल पे रख के हाथ कहिये, देश क्या आजाद है.
कोठियों से मुल्क की ऊँचाइयाँ मत आंकिये,
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है."

फुटपाथ पर आबाद हिंदुस्तान को आजादी का मायने कब समझायेंगे?
पेट खाली हो, घर अँधेरा और चूल्हा शांत हो वहां जश्न की बात करना आमजनों को चिढाना ही तो है.
प्रधानमंत्री लालकिला के प्राचीर से भाषण देंगे. प्रगति को दुहराएंगे. मैं निवेदन करता हूँ प्रधानमंत्री से कि वे देश से सही-सही बात बताएं कि-
(१) देश की खेती तब कैसी थी अब कैसी है?
(२) जंगल बढा है या उजड़ गया?
(३) नदियाँ कैसी थी, अब कैसी हैं?
(४) जानवर कितने थे अब कितने शेष हैं?
(५) उत्पादन लागत कितनी थी, अब कितनी है?
(६) प्रतिव्यक्ति अनाज की खपत कितनी थी, अब कितनी है?
(७) मंहगाई दर कितनी थी, अब कितनी है?
(८) कुटीर उद्योग कैसा था, अब कैसा है?
(९) लघु उद्योग का ताजहाल बताएं.
(१०) सामाजिक, सांस्कृतिक माहौल कैसा था, अब कैसा है?

सवालों की फेहरिस्त लम्बी है. देश श्वेत पात्र जारी करे. देश को जानने का हक है कि देश के निजामों ने राष्ट्रीय सम्पदा में कितना इजाफा किया है या बर्बाद किया है?
तभी देश का जन-गण-मन स्वतंत्रता का मूल्य समझ पायेगा. राज्यपोषित जश्नों से हमें क्या लेना देना? १९४७ के बाद सरकारें बदली हैं, पर सत्ता का चरित्र तो अंग्रेजो वाला ही है.
मैं दिल्ली के बाजार में हूँ पर दिल में आज भी मेरा देश मौजूद है, और यह मुझे अक्सर बेचैन करता है. झूठे-मक्कार निजाम के खिलाफ हल्ला बोलने की प्रतिबद्धता गहराती जा रही है. मैं जानता हूँ कि सरकार सच नहीं बोलेगी.
सरकार सच इसलिए नहीं बोल रही है कि मैं मौन हूँ. मेरा यह 'मैं' विद्रोह की इकाई भर है. उठाना ही होगा मुझे एक बार तिरंगा. मादरे-वतन की चीख लगानी ही होगी मुझे.
स्वतंत्रता बूढी नहीं परिपक्व होगी. हुक्मरानों! देश बचेगा, तभी तुम्हारा दल भी बचेगा. भावनाओं के इस झिलमिल लौ की चमक देंखे. तैयार हो जाएँ साठ होने के लिए या फिर स्वाहा होने के लिए--
"झिलमिलाती लौ सनातन लौ भला कब तक रहेगी,
पीढियों के जुल्म को ये पीढियां कब तक सहेंगी,
झिलमिलाती लौ, गर लपट बन गयी,
तो फिर ना कहना, ये दिवाली हाय कैसे मन गयी???"
जय हिंद, जय हिंदुस्तान.

- Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

क्या होगा-(३)???

