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हिन्द-स्वराज के गांधी, समता के पैरोकार लोहिया और सम्पूर्ण-क्रांति के प्रणेता जे.पी. निराश हैं, देश के निज़ाम और उसके इन्तजाम से। देश कैसे गांधी, जे.पी., लोहिया को याद करे? थाली में जो रोटियां दी थीं, दांडी से जो नमक मिला था, वह सब छिन गया है। गरीब भगाओ, देश बचाओ के नारे को अमली जामा पहनाने वाली सरकार ने जो व्यवस्था दी है, उसे देखकर शहीदों की इन शहादतों पर रोना आता है। अफसोस होता है कि भगत, सुखदेव और राजगुरू ने आखिर किनके लिए अपनी शहादत दी थी? क्या इन्हीं दलालों और मक्कारों के लिए, जो निज हित में देश की बोली लगा रहे हैं। देश को उम्मीद थी कि देश के कथित रहनुमा महंगाई के खिलाफ...



Vijayendra,
Editor (Nirman Samvad)

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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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