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राजनीति में चुम्बन और निलंबन

Posted by AMIT TIWARI 'Sangharsh' On 4/20/2010 01:12:00 am 0 comments




राजनीति में चुंबन और चांटा का इतिहास पुराना है। सत्ता जहां भी रही सुरा, सौन्दर्य और शबाब केन्द्र में रहे। स्त्री-भोग तो राजा का राजकीय व्यवहार रहा है। एक-एक राजा के पास सैकड़ों गुलाम स्त्रियां अभिशप्त थीं। दर्द की दास्तान दारूण रही है। सामंतवाद के उदय के साथ ही नारीदेह और ही क्षत-विक्षत होती रही। सत्ता के गलियारे में देह-दान की कथा बनती, बिगड़ती रही।
सत्तासीन व्यक्ति भी आदमी होता है, इन्हें भी पद की भूख होती है, देह की भूख होती है। सत्ता और शक्ति के प्रभाव में कुछ स्त्रियां यूं भी लाई जाती रही हैं, और कुछ अपनी चाहत पूरी करने में स्वयं भी चहेती बन जाती हैं।
हिटलर, नेपोलियन, टैगोर, गांधी, नेहरू..... आदि की जीवन यात्रा में नारी-देह पड़ाव बनी। इन नेताओं का स्त्रियों के प्रति गहरा सम्मान था। ये प्रेम के भिखारी नहीं थे। याचना का कोई स्वर नहीं था। सारा खेल निवेदन पर टिका था। आज के नेताओं की तरह वहां अराजकता नहीं थी। ये खोज-खोज कर स्त्रियों का सम्मान नहीं करते थे। कालगर्ल या वेश्यागमन का दौर तो आधुनिक राजनीति की देन है। पूर्व मंत्री रामलखन सिंह यादव के सांसद पुत्र प्रकाशचन्द्र सोनागाछी के कोठा पर पकड़े गये। बड़ा बवाल मचा। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के साथ इसी कलकत्ता में कालगर्ल पकड़ी गई। राजनीति बहुत ही शर्मसार हुई थी। समलैंगिकता की कहानी भी बड़ी है। भुक्तभोगियों से साक्षात्कार भी हुआ, पर तत्काल मूर्तिभंजन की मेरी कोई चाहत नहीं। ये नेता समाज के प्रेरणा के श्रोत बने हुए हैं आज भी। संसद में आज भी कई नेता ऐसे मौजूद हैं जो लड़की सप्लाई कर, सांसद चुनकर आये हैं। बदनुमा दाग एक जगह हो, तब तो कहें कि यहां है।
नेताओं का प्रेम संबंध तो आम है। नेहरू से लेकर नारायण तक सभी दलों में ये कथाएं व्याप्त हैं। वाजपेयी, गोविन्दाचार्य, कृष्णलाल शर्मा का मामला जगजाहिर है। गोविन्दाचार्य ईमानदारी से स्वीकारते हैं कि उन्हें ये प्रेम था, पर शादी नहीं हो सकी। इस ईमानदार स्वीकृति को समाज ने स्वीकारा। पर कुछ का पाखंड उनके मरने के बाद उजागर हुआ। कृष्णलाल शर्मा के मरने के बाद उनकी दूसरी कथित पत्नी का मामला सामने आ गया। आज के स्थापित महिला नेतृत्व के जीवन में प्रेम घटित हुआ। इंदिरा, सोनिया, प्रियंका, मेनका, जयललिता.. की राजनीतिक-यात्रा प्रेमजनित ही तो है।
फिजा और चांद की कहानी तो अजब-गजब की रही है। अपनी फिजा को पाने के लिए अपनी राजनीति स्वाहा कर डाली। उपमुख्यमंत्री का पद गंवाया, घर छोड़ा, धर्म छोड़ा।
समाजवादियों की सीडीयां भी बाजार में आईं। लंगोट के कच्चे नेताओं की पोल खुली। उम्र की सीमा भी टूट गई। इनके लिए कोई सामान्य लड़की नहीं, बल्कि रूपहले परदे की नायिकाएं लाई गईं। रसूख के दबाव में मामला दब गया। खगड़िया के ग्रामीण अंचल में रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी आज भी बाट जोह रही है। विचार-मीमांसा पत्रिका ने लालू एण्ड कम्पनी की भी पोल खोली। इधर राबड़ी देवी ने नीतीश के खिलाफ अनाप-शनाप कहा। यहां तक कि एक नेता को उनका अवैध साला कह दिया, वह भी सार्व- जनिक मंच से। मामला भी दर्ज हुआ।
दिलफेंक नेताओं की कहानियां किस्तों में छापनी पड़ेगी। वर्तमान में एन. डी तिवारी का जो सेक्स-स्कैंडल सामने आया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय सामाजिक व सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल बड़ा है। भ्रष्टाचार और अपराध का गहरा संबंध रहा है सत्ता से। पर ये नेता चरित्रहीन नहीं कहलाये। सवाल है कि क्या चरित्रहीनता का सम्बन्ध स्त्री-देह के ही सापेक्ष में ही बनता-बिगड़ता है ? आर्थिक स्तर पर हुई गड़बड़ी भी चरित्रहीनता की श्रेणी में आनी चाहिए। केवल एन.डी. तिवारी ही क्यों ? उन तमाम नेताओं का निलंबन होना चाहिए जो चरित्रहीन हैं। या फिर ऐसे लोग भी हैं जिसकी चरित्रहीनता सामने नहीं आई है या किसी ने उजागर नहीं किया है।
एन. डी तिवारी ने जो किया वह अक्षम्य है। आश्चर्यजनक यह है कि इस मुद्दे पर कोई पार्टी और नेता बोलने की स्थिति में नहीं है। उनके पास कोई नैतिक साहस नहीं है कि वे तिवारी के मामले को उठा सकें। सभी नेता सजग हैं। सावधान हो गये हैं। भला शीशे के घर में रहकर कौन दूसरे पर पत्थर उठाये ?
गांधी ने धर्म को राजनीति से जोड़ने की बात की। उन्होंने कहा कि धर्म के बिना संसद बांझ और वेश्या बन जाएगी। यद्यपि इस पंक्ति को गांधी ने बाद में स्वयं हटाया भी, लेकिन फिर भी उनके कथन का अभिप्राय स्पष्ट है।
यह सत्य है कि आमजन अपने नेतृत्व से सीरवता है। रोल मॉडल बनाता है। उनकी जीवन शैली का अनुकरण करता है। अगर नेतृत्व ही बौना, ठिगना या अराजक हो जाये, तो आम लोगों का क्या होगा ? राजनीति आदर्श रही है। अपवित्र राजनीति देश को बेहतरी नही प्रदान कर सकती। मनसा, वाचा, कर्मणा की अपेक्षा अपने नेतृत्व से सदा से रही है।
बस शिकायत यही है कि अगर तिवारी को कालगर्ल ही चाहिए थी, तो राजभवन में ही क्यों ? डायन भी पांच घर छोड़कर दिमाग लगाती है। इतने ज्ञानी एवं बड़े व्यक्ति को समय या जगह का ख्याल तो करना ही चाहिए था!



Vijayendra
Editor


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पाश ने कहा है कि -'इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी, सपनों का मर जाना। यह पीढ़ी सपने देखना छोड़ रही है। एक याचक की छवि बनती दिखती है। स्‍वमेव-मृगेन्‍द्रता का भाव खत्‍म हो चुका है।'
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