Posted by VIJAYENDRA On 7/26/2009 01:01:00 pm 0 comments



जैसे ही उसे चिंकी की खट्टी-मीठी गोलियों का राज़ और उस तथाकथित पुजारी के सच का पता चला, उसने मन ही मन अपना फैसला कर लिया, और मौका मिलते ही पत्थरों के जरिये अपना न्याय कर दिया. लेकिन अपने न्याय के कारणों को बताने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे, इसीलिए उस रात उसे पिता के दो-चार थप्पडों के साथ ही भूखा ही सोना पड़ा.
ऐसी बहुत सी घटनाएं शशि के साथ अक्सर होती रहती थीं. गलत और अन्यायपूर्ण कृत्य देखना उसे पसंद नहीं था.
और सही?! सही तो शायद कहीं होता ही नहीं! कहानियों में अक्सर सुनती थी कि कहीं स्वर्ग है, जहाँ सब कुछ सही होता है, वहां सिर्फ अच्छे लोग होते हैं....! और अक्सर वो उस स्वर्ग कि कल्पना में खो जाया करती थी.
जब कहीं नारी समता की बातें पढ़ती तो उसे अपना गाँव मानो नरक लगने लगता था. बहुत जिद के बाद उसे शहर में आगे पढ़ने की इजाजत मिल पायी थी. मगर ये क्या!!! यहाँ भी तो उसका गाँव ही दिखाई दे रहा था चारो तरफ...थोडा रंग-बिरंगे शालीन कपडों में. यहाँ भी समता की वो ऊँची-ऊँची बातें सिर्फ बातों में ही थी, व्यवहार में नहीं. बड़ी मुश्किल से सामंजस्य बिठा पा रही थी वो. कभी-कभी सोचती थी कि या तो ये दुनिया गलत है या फिर वो गलत दुनिया में आ गयी है!!
बड़ी दीदी की शादी में उसने विरोध करने की कोशिश की भी, लड़का शराबी था, अनपढ़ और गंवार भी.
"लड़की हो लड़की की तरह जीना सीख लो, उतना ही बोलो जितना पूछा जाये."पिता ने सख्त लहजे में कहा. वो चुप हो गयी.
इस बार छुट्टियों में घर पहुंची तो बड़ी दीदी को आया देखा, रो रहीं थीं, माँ ने समझाते हुए दीदी को कहा था:-"बेटी कुछ भी हो जाए, ससुराल से लड़की की अर्थी ही उठती है. कैसे भी करके वहीँ रह लेना, नहीं रह पाओ तो आग लगा कर जल जाना, मगर मायके की ओर मत देखना." दीदी चली गयी.
मगर वो पूरी रात नहीं सो पायी, उसे लगा कि वो शायद सच में इस दुनिया के लायक नहीं है. फिर वो चिरनिद्रा में सो गयी,. अब वो स्वर्ग में है..जहाँ सब कुछ अच्छा है. वो शायद उसी दुनिया के लिए बनी थी, क्योंकि इस दुनिया में तो हमने उसे कभी चैन से सोने ही नहीं दिया, जब तक वो सो नहीं गयी.
आखिर हम कब जागेंगे? अभी और कितनी 'शशियाँ' चिरनिद्रा में सोने के लिए मजबूर की जाती रहेंगी?

-Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.


सेज पर किसानो की मौतें करवट बदल रही है. यह किसानो के लिए कोढ़ में खाज की तरह है. पहले से बदहाल किसान पर सेज की एक और मार? खेती तो इनकी बर्बाद थी ही अब खेत भी इनके हाथ से बाहर जाते दिख रही है.
मरता क्या ना करता! छित-पुट ही बवाल हुए पर किसानों के विद्रोह की स्थिति भयावह रही. संगीन पर माथा रखने के लिए तैयार यह किसान सिंगुर और नंदीग्राम के संघर्ष को नया अंजाम दिया, और टाटा को बोरिया बिस्तर समेटना भी पड़ा.
आज पुनः सरकार भूमि अधिग्रहण के लिए नया कानून लाने जा रही है. ममता अपनी ही सरकार के खिलाफ हो गई है. इसके विरोध में स्वयं संसद से बाहर रही और अपने सांसदों को भी नहीं जाने दी. आखिर ममता जिस सेज पर चढ़कर सांसदों की संख्या में इजाफा की. फिर उसके पक्ष में कैसे जायेगी?
मंहगाई चरम पर है. थाली से सब्जी और दाल गायब है. शरद पवार कह रहे हैं कि तेरह महीने तक पेट भरने के लिए अनाज है अभी भारत के पास. कृषिमंत्री का यह बयान बकवास है. वे तो क्रिकेट मंत्री हैं, कृषिमंत्री नहीं.इनके बयान पर किसान का विश्वास नहीं रहा.
इस आपाधापी के बीच आज स्वामीनाथन ने अपनी चुप्पी तोडी और उन्होंने कहा कि स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन(सेज) नहीं, स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन (साज़) बनाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सेज से देश बनेगा नहीं बर्बाद हो जायेगा आदि- आदि ......
खास यह है कि स्वामीनाथन हरित क्रांति के दुष्परिणामों को स्वीकारने लगे हैं. सत्य तो यही है कि अधिक उपज के नाम पर खेत बंजर हो गयी और खेती बाज़ार के हवाले हो गयी. बाज़ार आधारित खेती ने किसान को बेहाल किया. उत्पादन, भण्डारण और विपणन पर बाज़ार का आधिपत्य हो गया.
स्वामीनाथन पुनः उसी परंपरागत खेती की बात कर रहे हैं. उत्पादकता और उत्पाद पर भी उन्होंने सवाल उठाया है. वे कहते हैं कि उत्पादकता भी घटी है और उत्पाद की गुणवत्ता भी. आज स्वामीनाथन को ऑर्गनिक खेती की बातें सूझ रही हैं. ये बातें उनकी प्राथमिकता में पहले क्यों नहीं थी?
स्वामीनाथन जी इस बकवासवाद से स्वयं को मुक्त कीजिये और सरकार को आगाह कीजिये कि वह विकास की अवधारणा पर विमर्श करें. अंधी नकलबाजी का परिणाम सामने है कि साठ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. आधी आबादी को आधा पेट भोजन भी नसीब नहीं है. कारोनों लोग ऐसे हैं जिन्हें एक शाम के भोजन के बाद दूसरे शाम के भोजन की निश्चितता ही नहीं है.
भई! पॅकेज की पैंतरेबाजी से भारत की खेती तो बचेगी नहीं. लगातार घाटे के बाद किसान कब तक अपनी जमीन को बहुराष्ट्रीय गिद्धों से बचाए रख सकेगा?
सेज नहीं तो स्वामीनाथन का साज़ कैसा होगा, देश को बताएं तो?! अब किसी भी प्रकार कि सियासती लापरवाही देश के भविष्य को लील जायेगी. वक़्त है इस सवाल को मुखरित करने का? जागो, फिर एक बार और बुलंद हो नारा--
कृषि बचाओ, देश बचाओ..

-Vijayendra, Group Editor, Swaraj T.V.

पाती प्रेम की....

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/25/2009 07:22:00 pm 0 comments



जाने क्यूँ ये कलम आजकल प्रेम-गीत से डरती है,
प्रिय के मोल-तोल में होते हार-जीत से डरती है.
प्रीत भरी दो बातें अब क्यों लिखती नहीं है स्याही,
जाने अब किस भय में डूबा प्रेम-पंथ का राही.
माना कि संसार-समर में और बहुत से किस्से हैं;
बोटी-बोटी कटी लाश में सबके अपने हिस्से हैं.
किस कृपाण ने काटा होगा अंग कौन सा तन का,
जाने कौन हवा ने फूंका होगा चिराग आँगन का.
इस जैसे भ्रम प्रश्न अनेक होते हैं रोज समर में;
जाने कितने स्वप्न-महल, हर रोज जले हर घर में!
लेकिन क्यों मृत्यु-भय से जीवन-रस मर जाए,
प्रेम-सुधा झर जाए, द्वेष-गरल भर जाए.
लिखो प्रेम की गाथा हर पल, गीत प्रीत के रोज लिखो;
प्रियतम की दो बातें लिखो, उसके नयन सरोज लिखो.
निश्चय ही यह भ्रम माना, दो पल सुख की पाती तो है!
प्रियतम की मीठी बातों से, मुस्कान कहीं आती तो है!

-Amit Tiwari 'Sangharsh, Swaraj T.V.

क्या होगा--(२)???

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/24/2009 06:16:00 pm 0 comments


मेरे किस्से(क्या होगा--(१)???) की पाकीजा अचानक एक सुबह मुझे टाऊन पार्क के बेंच पैर बैठी मिल गयी. कुछ उदास सी लग रही थी. मैं पास गया तो उसने बिना पूछे ही मुझे बताना शुरू कर दिया कि जब चेहरा जलने और सुंदर ना रहने के बावजूद भी नज़रों ने उसका पीछा नहीं छोडा तो एक दिन उसने परेशां होकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली.
मैंने कहा:-'तो ठीक है फिर अब उदास क्यों हो?'
वो बोली:-'इसीलिए उदास हूँ कि आखिर मैंने ऐसा कदम क्यों उठा लिया, मरने जैसा?मैं नाराज़ हूँ अपने आप से कि आखिर इससे हुआ क्या?'
मैंने कहा:-'अरे भई, ठीक ही तो किया तुमने, एक अबला पाकीजा अपने पाक दामन को बचाए रखने के लिए मरने के सिवाय और कर भी क्या सकती है! और वो तुमने किया. तब फिर उदास होने या फिर खुद से नाराज़ होने वाली क्या बात है इसमें?'
मेरी बात सुनकर उसकी आवाज कुछ तेज़ हो गयी थी.
उसने कहना शुरू किया:-"आखिर क्यों? क्यों नहीं कर सकते हम और कुछ? कब तक हम ये कायराना कदम उठाते रहेंगे? आखिर मेरे मरने से भी किस्सा ख़त्म तो नहीं हुआ ना! आखिर आज भी तो पाकिजाओं के दामन उसी डर में जी रहे हैं, जिसमे जीते जीते मैंने मरने जैसा कदम उठा लिया. क्या हो गया इससे?
अब पाकिजायें अबला नहीं बनी रह सकतीं. अब वो अपना चेहरा नहीं जलायेंगीं; बल्कि उन गन्दी नज़रों को देखने के काबिल ही नहीं छोडेंगी.
अब हमारे हाथ हमारे लिए फांसी का फंदा नहीं तैयार करेंगे बल्कि ये कारन बनेंगे उन् रावणों के संहार का जो सीता को महज सजावटी सामान समझकर उससे अपने महल की शोभा बढ़ाना चाहते हैं.
अब हम अबला नहीं बनी रह सकतीं."
कहते-कहते उसकी आँखें लाल हो आई थीं, मुझे लगा कि उसकी आँखों में कोई क्रांति जन्म ले रही है. उसकी बातों में एक दृढ़ता सी झलक रही थी और इस दृढ़ता से मुझे सुकून मिल रहा था.
तभी अचानक दरवाजे पर हुई किसी दस्तक से मेरी आँखें खुल गयीं, अख़बार वाला अख़बार दे गया था.
अखबार उठाते ही मेरी नज़र एक समाचार पर पड़ी -"लोकलाज के भय से एक बलात्कार पीडिता ने आत्महत्या की."
पाकीजा की सुखद बातों का भ्रम टूट चूका था.
मन यह सोचकर व्यथित है कि आखिर ये पाकिजायें कब तक अबला बनीं रहेंगी?
पाकिजाओं की इस कहानी का अंत क्या होगा???
जारी........

-Amit Tiwari 'Sangharsh',Sub-Editor, Swaraj T.V.

क्या होगा--(1)???

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/22/2009 03:06:00 pm 1 comments


यूं ही अचानक बैठे-बैठे मन में एक प्रश्न उठ रहा है, क्या होगा?
प्रश्न जितना छोटा है, उतना ही बड़ा इसका आयाम है. इस प्रश्न में घर, समाज, देश, दुनिया सब समाहित हो जाता है.
किस्से की शुरुआत होती है 'पाकीजा' से, एक साधारण परिवार की सुन्दर लड़की. और कभी-कभी तो लगता है कि ये जो दो शब्द हैं, 'साधारण' और 'सुन्दर' यही उसके जीवन के सबसे बुरे शब्द हैं, क्यूंकि आज की दुनिया में 'साधारण' परिवार की लड़की का 'सुन्दर' होना ही सबसे बड़ा अभिशाप है. पाकीजा इस अभिशाप से कैसे बच सकती थी? इसी का कारन था कि पाकीजा जैसे ही अपने घर से बाहर निकलती, तमाम गन्दी नज़रें उसका पीछा करना शुरू कर देतीं. फिर दूर-दूर तक, चेहरे बदलते,गर्दनें बदलतीं, मगर नज़रें नहीं बदलतीं.! ये नज़रें तब तक उसका पीछा करती थी जब तक कि वो फिर से घूमकर वापस घर की चारदीवारी में आकर बंद ना हो जाती.
एक दिन पाकीजा ने एक गंभीर कदम उठा ही लिया, उसने अपने ही हाथों तेजाब से अपना चेहरा जला लिया. उसने सोचा कि अब वो सुंदर नहीं रहेगी, तो नज़रें उसका पीछा भी नहीं करेंगी.
मगर अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं हुआ, नज़रों ने उसका पीछा करना नहीं छोडा, क्यूंकि वो अभी भी एक लड़की है. हाँ एक नयी बात जरूर हो गयी है कि अब कुछ हाथ भी सहानुभूति के नाम पर उसकी ओर बढ़ने लगे.
अब मैं ये सोच रहा हूँ, कि बचपन में नैतिक शिक्षा की किताब में पढाई जाने वाली बड़ी-बड़ी नैतिकता की बातों का क्या होगा?
मनुष्य और मानवता जैसी अवधारनाओं का क्या होगा?
और सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि 'पाकीजा' का अगला कदम क्या होगा?
क्या वो खुद को मार लेगी?
और क्या उसके मर जाने से किस्सा ख़त्म हो जायेगा?
कभी नहीं!!!
क्यूंकि ये किस्सा किसी एक 'पाकीजा' का नहीं है!! ये किस्सा उन सभी पाकीजाओं का है जिनके पाक दामन पर हर रोज गन्दी नज़रों के छींटे पड़ते रहते हैं और हर रोज एक छोटा सा प्रश्न खडा करते हैं- "क्या होगा??"
जारी......
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कब तक होता रहेगा ये बलात्कार???

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/22/2009 01:16:00 pm 0 comments


'रीता बहुगुणा जोशी का घर जला दिया गया..'
कारन यह था कि उन्होंने उ.प्र. की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा किसी दलित महिला के बलात्कार के बाद दिए गए एक बयान के विरुद्ध कुछ कठोर शब्द कह दिए..
देखते ही देखते एक अच्छा खासा बवाल मिल गया मीडिया को...
हर तरफ तहलका सा मच गया इस मामले को लेकर..
लोग परेशां..मीडिया बेचैन, नयी नयी बाइट्स लेने के लिए कि कब कौन क्या कहने वाला है? राहुल गाँधी की क्या प्रतिक्रिया है?सोनिया क्या कह रही हैं? विपक्षी पार्टी क्या कह रही है?कौन सी धारा लगेगी रीता पर?
तमाम सवाल..तमाम उलझनें...!!!
मायावती का बयान सुनते ही रीता को लगा कि जैसे सारी स्त्री जाति की अस्मिता के साथ कोई बड़ा मजाक हो गया है! देखते ही देखते स्त्री जाती की रक्षा के लिए उन्होंने मायावती पर ही एक अच्छा और तगड़ा बयान दे डाला. वैसे भी बहुत दिनों से रीता राजनीतिक परिदृश्य से बाहर सी लग रहीं थी, और वापसी का इस से बढ़िया क्या तरीका हो सकता था कि सारी नारी जाति की ही नेता बन जाओ? उन्होंने वही किया जो एक समझदार राजनीतिज्ञ करता. और फिर मीडिया तो था ही....
लेकिन अब बारी थी मायावती की..... उन पर बयान देने का अर्थ तो सीधे सीधे एक दलित महिला पर हमले जैसा था...मगर मायावती ने भी लाज रख ही ली....देखते ही देखते रीता को उनके बयान की सजा मिलने लगी....उधर पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके ले गयी..इधर दलित महिला रक्षकों ने भी अपनी तरफ से सजा की घोषणा करते हुए रीता का घर जला दिया...
अब दो महान महिलाओं की जंग भला यहीं कैसे ख़त्म हो सकती थी.....!??देखते ही देखते राजनीतिक तलवारें खिंच गयीं....सभी अपनी तलवारों पर धार धराने लगे.......कलावती के शुभचिंतक राहुल की ओर भी लोगों की नजरें लगी हुई थी......उन्होंने भी एक मंझे हुए तलवारबाज की तरह अपने शब्दों का वार कर दिया...सबकी उम्मीदें धरी की धरी रह गयी...कलावतियाँ भी उनके हमले से चकित.....
सदा से ही शांतचित्त मनमोहन जी की शांति अब भी भंग नहीं हुई....कहीं कोई बयान पकड़कर फिर से विपक्ष कमजोरी का ताना ना देने लगे इसलिए ..."झूठा बन जीने से अच्छा मैंने होठों को सी डाला...."
और विपक्ष .....? वो तो बेचारा हमेशा से ही कमजोरियां खोजता रहा है....लेकिन जब बयान ही नहीं दिए जायेंगे तो कमजोरी कहाँ से मिलेगी?
मीडिया हमेशा की तरह से एक पालतू कुत्ते की तरह...पूरी वफादारी से व्यवस्था का काम संभालने में लगा हुआ है....
ये सब देखकर मैं भी एक सुखद एहसास में डूब गया हूँ....कितना अच्छा सा लग रहा है कि कहीं बेरोजगारी नहीं बची हुई है!! मंहगाई का कोई मुद्दा नहीं है!! कोई किसान आत्महत्या नहीं कर रहा है!! कहीं गंगा के बिकने की खबर नहीं है!! सेज की सेज सजाने के लिए किसी किसान की ओर से विरोध नहीं हो रहा है!! जब से मीडिया में ये तहलका है, तबसे बिजली तो शायद जाना ही भूल गयी है!!
वाह! रे माया की माया......!!!
क्या है ये सब???
यह सब सत्ता और मीडिया का खेल है...जनता को भरमाने का...जब-जब राज्य में भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, आत्महत्या, लूट, दंगे, आतंक, मंहगाई चरम पर होते हैं, तब-तब राज्य ऐसे ही किसी मुद्दे का खेल खेलता है..और मीडिया उसके अनुचर की भूमिका निभाता है......
मुझे आश्चर्य इस बात का है कि एक रीता का घर जल गया पूरी व्यवस्था परेशान हो गयी है...मगर कितने घरों के चूल्हे नहीं जल पा रहे हैं इसकी चिंता किसी को नहीं है!!
और सबसे गंभीर प्रश्न तो यह है कि जिस महिला के बलात्कार को मुद्दा बनाकर नेता अपनी राजनीति चमका रहे हैं...मीडिया अपनी टी.आर.पी. बढा रहा है, वो पूरे परिदृश्य से ही गायब है!!!
एक घर जलने की चिंता है,मगर जिसकी पूरी जिंदगी जल गयी, उसकी किसी को खबर ही नहीं!!
बलात्कारी ने तो उस महिला के साथ सिर्फ एक बार बलात्कार किया होगा........लेकिन ये मीडिया और ये सत्ता उसके साथ रोज जो छ्लात्कार कर रहे हैं उसका क्या??
आखिर कब तक ये आम जनता आम की तरह चूस कर फेंकी जाती रहेगी??
कब समझेंगे लोग राज्य के इस खेल को??
कब तक लोग ऐसे बेकाम के मुद्दों में भटककर परेशां होते रहेंगे??
कब तक मीडिया सत्ता का अनुचर बना रहेगा??
क्या मीडिया की यही भूमिका है??
अब तो रोज रोज का ये वैचारिक बलात्कार बंद करो......!!
और भी समस्याएं है देश में...!!

- Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

बाज़ार मन के भीतर है......

Posted by VIJAYENDRA On 7/21/2009 06:34:00 pm 1 comments


आदमी जन्मना शुद्र होता है. सभी के आने का मार्ग तो एक ही है...
प्रश्न यह है कि हम कर्मना क्या बन रहे हैं?
कृष्ण का जन्म किसी देवकी से नहीं हो सकता, न ही राम का जन्म किसी कौशल्या के गर्भ से होता है.
"यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे"
हर पिंड का अपने हिस्से का ब्रह्माण्ड होता है. यह पंक्ति सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सद्धान्तिक और व्यवहारिक सभी रूपों से सत्य है.
हर व्यक्ति के अंदर एक कृष्ण है, एक राम है, एक चोर नेता भी है और एक भरा पूरा बाज़ार भी...
बाहर की हर अभिव्यक्ति हमारे भीतर ही मौजूद है.

बाहर कोई बाज़ार नहीं है, बाहर कोई भ्रम नहीं है, बाहर कोई कृष्ण नहीं है, बाहर कोई राम नहीं है. यह सब कुछ सबके अंदर ही है. अगर आप कृष्ण बनना चाहते हैं तो फिर आपको भी पूतना, कंश और तक्षक से लड़ना होगा. यदि कृष्ण बनना है तो फिर महाभारत का साक्षी भी बनना पड़ेगा.
बाज़ार को मारना है, तो अपने भीतर के बाज़ार को ख़त्म करना होगा. जब तक हम अपने भीतर के बाज़ार से नहीं लड़ सकते, बाहर के इस छलिया बाज़ार से लड़ने की कल्पना भी निरर्थक है.
परदे पर यदि हमें मल्लिका उत्तेजित कर रही है तो इसका सच यही है कि वह कहीं गहरे में हमारे मन के अंदर बसी हुई है. बाहर कोई मल्लिका नहीं है उस परदे पर, वहां तो सिर्फ रौशनी का खेल है.
यही खेल बाज़ार का भी है. हमारे भीतर एक भरा पूरा बाज़ार बसा हुआ है, किसी के अंदर गाँव के मेले जितना बड़ा बाज़ार है तो किसी के अंदर फाइव स्टार मॉल जैसा बाज़ार. मगर है सब कुछ सबके भीतर ही.
ये सबसे बड़ा झूठ है कि नेता बेईमान हैं. उनसे लाख गुना ज्यादा बेईमान तो हम हैं. याद कीजिये कि क्लास का मोनिटर बनने के लिए हम कितनी राजनीति किया करते थे. दो रूपये के लिए हम सब्जी वाले से कितना उलझ जाते हैं आज कल. या जब हम किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू में जाते हैं तो हमें वहां आये हुए बाकी लोगों को देखकर कितनी जलन होती है? या कि अगर हमें नौकरी मिल रही हो तो हम क्या कुछ नहीं कर देते उसके लिए?ना जाने कितनी भावनाओं, कितने विश्वासों का खून कर देते हैं हम लोग छोटी-छोटी बातों पर.
नेता तो लाखों-करोणों लोगों का मसीहा बनता है, अगर उसने इसके लिए पांच दस लोंगो को मार दिया तो क्या गलत किया? बल्कि मैं तो कहता हूँ हमारे अपराध को देखते हुए तो उसके सौ खून भी माफ़ हैं!
नेता कोई और नहीं है हमारे ही भीतर का बड़ा सच है वो.
जब तक हमारे भीतर का चोर नेता नहीं मर जाता हमें करोणों लोगों के उस नायक को गाली देने का कोई अधिकार नहीं है.
जब तक हमारे भीतर का साम्राज्यवाद नहीं मरता, तब तक अमेरिका के साम्राज्यवाद के विरुद्ध बोलना बेकार है.
जब तक हमारे भीतर जाति जिन्दा है, राष्ट्रभक्ति की बात संभव ही नहीं है.
तमाम बाहर की बुराइयों से जंग लड़ने से बेहतर है कि हम अपने भीतर की गन्दगी को साफ़ कर लें.
लोकतंत्र मात्र चुनावी अभिव्यक्ति ही नहीं है, यह जीवन-मूल्य भी है. हमें अपने अंदर के लोकतंत्र को जिन्दा रखना होगा, बाहर का लोकतंत्र खुद ही जी उठेगा.

-Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

'..........कंडोम, हमेशा रखिये साथ, क्या पता ज़िन्दगी में कब, कहाँ...........???!!'
मैं कोई विज्ञापन नहीं कर रहा हूँ..यह एक प्रख्यात कंडोम कम्पनी द्वारा दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे एक विज्ञापन की पञ्च लाइन है. मैं आश्चर्य में हूँ कि आखिर इस पंक्ति का अर्थ क्या है?
विज्ञापन में क्या दिखाने का प्रयास किया जा रहा है?
क्या कहने का प्रयास हो रहा है?
क्या आदमी कुत्ते से भी गयतर हो चुका है, कि उसे पता ही नहीं कब, क्या हो जाए? कहते हैं कि कुत्ते का भी एक मौसम होता है, मगर लगता है कि आदमी बारहमासी कुत्ता हो चुका है!
फिर हम हल्ला मचाते हैं एड्स का. अरे ऐसे में एड्स नहीं तो क्या प्यार फैलेगा??!
आखिर हम किस संस्कृति की और बढ़ने के प्रयास में हैं? एड्स का हौव्वा है क्या?
सच तो ये है कि यहाँ नाको(राष्ट्रिय एड्स नियंत्रण संस्थान) के माध्यम से एड्स को रोका नहीं फैलाया जाता है!!! एड्स को रोकने का ये कैसा प्रयास है जो सरकार 'कंडोम' के रिंगटोन के जरिये करने का प्रयास कर रही है?
जितनी बार सरकार 'कंडोम-कंडोम' चिल्ला रही है अगर उतनी बार 'हरिओम' कहा होता तो शायद ज्यादा फायदा हो जाता!!
बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक जाल फैलाकर एड्स का विज्ञापन कर रही हैं और हम इस सुखद भ्रम में खोये हुए हैं कि ये सब एड्स को रोकने के लिए है. ८० प्रतिशत कंडोम के विज्ञापनों से यह स्पष्ट है कि ये सब मात्र उनके विज्ञापन का, और यौनिक स्वच्छंदता को बढ़ावा देने का प्रयास है. इन सभी विज्ञापनों में इसे एक आनंद प्राप्ति का साधन बताया जाता है, एड्स की रोकथाम या और इस जैसी बातें तो कहीं पीछे छूट जाती हैं, और यही कारन है कि कम पढ़े लिखे लोगों का बड़ा वर्ग इसे उसी रूप में जानता और समझता है, और उसकी उपलब्धता न होने पर उस जैसे और विकल्पों की तलाश करता है. यही तलाश कारन बन जाती है एड्स या उस जैसी गंभीर बीमारी का.
समझ नहीं आता सरकार एड्स रोक रही है या कंडोम की मार्केटिंग कर रही है? जनसत्ता, १९ जुलाई के अंक में एक समाचार पढने को मिला कि अब सरकार राजमार्गों के पेट्रोल पम्पों पर भी कंडोम की वेंडिंग मशीने लगाने जा रही है,,आश्चर्य.... ये क्या है?
क्या ऐसे ही एड्स रुकेगा?
भारत कभी एड्स का देश नहीं रहा है, क्योंकि यहाँ यौन स्वच्छंदता की आदत नहीं रही है. मगर अब लग रहा है कि हम एड्स के मामले में भी शीर्ष पर पहुंचना चाहते हैं.
यहाँ एड्स के रोकथाम का प्रयास नहीं बल्कि एड्स के इलाज का प्रयास ज्यादा हो रहा है. और कोई भी इलाज तभी कारगर है जब बीमारी हो. और इसीलिए बीमारी को बढ़ाने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.
एड्स किसी कंडोम के इस्तेमाल से नहीं रुक सकता, न ही ए.आर.टी. के इस्तेमाल से.
एड्स को ख़त्म करना है तो जरूरी है कि सरकार ये हवाई विज्ञापन बंद कर के कुछ जमीनी कदम उठाये जो भारत की तासीर के हिसाब से हो.
इस सम्बन्ध में यह पंक्तियाँ बहुत ही प्रासंगिक हैं--
'हर तरफ शोर है, एड्स का दौर है,
कोई कहता है ये करो, कोई कहता है वो करो,
कोई कहता है ऐसे करो, कोई कहता है वैसे करो,
मगर आश्चर्य ....
कोई ये नहीं कहता कि चरित्र ऊँचा करो...'
शायद यह ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है एड्स से बचने का.

--Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.

लोकतंत्र मर चुका है!!!

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 7/17/2009 06:14:00 pm 0 comments


लोकतंत्र की बड़ी ही सुंदर व्याख्या की जाती है कि यह 'जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन की अवधारणा है.'
अब जरा इस सुखद भ्रम से बाहर निकलते हुए इन आंकडों पर एक दृष्टि डालते हैं- चुनाव में पड़ने वाला कुल औसत मत ५५%, एक सीट पर औसतन २५ प्रत्याशी से अधिक उम्मीदवार, विजयी होने वाले उम्मीदवार को मिलने वाला औसत मत कुल डाले गए मतों का औसतन ३५%.
इस प्रकार देखा जाये तो विजयी उम्मीदवार को कुल वैध मतों का लगभग १९% मत प्राप्त होता है. अतः कुल वयस्क जनता के लगभग १९% मतों से समर्थित उम्मीदवार विजयी होता है और पूरे पांच वर्षों तक शासन करता है.
कितनी बड़ी विडम्बना है हमारे लोकतंत्र की; कि जहाँ किसी विद्यालय में छात्र को उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम ३५% अंकों कि अनिवार्यता है, वहीँ १९% मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवर सर्वोच्च स्थान पर होता है. कभी-कभार तो यह प्रतिशत इस से भी कम हो जाता है.
यह भी कुछ हद तक सुखद है, परन्तु यदि सदन में बनने वाली सरकार की बात हो तो स्थिति और भी शोचनीय हो जाती है. ५४३ सीटों की लोकसभा में २७२ सीटों अर्थात २७२ विजयी उम्मीदवारों द्वारा समर्थित दल की सरकार बनती है, अर्थात यदि सरकार को औसत रूप में मिले कुल मतों को देखा जाए तो यह स्वतः सिद्ध है कि कुल वयस्क मतों का लगभग मात्र ९.५% मतों द्वारा समर्थित दल की सरकार बनती है और हम आश्चर्यजनक रूप से उस सरकार को बहुमत की सरकार कहते हैं.
क्या वास्तव में मात्र ९.५% मतों के आधार पर बनी हुई सरकार को 'जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन' कहा जा सकता है? और यदि कहा जाता है तो यह घोर पाखंड ही है.
क्या इस स्थिति को देखकर भी कहा जा सकता है कि लोकतंत्र जीवित है? सत्य तो यह है कि यहाँ तो संविधान के गर्भ में ही लोकतंत्र की भ्रूण-हत्या कर दी गयी थी!
विश्व के वृहदतम संविधान में देश के प्रमुखतम पद पर आसीन होने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवार के लिए निर्धारित की गयी पात्रता, आश्चर्यजनक रूप से किसी छोटी से छोटी संस्था के चुनकर आनेवाले संचालक से भी कम है. क्या यह गर्भ में पल रहे शिशु की गर्भनाल काट देने जैसा नहीं है? और इस स्थिति में एक स्वस्थ शिशु के जन्म की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है?
परन्तु बात यहीं पर समाप्त नहीं हो जाती है कि यह लोकतंत्र तो गर्भ में ही मार दिया गया था, आदि-आदि. बल्कि तब से लेकर आज तक हर सरकार इस मरे हुए लोकतंत्र को उसी तरह गले से लगाये हुए है जैसे बंदरिया अपने मृत शिशु को अपने तन से चिपकाये हुए उसके जीवित हो उठने की उम्मीद पाले रहती है. और इस कारन से उस मृत शिशु का शरीर गल कर बदबूदार हो जाता है.
परन्तु फिर भी कहा जाता रहा है कि समस्या कोई भी हो उसका समाधान हो सकता है. आज संविधान की शल्यक्रिया करके उसे फिर से एक जीवित लोकतंत्र को पैदा कर सकने और उसे पाल सकने लायक बनाना होगा.आखिर क्यों संविधान में संशोधन करके राजनीतिक क्षेत्रों में द्विदलीय प्रणाली को लागू नहीं किया जा सकता? दलों और संगठनों का निर्माण तो हो मगर उनकी भूमिका स्वस्थ दबाव समूहों की तरह हो, वर्तमान की भांति लोकतंत्र की लाश को नोचने वाले कौओं की तरह नहीं!
नेता और सर्वोच्च पद पर आसीन होने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवारों के लिए एक उचित अर्हता का निर्धारण भी तो संविधान संशोधन द्वारा किया जा सकता है, और यह भी लोकतंत्र के नए शिशु के लिए अच्छा आहार होगा.
परन्तु यहाँ समस्या यह भी है कि इस व्यवस्था का निर्माण भी दुर्भाग्य से उन्हीं कौओं के हाथ में है, जिन्हें लोकतंत्र कि इस लाश को नोचनें में ही मजा आता है.
इस स्थिति में भी हल है, जनता को खुद आगे बढ़कर इन कौओं के बीच से कोयलों को छाँट कर आगे लाना होगा, जिनकी सहायता से नए जीवित लोकतंत्र का जन्म हो सके. लोकतंत्र निर्माण के इस यज्ञ में हम सब को अपने हिस्से कि समिधा डालनी होगी. इसका सबसे अच्छा विकल्प है अपने मत का प्रयोग.
हमें सोचना होगा कि 'मत' सिर्फ दान करने के लिए नहीं होता, इस से देश का, लोकतंत्र का भविष्य जुड़ा हुआ है. हमें अपने मत का उचित और अनिवार्य प्रयोग करना होगा, जिस से कि हम आने वाली पीढी को एक स्वस्थ और जीवित लोकतंत्र दे सकें.
-- Amit Tiwari 'Sangharsh', Swaraj T.V.


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